भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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भूमिका

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साधना के सत्परिणाम

उपनिषदों में योग साधना की अनेक विधियों का वर्णन है और उनका प्रयोग करने पर जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनका भी यथास्थान संकेत है। साधना से आत्मबल बढ़ता है और उसकी अभिवृद्धि से शरीर एवं मन के प्रत्येक क्षेत्र का जाज्वल्य- मान होना स्वाभाविक है। आत्मबल संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है, वह जहाँ भी रहेगा वहां चमत्कार क्यों दृष्टिगोचर न होगा ? उपनिषदों में वर्णित योग साधनाओं का अपना महत्व है और साथ ही उस महत्व के अनुरूप अनेक प्रकार के लाभों का भी समन्वय है। साधना-खण्ड के उपनिषदों में साधना द्वारा लौकिक और पारलौकिक अनेक प्रकार के लाभों की चर्चा स्थान-स्थान पर मिलती है। उनकी एक झाँकी नीचे प्रस्तुत है:— “जीभ और चित्त दोनों कपाल के छिद्र रूप आकाश में फिरते हैं, तब ऊपर गई हुई जीभ वाला यह पुरुष अमर हो जाता है।‘" ‘बांये पैर के मूल से मूलरंध्र को दबाकर दाहिना पैर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi