भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ३ ) करने से सत्यलोक का ज्ञान होता है, धर्म तथा अधर्म से संयम करने से भूत भविष्य का ज्ञान होता है, विभिन्न प्राणियों की आवाज करने से उनकी बोली का ज्ञान होता है, संचित कर्म में संयम करने से पूर्वजन्म का ज्ञान होता है, दूसरे के चित्त में संयम करने से दूसरे के मन का ज्ञान होता है। .........कण्ठ कूप में संयम करने से भूख प्यास जाती रहती है। शरीर के आकाश में संयम करने से आकाश में गति कर सकता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों में संयम करने से वे ही सिद्धियां प्राप्त होती हैं।" —शाण्डिल्य उपनिषद् "महामुद्रा के प्रभाव से पथ्य-अपथ्य ही नहीं, सब प्रकार का नीरस भोजन भी रसवान बन जाता है, अधिक खाया हुआ और तीव्र विष भी अमृत के समान पच जाता है। क्षय, कोढ़, गुदावर्त्त, (भगन्दर) गुल्म, अजीर्ण और आगे होने वाले समस्त रोग नष्ट होजाते हैं।" —योगचूड़ामणि उपनिषद् "भगवान आदिनारायण ने कहा—योग से योग की वृद्धि होती है। इसलिये योग के द्वारा ही योग जाने। योग में सदा दत्तचित्त योगी चिरकाल तक सुखोपभोग करता है।" ---सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् "नाड़ी शुद्ध होने पर उसके चिन्ह भी दिखाई देने लगते हैं। शरीर में हलकापन जान पड़ता है, जठराग्नि तीव्र हो जाती है, शरीर भी निश्चित रूप से कृश हो जाता है।" योगी के लिये तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।......अतिमानुषी चेष्टायें करने लगता है, पर इस