१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ खण्ड १३ मन्त्र ४ ९९ तान्धोवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयांचकार ॥ ३ ॥ उस श्वेत श्वान ने उन सबसे कहा- 'तुम कल प्रातःकाल मेरे पास आना।' तब कौतूहल पूर्वक बक दाल्भ्य और ग्लाव मैत्रेय भी प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते रहे ॥ ३॥ ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सःरब्धाः सर्पन्तीत्येव माससृपुस्ते ह समुपविश्य हिंचक्रुः ॥ ४॥ प्रातःकाल वे सब श्वान (प्राण) मिलकर उसी प्रकार भ्रमण करने लगे, जैसे बहिष्पवमान स्तोत्र से स्तुति करने वाले उद्गाता परस्पर मिलकर भ्रमण करते हैं। तदनन्तर वे वहाँ बैठकर हिंकार करने लगे ॥४॥ [ बहिष्पवमान स्तोत्र का गान प्रातः सवन में वेदिका से हटकर, एक साथ गतिशील रहकर किया जाता है। उसका उद्देश्य श्रेष्ठ हव्यान्न की प्राप्ति होती है। यहाँ भी प्राण से सम्बद्ध प्रवृत्तियों द्वारा ( भूख, प्यास आदि) अपने निर्वाह के लिए अन्न प्राप्ति की प्रार्थना की जा रही है। अगले मन्त्र में वह प्रार्थना की गयी है। इस स्तोत्र को त्रित कहा गया है। यह प्रार्थना तीन देवों से की गयी है।] ओ३मदामों३पिबामों३देवो वरुणः प्रजापतिः सविताऽन्नमिहा२हरदन्नपते२ऽ- न्नमिहा हरा२हरो३मिति ॥ ५॥ वे हिंकार करते हुए कहने लगे- ॐ हम भक्षण करें। ॐ हम पान करें। ॐ देव वरुण, प्रजापति, सूर्यदेव यहाँ अन्न लाएँ। हे अन्नपते ! यहाँ अन्न लाएँ, यहाँ अन्न लाएँ ॥ ५॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ यहाँ साम से सम्बन्धित स्तोभ साधना का वर्णन है। इसमें शास्त्रीय संगीत की तरह स्वरों का गायन तो होता है, किन्तु अर्थवाचक शब्दों का उपयोग नहीं होता। उसी प्रक्रिया में प्रयुक्त स्वरों से सम्बद्ध भावों का विवेचन यहाँ किया गया है- अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मैहकारोऽग्निरीकारः ॥ १ ॥ इसमें 'हाउ' शब्द यह लोक (पृथ्वी) है। 'हाइ' शब्द वायु है। 'अथ' शब्द चन्द्रमा है। 'इह' शब्द आत्मा है और 'ई' अग्नि है । यह मानकर उपासना करनी चाहिए ॥ १ ॥ आदित्य ऊकारो निह्नव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिंकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥ २ ॥ 'ऊ' आदित्य है, 'ए' निह्नव (निमंत्रण) का प्रतीक है 'औ होय' विश्वेदेवा है। 'हिं' प्रजापति है, 'स्वर' प्राण का रूप है। 'या' अन्न है और 'वाक्' विराट् है ॥ २ ॥ अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥ ३ ॥ जो अनिवर्चनीय है, परन्तु जो कार्य में संचरित होता है, वह तेरहवाँ स्तोभ 'हुं' है॥ ३॥ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवः साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ ४॥ जो इस प्रकार साम सम्बन्धी (स्तोभाक्षर सम्बन्धिनी) उपनिषद् (रहस्य) का महत्त्व जानता है। उसके सम्मुख वाणी अपना रहस्य स्वयं ही उद्घाटित कर देती है। वह प्रचुर अन्न तथा प्रदीप्त पाचक अग्नि वाला होता है ॥ ४॥