भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषत् [ १०१ ये शुद्धवासना भूयो न जन्मानर्थभागिनः । ज्ञातज्ञेयास्त उच्यन्ते जीवन्मुक्ता महाधियः ॥४०॥ पदार्थभावनादार्थं बन्ध इत्यभिधीयते । वासनातानवं ब्रह्मन् मोक्ष इत्यभिधीयते ॥४१॥ इस पर राजा जनक बोले—'हे शुकदेव जी ! अब मैं तुम्हारे प्रति ज्ञान को विस्तृत रूप से कहता हूं। यह ज्ञान सभी ज्ञानों का सार और सभी रहस्यों का रहस्य है जो पुरुष इसे जान लेता है, वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त होता है । महाराज ने कहा—'यह ज्ञान प्राप्त होने पर कि यह दृश्य जगत भ्रम है, दृश्य-विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। जब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है, तब निर्वाणमयी शान्ति प्राप्त होती है । त्याग वही परम श्रेष्ठ है जिसमें वासनाओं की पूर्ण समाप्ति की गई हो । यही श्रेष्ठ अवस्था विद्वानों द्वारा मोक्ष कही गई है। जो शुद्ध कामना से युक्त और अनर्थ-शून्य जीवन वाले हैं तथा जो जानने योग्य तत्त्व के ज्ञाता हैं, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहे जाते हैं, हे शुकदेव जी ! पदार्थ-भावना में दृढ़ता ही बन्धन है और वासनाओं के क्षय को ही मोक्ष कहा गया है ।३६-४१। तपःप्रभृतिना यस्मै हेतुनैव विना पुनः । भोगा इव न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४२॥ आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतः । न हृष्यति ग्लायति यः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४३॥ हर्षामर्षभयक्रोधकामकार्पण्यदृष्टिभिः । न परामृश्यते योऽन्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४४॥ अहंकारमयीं त्यक्त्वा वासनां लीलयैव यः । तिष्ठति ध्येयसं त्यागी स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४५॥ ईप्सितानीप्सिते न स्तो यस्यान्तर्वर्तिदृष्टिषु । सुषुप्तिवच्चरत्यन्तस्स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४६॥