भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

महोपनिषत् ] [ १३३ तदेव च तपः शास्त्रसिद्धान्ते मोक्ष उच्यते ॥१०० तस्य चंचलता यैषा त्वविद्या वासनात्मिका । वासनाऽपरनाम्नीं तां विचारेण विनाशय ॥१०१ मन में उत्पन्न हुए विकार का उपाय मैं तुम्हारे प्रति कहता हूँ। जिन-जिन वस्तुओं की प्राप्ति के लिये यह मन चञ्चल हो उन-उन वस्तुओं का त्याग कर देना मोक्ष का एक सरल साधन है। जिसके लिए इच्छित वस्तु के त्याग की भावना, एकान्त प्रियता और आत्मा की आधीनता दुष्कर है, वह पुरुष रूप कीड़ा धिक्कार का ही पात्र है । अपनी इच्छित वस्तु का अपने प्रयत्न से त्याग करना ही मन की शान्ति का श्रेष्ठ उपाय है। इसके सिवा अन्य गति नहीं है। संकल्प शून्यता रूपी अस्त्र जब इस चित्त को काट डालता है, तब सर्वरूप, सर्व अन्त- र्यामी परब्रह्म प्राप्त होते हैं। इसलिए प्रपंच की भावना का त्याग कर श्रेष्ठ बुद्धि वाले होओ और मन को नियन्त्रित कर चिन्मात्र में स्थित हो जाओ। वैराग्य के आश्रम और अभ्यास के सहारे चित्त को अचित्ता- वस्था में स्थित कर हृदयाकाश में ध्यान करे और चेतन में निरत चित्त रूपी चक्र की तीक्षण धार से मन का दमन कर डाले। ऐसा करने से शंका नष्ट हो जायेगी और काम आदि शत्रु बन्धन में न डाल सकेंगे। तेरा मेरा की भावना ही मन है और जब इनका त्याग कर दिया जाता है तब मन का स्वतः नाश हो जाता है। जैसे शरद् ऋतु में छिन्न भिन्न हुए बादल वायु की ठोकरें खाकर आकाश में ही लय हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा मन भी लीन हो जाता है। मन से रहित पुरुष को कोई हानि नहीं हो सकती, चाहे सम्पूर्ण समुद्र एक होकर सर्वत्र जलमयी सृष्टि ही क्यों न कर दें, चाहे प्रलयकालीन उपन्चासों पवन वेग पूर्वक क्यों न बहने लगें, चाहे बारहों आदित्य मिलकर घोर उष्णता क्यों न उत्पन्न कर डालें। केवल संकल्पहीनता ही सम्पूर्ण सिद्धियों का साधन है। अतः संकल्पहीनता में मग्न होकर रहो । जैसे अग्नि का