१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें११० ] [तृतीय अध्याय अपि वह्न्यशनाद्ब्रह्मन् विषमश्चित्तनिग्रहः ॥२० चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन् सति जगत्त्रयम् । तस्मिन् क्षीणे जगत् क्षीणं तच्चिकित्स्यं प्रयत्नतः ॥२१ वायु का लपेटना, आकाश के टुकड़े-टुकड़े करना और लहरों का गूंथना भले ही सम्भव हो जाय, परन्तु जीवन में आस्था रखना मेरे लिए सम्भव नहीं है। जिसके द्वारा पाने योग्य वस्तु को भले प्रकार पा लिया जाय, जिसके कारण फिर शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति की उपलब्धि हो, वही तो जीवन है। वैसे तो वृक्ष और पक्षी भी जीवित रहते हैं, परन्तु यथार्थ में वही जीवित है जो आत्म चिन्तन में लीन है। इस विश्व में जो उत्पन्न हुये हैं, उनमें उन्हीं जीवों का जीवन श्रेष्ठ है जिन्हें आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ता। इनसे भिन्न तो जरावस्था प्राप्त गधे के समान है जो असक्त होते हुये भी बोझा ढोने के लिए विवश हैं। ज्ञानी जन के लिये शास्त्र बोझा के समान हैं, राग-द्वेष से युक्त पुरुष के लिये ज्ञान बोझ रूप है। जो अशान्त है, उसका मन ही बोझ रूप है और जो आत्मज्ञान से हीन हैं, उनके लिए यह देह भी बोझ ही है। अहंकार सब दुःखों का कारण है। उससे विपत्ति प्राप्त होती है, दुष्ट मनोविकारों की उत्पत्ति होती है और विभिन्न कामनाओं का प्रादुर्भाव होता है, इसलिये मनुष्य का इससे अधिक कोई शत्रु नहीं है। अहङ्कार के वशीभूत हो मैंने जिन-जिन भोगों का उपभोग किया, वे सभी मिथ्या थे। अहंकार-शून्यता ही जीवन की यथार्थता है। व्यग्रता के वश पड़कर यह मन व्यर्थ ही इधर-उधर भ्रमता है। यह विभिन्न ग्रामों में घूमते-फिरने वाले कुत्ते के समान दूर-दूर तक भ्रमण करता है। मैं भी तृष्णा रूप कुतिया के पीछे कुत्ते के समान भटकता हुआ जड़वत् होगया था। परन्तु अब मैं उनके प्रभाव से मुक्त होगया हूँ। चित्त को नियन्त्रित करना सुमेरु पर्वत को समूल उखाड़ने अथवा समुद्र के सम्पूर्ण जल का पान कर लेने से भी अधिक दुष्कर है। अग्नि का भक्षण