१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहोपनिषत् ] [ ६७ अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा श्री शुकदेव जी ने यह सब कुछ जान लिया और इस स्वयं उपलब्ध परम तत्व में वे निरन्तर लगे रहने वाले मन से युक्त हुये। उनके हृदय में इस प्रकार विश्वास जम गया कि यही वस्तु है, इनसे भिन्न कुछ नहीं है। जैसे धारा प्रवाह वर्षा से सन्तुष्ट हुये चातक की चञ्चलता दूर हो जाती है, वैसे ही शुकदेव जी का चित्त विभिन्न प्रकार के भोगों से उत्पन्न चञ्चलता से मुक्त होकर कैवल्य अवस्था को प्राप्त हुआ। उन शुकदेव जी ने एक बार मेरु पर्वत के निर्जन में स्थित अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन की कुटी में जाकर उनसे भक्तिपूर्वक निवेदन किया—'महामुने ! इस संसार रूप प्रपञ्च की उत्पत्ति किस प्रकार हुई और इसका विलय किस प्रकार होता है, यह क्या है, किसका है, इसकी उत्पत्ति कब हुई, यह सब मुझे कृपापूर्वक कहिये ॥ ११--१५ ॥ एवं पृष्टेन मुनिना व्यासेनाखिलमात्मजे । यथावदखिलं प्रोक्तं वक्तव्यं विदितात्मना ॥१६॥ अज्ञासिषं पूर्वमेवमहमित्यथ तत्पितुः । स शुकः स्वकया बुद्ध्वा न वाक्यं बहु मन्यत ॥१७॥ व्यासोऽपि भगवान् बुद्ध् वा पुत्राभिप्रायमीदृशम् । प्रत्युवाच पुनः पुत्रं नाहं जानामि तत्त्वतः ॥१८॥ जनको नाम भूपालो विद्यते मिथिलापुरे । यथावद्वेत्त्यसौ वेद्यं तस्मात् सर्वमवाप्स्यसि ॥१९॥ पित्रैत्युक्तः शुकः प्रायात् सुमेरोर्वसुधात लम् । विदेहनगरीं प्राप जनकेनाभिपालिताम् ॥२०॥ शुकदेव जी इस प्रकार जिज्ञासा देखकर आत्मज्ञानी मुनि ने सभी बातें यथावत् कहीं। परन्तु शुकदेव जी ने समझा कि यह सब बातें तो मैं पहले से ही जानता हूं और अपने पिता की बातों पर विशेष ध्यान न दिया। उनके इस भाव को व्यास जी ने समझ लिया