१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ ] [ चतुर्थ अध्याय
परं पौरुषमाश्रित्य यत्नात् परमया धिया । भोगेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा निर्विकल्पः सुखो भव ॥१२६ मम पुत्रो मम धनमहं सोऽयमिदं मम । इतीयमिन्द्रजालेन वासनैव विवल्गति ॥१२७ मा भवाज्ञो भव ज्ञस्त्वं जहि संसारभावनामू । अनात्मन्यात्मभावेन किमज्ञ इव रोदिषि ॥१२८ कस्तवायं जडो मूको देहो मांसमयोऽशुचिः । मदर्थं सुखदुःखाभ्यामवशः परिभूयसे ॥१२६ अहो नु चित्रं यत् सत्यं ब्रह्म तद्विस्मृतं नृणाम् । तिष्ठतस्तव कार्येषु माऽस्तु रागानुरञ्जनम् १३० अहो नु चित्रं पद्मोत्थैर्बद्धास्तन्तुभिरद्रयः । अविद्यमाना याऽविद्या मया विश्वं खिलीकृतम् । इदं तद्द्भूजतां यातं तृणमात्रं जगत्त्रयम् ॥१३१
अपने को ब्रह्म न मानना अथवा ब्रह्म से भिन्न मानना ही मन को बन्धन में डालने वाला है। इसके विपरीत 'ब्रह्म ही सब कुछ है' ऐसा सङ्कल्प मन को मुक्त कर देता है। अपने शरीर की चिन्ता करने और सांसारिक बातों पर ध्यान देने से ही प्राणी बन्धन में पड़ जाता है। परन्तु देह की चिन्ता से मुक्त और सांसारिक बातों से परे रहने वाला प्राणी सदा मुक्त रहता है। जो अपने को मांस-रक्त का पुतला न मानकर उससे भिन्न होने का भाव रखे, उसके अन्तःकरण से अविद्या का क्षय हो जाता है और वही प्राणी मुक्ति को प्राप्त होता है। अनात्म पदार्थों में आत्म-भाव रहना ही अविद्या जनित कल्पना है। इससे परे जो पुरुष अभ्यास और वैराग्य के सहारे से बुद्धिपूर्वक भोगेच्छा का बलात् दमन कर निर्विकल्प हो जाता है, वही सुखी है। मेरा रूप ममत्व वासना का ही रूप है, तथा यह सब माया का ही खेल समझना