भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषत् ] [ १०३ सममेव मनो यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५९॥ न किंचन द्वेष्टि तथा न किंचिदपि काङ्क्षति । भुङ्क्तेयः प्रकृतान् भोगान् स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६०॥ शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः । यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६१॥ यः समस्तार्थ जालेषु व्यवहार्यपि निस्पृहः । परार्थेष्विव पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६२॥ जीवन्मुक्त वही है जो तप आदि साधनों के बिना, स्वभाव से ही सांसारिक भोगों से विरक्त है । समय-समय पर मिलने वाले सुख अथवा दुःख में जो आसक्त नहीं होता तथा जो सुख से हर्षित अथवा दुःख से दुःखित नहीं होता, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है । ऐसा पुरुष काम, क्रोध, हर्ष, उद्वेग, शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है और अहंकारयुक्त वासना को स्वभाव से ही त्याग देता है । चित्त के अवलम्बन में जो सदा त्याग-भाव रखता है, वही जीवन्मुक्त है । जो सदा अन्तर्मुखी दृष्टि वाला, पदार्थ-आकांक्षा से रहित, किसी वस्तु की कामना या उपेक्षा से शून्य सुषुप्ति के समान अवस्था में स्थित रहने वाला है, वह जीवन्मुक्त है । जो पूर्ण पवित्र मन वाला, सदा आत्मा में लीन रहने वाला, अत्यन्त शांत अवस्था में रहने वाला, कामना और आसक्ति से रहित सदा उदासीन रहता, वह जीवन्मुक्त है । जिसका हृदय किसी पदार्थ में लिप्त नहीं रहता और चेतन संवित् स्वरूप वाला है, वह जीवन्मुक्त है । जो किसी कार्य में फलाफल की अपेक्षा नहीं करता तथा जो राग-द्वेष से रहित, सुख-दुःख से निरपेक्ष, और धर्माधर्म में निर्लिप्त है वह जीवन्मुक्त है । जिसने अहंकार के भाव का परित्याग कर दिया है, जो मान-मत्सर के विकार से मुक्त हो गया है, जो उद्वेग-रहित होकर कर्म में रत हैं, उसे ही ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं। जो मोह रहित रहकर साक्षी के समान जीवन व्यतीत करता है और बिना किसी Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi