१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [द्वितीय अध्याय महाराज जनक ने इस प्रकार श्री शुकदेव जी की परीक्षा की और जब उन्हें अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण पाया तब उन्हें अपने समीप बुलाकर प्रणाम किया और उनका सौम्य सत्कार करते हुये बोले- आपने अपने सांसारिक विषयों को समाप्त कर दिया है और आप स्वयं ही पूर्ण मनोरथ हैं, कृपया बतलाइये अब आपकी क्या कामना शेष है ? इस पर श्री शुकदेव जी ने जिज्ञासु भाव से निवेदन किया- 'हे गुरु श्रेष्ठ इस सांसारिक प्रपञ्च की उत्पत्ति किस प्रकार होती है और यह कैसे लय को प्राप्त होती है ? इस सम्बन्ध में मुझे यथार्थ बात शीघ्र ही बताने की कृपा करें।' इस पर जो बातें महान आत्मा महाराज जनक ने उन्हें बतलाईं, वे सब बातें उनके पिता परमज्ञानी व्यास जी पहले ही बता चुके थे । अतः शुकदेव जी ने कहा इन सब बातों को मैंने स्वयं जाना था, यही बातें मेरे पिता जी ने भी बतलाईं थीं, और आपने भी यही बातें मुझसे कही हैं और ऐसा ही शास्त्र कहते हैं । मानसिक संकल्प से प्रपंच की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के नष्ट होने पर प्रपंच का भी नाश हो जाता है । यह संसार निन्दनीय एवं सार-रहित है, तब यह क्या वस्तु है ? यही बात मुझे यथार्थ रूप में कहिए । मेरा यह चित्त संसार के विषय में भ्रमित हो रहा है, उसे आपके सदुपदेश द्वारा ही शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥२८-३५॥
शृणु तावदिदानीं त्वं कथ्यमानमिदं मया । श्रीशुक ज्ञानविस्तारं बुद्धिसारान्तरान्तरम् ॥ ३६ ॥ यद्विज्ञानात् पुमान् सद्यो जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥३७॥ दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् । संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृ तिः ॥३८॥ अशेषेण परित्यागो वासनाया य उत्तमः । मोक्ष इत्युच्यते सद्भिः स एक विमलक्रमः ॥३९॥