१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहोपनिषत् ] [ १३१ सकते हैं । जिसके पास ज्ञान के चक्षु नहीं, उस अन्धे मनुष्य को प्रकाश- मान सूर्य के दर्शन न होने के समान ही परब्रह्म के दर्शन नहीं होते । वही ब्रह्म प्रज्ञान रूप है, सत्य का लक्षण भी प्रज्ञान ही है । मरणधर्मा मनुष्य ब्रह्म के ज्ञान से ही अमरत्व को पाता है । वह ब्रह्म कार्य कारण रूप है, उसका साक्षात्कार होते ही प्राणी के सब संशय दूर होते और कर्मों का क्षय हो जाता है तथा इसी से हृदय-ग्रन्थियां भी स्वयं खुल जाती हैं ॥६१-८२॥ अनात्मतां परित्यज्य निर्विकारो जगत्स्थितौ । एकनिष्ठतयाऽन्तःस्थसंविमात्रपरो भव ॥८३ मरुभूमौ जलं सर्वं मरुभूमात्रमेव तत् । जगत्त्रयमिदं सर्वं चिन्मात्रं स्वविचारतः ॥८४ लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत् केवलात्मना । शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ॥८५ अधिष्ठानमनौपम्यमवाङ् मनसगोचरम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ॥८६ सर्वं शक्तेर्महेशस्य विलासो हि मनो जगत् । संयमासंयमाभ्यां च संसार शान्तिमन्वगात् ॥८७ हे पुत्र ! सांसारिक स्थिति में निर्विकार भाव से अनात्म के त्यागपूर्वक, आत्म चैतन्य में ही रमते रहो । जैसे मरुभूमि में भ्रमपूर्वक दिखाई देने वाला जल केवल स्थल ही रहता है, वैसे ही जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तावस्थां वाला यह सम्पूर्ण संसार आत्म चिंतन द्वारा चिन्मय की समझना चाहिये । श्रेष्ठ ज्ञानी एवं शिव रूप वही प्राणी है जो लक्ष्यालक्ष बुद्धि का त्याग कर केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है । संयम और असंयम के द्वारा सांसारिक प्रपञ्च शान्त हो जाता है, क्योंकि यह विश्व सर्व शक्तिमान महान् ब्रह्म का मनोविलास ही है । इसका अधि- ष्ठान अनुपम है, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा अव्यय स्वरूप है ॥८३-८७॥