१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहोपनिषत् [१३६ चाहिये, इसलिये सांसारिक मोह ममता रूप विकारों का त्याग कर देना चाहिये । हे पुत्र ! तुम अज्ञानी न बनो, अनात्म पदार्थ में आत्म- भावना करके रोना ही मूर्खता है। यह जड़ देह तुम्हारा कोई भी नहीं है। यह तो माँस-पिण्ड मात्र है। घोर अपवित्र और मूक है, इसके लिए व्यर्थ ही क्यों दुःख-सुख के चक्र में पड़े हो । कितना आश्चर्य है कि लोग परम सत्य ब्रह्म को भुला कर देह रूप जाल में फँस रहे हैं। हे मुने ! तुम ज्ञानवान् होओ। कर्तव्य कर्मों में लग कर भी मन को उन कर्मों में कभी भी लिप्त न होने दो। जो अविद्या अस्तित्वहीन है, उसी के द्वारा यह संसार अभिभूत हो रहा है मानो कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत बाँध दिये गये हों। तृण के समान जाग्रत, स्वप्न सुषुप्तावस्था वाला विश्व उस अविद्या के प्रभाव से ही वज्र के समान हो गया है ॥ १२२-१३१ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥
पंचम अध्यायः
अथापरं प्रवक्ष्यामि शृणु तात यथातथम् । अज्ञानभूः सप्तपदा ज्ञभू सप्तपदैव हि ॥१॥ पदान्तराण्यसंख्यानि प्रभवन्त्यन्यथैतयोः । स्वरूपावस्थितिर्मुक्तिस्तद्भ्रंशोऽहंत्ववेदनम् ॥२ शुद्धसन्मात्रसंवित्तेः स्वरूपात्र चलन्ति ये। रागद्वेषादयो भावास्तेषां नाज्ञत्वसंभावाः ॥३ यः स्वरूपपरिभ्रंशश्चैत्यार्थे चितिमज्जनम् । एतस्मादपरो मोहो न भूतो न भविष्यति ॥४ अर्थादर्थान्तरं चित्ते याति मध्ये तु या स्थितिः । सा स्वभावसत्तैकाकारा स्वरूपस्थितिरुच्यते ॥५