भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

६६ ] [द्वितीय अध्याय प्रकाशात्मक होने के कारण यह चेतन स्वरूप है, परन्तु वेदनात्मक होने से शिला रूप है। अपने अन्तरतम में यह विभिन्न प्रकार के विश्व का उन्मेष करने वाला है। यह विश्व उसी का अपना प्रकाश मात्र होने से उससे भिन्न नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में परिलक्षित होता है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। सबसे सम्बद्ध होने के कारण उसकी गति सर्वत्र है, परन्तु उसमें गति न होने से चलता-फिरता नहीं है। निराश्रित होने से वह नास्ति रूप है, परन्तु तत्स्वरूप होने के कारण उसे अस्ति रूप मात्र हो गया है। वही धन देने वाले की महान गति है। आनन्द एवं विज्ञान रूप जो ब्रह्म है तथा जिसका ग्रहण सभी मानसिक सङ्कल्पों का त्याग मात्र ही है, मेधावी जन जिसकी प्रतीति जाग्रत अवस्था की प्रतीति न होने को ही कहते हैं तथा जिसके संकोच से प्रलय और विकास से सृष्टि की रचना होती है ॥ ६-१० ॥ निष्ठा वेदान्तवाक्यानामथ वाचामगोचरः । अहं सच्चित्परानन्दब्रह्म वास्मि न चेतरः ॥११ स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्वं विज्ञातवान् शुकः । स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ॥१२ इदं वस्त्विति विश्वासं नासावात्मन्युपाययौ । केवलं विररामास्य चेतो विषयचापलम् । भोगेभ्यो भूरिभङ्गेभ्यो धाराभ्य इव चातकः ॥१३ एकदा सोऽमलप्रज्ञो मेरावेकान्तसंस्थितम् । पप्रच्छ पितरं भक्त्या कृष्णद्वैपायनं मुनिम् ॥१४ संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने । कथं च प्रशमं याति कियत् कस्य कदा वद ॥१५ जो वेदान्त वाक्यों को निष्ठा रूप तथा वाणी के लिए अकथनीय हैं, मैं उस सत् चित् एवं परमानन्द स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं हूँ।