१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें११६ ] [ तृतीय अध्याय CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आपदः क्षणमायान्ति क्षणमायान्तिः संपदः । क्षणं जन्मथ मरणं सर्वं नश्वरमेव तत् ॥५३ अशूरेण हताः शूरा एकेनापि शतं हतम् । विषं विषयषवैम्यं न विषं विषमुच्यते ॥५४ जन्मान्तरघ्ना विषया एकजन्महरं विषम् । इति मे दोषदावाग्निदग्धे संप्रति चेतसि ॥५५ स्फुरन्ति हि नभोगाशा मृगतृष्णासरःस्वति । अतो मां बोधयाशु त्वं तत्वज्ञानेन वै गुरो ॥५६ नो चेन्मौनं समास्थाय निर्मानो गतमत्सरः । भावयान् मनसा विष्णुं लिपिकर्म्मार्पितोपमः ॥५७ यह जगत् नाशवान् है । जब यह अदृश्य होता है तब दिशायें भी दिखाई नहीं देतीं, देश भी काल के गाल में समा जाते हैं, पर्वत खण्ड-खण्ड होते और तारे भी टूट-टूट कर गिर जाते हैं, समुद्रों में जल नहीं रहता और ध्रुवतारा भी लुप्त हो जाता है। दानवों का अन्त समय आता है और सिद्ध पुरुष भी मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं । अजन्मा विष्णु और चिरस्थायी ब्रह्मा भी अन्तर्ध्यान हो जाते हैं । जैसे जल बड़वा- नल की ओर दौड़ता है वैसे ही देवता मनुष्य तथा अन्य सभी प्राणी विनाश की ओर दौड़ते हैं । उस समय सभी भाव अभाव बन जाते हैं । आपत्तियां क्षण-भर में विपत्तिग्रस्त करती हैं तो क्षण-भर में सम्पूर्ण वैभव की प्राप्ति हो जाती है। क्षण-भर में जन्म और क्षण-भर में मृत्यु होती है । यह सभी प्रपंच नाशवान् हैं । यहाँ कायरों द्वारा शूरवीरों का संहार होता है । कभी-कभी एक ही संकड़ों को मार गिराता है । इस प्रकार सर्वत्र विषमता छाई हुई है । विषय वासनाओं से चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विष रूप है। परन्तु, विष इतना भीषण नहीं है, क्योंकि वह जन्म को ही नष्ट करता है और विषय रूपी विष तो जन्म-जन्मान्तरों का विनाश कर देने वाला है । मेरा चित्त दोष रूप Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi