भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषत् [ १०६ भी अत्यन्त मोह उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही उनके द्वारा जीव को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। जैसे प०त्ते के अग्रभाग में जो जल की बूँद लटकती हैं वह क्षणभंगुर है, वैसे ही मनुष्य की आयु भी क्षणभंगुर है। इसलिये असमय ही इस देह को त्याग कर मुझे उन्मत्त के समान प्रस्थान करना पड़ेगा। जिनका मन विषयरूपी सर्प के सङ्ग से जीर्ण होगया है और जिनको आत्म विवेक की प्राप्ति नहीं हुई, उनका जीवन कष्ट का ही कारण बना है ॥९—१०॥ युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्यः च खण्डनम्। ग्रथनं च तरंगाणामास्था नायुषि युज्यते ॥११ प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते। पराया निर्वृतेः स्थानं यत्तज्जीवितमुच्यते ॥१२ तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः। स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥१३ जातास्त एव जगति जन्तवः साधुजीविताः। ये पुनर्नैह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ॥१४ भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिणः। अशान्तस्य मनो भारं भारोऽनात्मविदो वपुः ॥१५ अहंकारवशादापदहंकाराद्दुराधयः। अहंकारवशादीहा नाहंकारात् परो रिपुः ॥१६ अहङ्कारवशाद्यच्चन्मया भुक्तं चराचरम्। तत्तत् सर्वंभवस्त्वेव वस्त्वहंकाररिक्तता ॥१७ इतश्चेतश्च सुव्यग्रं व्यर्थमेवाभिधावति। मनो दूरतरं याति ग्रामे कौलेयको यथा ॥१८ क्रूरेण जनतां याता (तः) तृष्णाभार्याऽनुगामिना। वशां कौलेयकेनैव ब्रह्मन् भुक्तोऽस्मि चेतसा ॥१९ अध्यंष्ठिपमात्म्हतः सुमेरूमूलनादपि