१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहोपनिषद् [ ६६ के आंगन में बुलवाया, परन्तु फिर भी सात दिन तक राजा उनके समाने नहीं आये । इसके पश्चात् बाईसवें दिन उनका युवती नारियां, विभिन्न प्रकार के भोजनों और योग्य वस्तुओं द्वारा महाराज ने सत्कार किया । परन्तु सौम्यवदन शुकदेव जी के मन में उन भोगों के प्रति कोई आकर्षण उत्पन्न नहीं हुआ । जैसे मन्द पवन दृढ़ पर्वत को नहीं डिगा सकता, वैसे ही राजा द्वारा प्रस्तुत कोई भोग साधन शुकदेव जी के मन को नहीं डिगा सकता । वे विकार रहित भाव से युक्त प्रसन्नचित्त, समभाव वाले तथा संग-दोष से रहित निर्मल पूर्णचन्द्र के समान शुभ्र तेज वाले बने रहे ॥२१-२७॥ परिज्ञातस्वभावं तं शुकं स जनको नृपः आनीय मुदितात्मानमवलोक्य ननाम ह ॥२८॥ निःशेषितजगत्कार्यः प्राप्ताखिलमनोरथः । किमीप्सितं तवेत्याह कृतस्वागतमाह तम् ॥२९॥ संसाराडम्बरमिदंकथमभ्युत्थितं गुरो । कथं प्रशममायाति यथावत् कथयाशुमे ॥३०॥ यथावदखिलं प्रोक्तं जनकेन महात्मना । तदेव यत् पुरा प्रोक्तं तस्य पित्रा महाधिया ॥३१॥ स्वयमेव मया पूर्वमभिज्ञातं विशेषतः । एतदेव हि पृष्टेन पित्रा मे समुदाहृतम् ॥३२॥ भवताऽप्येषः एवार्थः कथितो वाग्विदां वर । एष एव हि वाक्यार्थः शास्त्रेषु परिदृश्यते ॥३३॥ मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् । क्षीयते दग्धसंसारो निःसार इति निश्चितः ॥३४॥ तत् किमेतन्महाबाहो सत्यं ब्रूहि ममाचलम् । त्वत्तो विश्रममाप्नोति चेतसा भ्रमता जगत् ॥३५॥