भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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प्रसार कर उसे दोनों हाथों से पकड़ना और फिर दोनों नथुनों से वायु भरकर कण्ठबन्ध के ऊपर चढ़ाना और उठी हुई वायु को रोकना, इससे सर्व क्लेशों का नाश हो जाता है, विष भी अमृत को तरह पच जाता है। क्षय, गुल्म, गुदावर्त और चर्म के पुराने रोग नष्ट होजाते हैं। प्राण को जीतने का यह उपाय सर्वमृत्यु का नाश करने वाला है। “बायें पैर की ऐड़ी को गुदा-स्थान के साथ जोड़कर दाहिना पैर बांये पैर रखना और वायु भर कर ठोड़ी को हृदय की तरफ दबाकर गुदा-स्थान को संकोच कर मन के मध्य यथाशक्ति धारण करके अपने आत्मा का हवन करना, इससे अपरोक्ष सिद्धि [ सूक्ष्म जगत की जानकारी ] होती है। “जो पुरुष जीभ से वायु खींचकर निरन्तर पिया करता है, उसे श्रम का दाह नहीं होता और रोग नाश होते हैं। जो जीभ से वायु लेकर उसे जीभ के मूल में रोकता है, वह अमृत पीता है और उसका सब प्रकार कल्याण होता है। “जो मनुष्य एक मुहुर्त्त समय तक भी मन के साथ वायु को नांसाग्र पर नित्य धारण करता है, उसके संकड़ों जन्मों के पास पूर्णतः छूट जाते हैं। “नेत्र की पुतली में चित्त का संयम करने से सब विषयों का ज्ञान होता है। नाक के अग्रभाग पर चित्त का संयम करने से इन्द्रलोक का ज्ञान होता है, उसके नीचे चित्त का संयम करने से अग्निलोक का ज्ञान होता है। चक्षु में चित्त का संयम करने से सर्वलोक का ज्ञान होता है, श्रोत्र में चित्त का संयम करने से यमलोक का ज्ञान होता है। ...... बाईं आंख में संयम करने से शिवलोक का ज्ञान होता है, मस्तक में संयम करने से ब्रह्मलोक का ज्ञान होता है। ...... मस्तक में चित्त का संयम