भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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६८ ] [ द्वितीय अध्याय और वे कहने लगे—'पुत्र मैं इन बातों को तत्वपूर्वक नहीं जानता। यदि तुम इस विषय में जिज्ञासा रखते हो तो मिथिला नरेश जनक के पास जाओ। वे इस विषय के पूर्ण ज्ञाता हैं। तुम्हें उनसे इच्छित ज्ञान की उपलब्धि होगी।' पिता के इस कथन पर शुकदेव जी मेरुपर्वत से उतरकर, समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक की मिथिला पुरी में प्रविष्ट हुये ॥ १६-–२० ॥ आवेदितोऽसौ याष्टीकैर्जनकाय महात्मने । द्वारि व्याससुतो राजन् शुकोऽत्र स्थितवानिति ॥२१॥ जिज्ञासार्थं शुकस्यासावास्तामेवेत्यवज्ञया । उक्त्वा बभूव जनकस्तूष्णीं सप्त दिनान्यथ ॥२२॥ ततः प्रवेशयामास जनकः शुकमंगणे । तत्राहानि स सप्तैव तथैवावसदुन्मनाः ॥२३॥ ततः प्रवेशयामास जनकोऽन्तःपुराजिरे । राजा न दृश्यते तावदिति सप्त दिनानि तम् ॥२४॥ तत्रोन्मदाभिः कान्ताभिर्भोजनैर्भोगसंचयैः । जनको लालयायास शुकं शशिनिभाननम् ॥२५॥ ते भोगास्तानि भोज्यानि व्यासपुत्रस्य तन्मनः । नाजुहुर्मन्दपवनो बद्धपीठमिवाचलम् ॥२६॥ केवलं सुसमः स्वच्छो मौनी मुदितमानसः । सम्पूर्ण इव शीतांशुस्तिष्ठदमलः शुकः ॥२७॥ शुकदेव जी को आया देखकर द्वारपालों ने महाराज जनक के पास जाकर निवेदन किया—'श्रीमन् महर्षि व्यासदेव जी के सुपुत्र श्री शुकदेव जी राज-द्वार पर खड़े हैं।' यह सुनकर राजा जनक ने अवज्ञापूर्ण कहा कि 'वे वहीं ठहरे रहें और सात दिन तक उनकी कोई खबर नहीं ली। आठवें दिन उन्हें राज-प्राङ्गण में बुलवा कर फिर सात दिन तक उनसे बात नहीं की। इसके बाद उन्हें अन्तःपुर