भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 572 में से

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१०६ ] [ द्वितीय अध्याय CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri एवं अन्धकार का भी अस्तित्व नहीं होता। उसमें अभिव्यक्त न होने वाला तथा अनिर्वचनीय सत् शेष रहता है। उसका न कोई आकार है और न शून्य ही है, वह न अदृश्य है और न दिखाई ही देता है। वह भूत आदि के समूहों से रहित तथा सत् रूप अनन्त में स्थित होता है। उस विचित्र तत्व के स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। उसकी आकृति पूर्ण से भी अत्यन्त पूर्ण है। वह सत्, दोनों में से कुछ भी नहीं होता और सत् असत् दोनों के योग से भी परे है। उसमें भावना का भी अभाव होता है। वह चित्त रहित और अनन्त होता है। तथा चेतनामात्र है। वह शिवस्वरूप, जरारहित और कल्याणकारी है। आदि, मध्य और अन्त से भी परे है। वह दोषों से मुक्त तथा अनादि है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन में उसे केवल दर्शन रूप कहा गया है। हे शुकदेव जी ! इस सम्बन्ध में इतना ही कहा जाता है। तुम इस तत्त्व के स्वयं जानने वाले हुए हो और तुमने अपने पिता से भी सुना है कि संकल्प से ही जीव बंधन में पड़ता और संकल्पों का त्याग करने पर मुक्ति को प्राप्त होता है। जिस तत्व का बोध होने पर सज्जनों को सांसारिक दृश्य प्रपंचों में विरक्ति हो जाती है, उस तत्त्व को तुमने स्वयं ही जान लिया है। तुम पूर्ण चेतना को उपलब्ध कर पाने योग्य वस्तु को प्राप्त कर चुके हो। तुम अपने भ्रम का त्याग करो, तुम तप स्वरूप में स्वयं स्थित हो इसीलिये मुक्त भी हो। हे शुकदेव जी ! तुम बाह्य तथा आन्तरिक और अत्यन्त आंतरिक दृश्य को देखते हुए भी उसे नहीं देखते, क्योंकि तुम कैवल्य स्थिति में साक्षिमात्र रूप से ही अवस्थित हो ॥ ६३—७३ ॥ विशश्राम शुकस्तूष्णीं स्वस्थे परमवस्तुनि । वीतशोकभयायासो निरीहश्छिन्नसंशयः ॥७४ जगाम शिखरं मेरोः समाध्यर्थमखण्डितम् ॥७५ तत्र वर्षसहस्राणि निर्विकल्पसमाधिना । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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