भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषत् । [१०७ देशे स्थित्वा शशामासावात्मन्यस्नेहदीपवत् ॥७६ व्यपगतकलनाकलंकशुद्धः स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ । सलिलकण इवाम्बुधौ महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥ इति महोपनिषत् ॥७७ यह सुनकर शुकदेव जी शोक, भय, संशय और श्रमादि से रहित होकर कामना-हीन होगये और परतत्व रूप आत्मा में स्थित होकर मेरु पर्वत पर चले । वहाँ वे आत्म-देश में हजारों वर्षों तक स्थित रहे और उस निर्विकल्प समाधि के द्वारा उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई । जैसे समुद्र में जल-कण विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं, जैसे ही शुकदेव जी संकल्प रूप दोषों से मुक्त शुद्ध स्वरूप होकर वासना विहीन होते हुए पवित्र और निर्मल आत्मपद में एकीभाव को प्राप्त होगए ॥७४-७७॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ तृतीयोऽध्यायः निदाघो नाम मुनिराट् प्राप्तविद्यश्च बालकः । विहृतस्तीर्थ यात्रार्थं पित्राऽनुज्ञातवान् स्वयम् ॥१ सार्धत्रिकोटितीर्थे स्नात्वा गृसमुपागतः । स्वोदन्तं कथयामास ऋभुं नत्वा महायशाः ॥२ सार्धत्रकोटीतीर्थेषु स्नानपुण्यप्रभावतः । प्रादुर्भूतो मनसि मे विचारः सोऽयमीदृशः ॥३ जायते मृतये लोको म्रियते जननाय च । अस्थिराः सर्वं एवेमे सचराचरचेष्टिताः ॥४ सर्वापदां पदं पोपा भावा विभवभूमयः । अयः शलाकासदृशाः परस्परमसङ्गिनः । श्लिष्यन्ते केवला भावा मनः कल्पनयाऽनया ॥५ भावेष्वरतिरायाता पथिकस्य मरुष्विव ।