१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) "जब वह नाद, अक्षर में लय हो जाता है तब शब्द रहित परम पद का रूप होता है। अनाहत शब्द से भी परे जो शब्द है उसके पाने से ही योगी के संशय की निवृत्ति होती है।" --ध्यानबिन्दु उपनिषद् "तालु मूल के ऊर्ध्व भाग में महाज्योति-किरण -मण्डल होता है, वही योगियों का लक्ष है। उसी से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। जब साधक की अन्तर और बाह्य लक्ष्य को देखने वाली दृष्टि स्थिर हो जाती है तब शाँभवी मुद्रा होती है। इस मुद्रा से युक्त ज्ञानी के निवास करने की भूमि पवित्र मानी जाती है और लोग उसके दर्शन से ही पवित्र हो जाते हैं।" —अद्वयतारकोपनिषद् "आरम्भिक अभ्यास में यह नाद कई तरह का होता है। पहले तीव्र होता है पीछे अभ्यास से वह धीमा होता जाता है। इस नाद की ध्वनि झींगुर, झरना, भ्रमर, वीणा, वंशी, घुंघरु आदि की तरह सुनाई देती है। भ्रमर जिस तरह फूलों का रस ग्रहण करता हुआ गंध की अपेक्षा नहीं करता, उसी तरह नाद में रुचि लेने वाला चित विषय वासना की दुर्गन्ध की इच्छा नहीं रखता। जिस तरह सर्प नाद को सुनकर मस्त होजाता है, उसी तरह चित्त उस नाद में आसक्त होकर सभी प्रकार की चंचलतायें भूल जाता है और एकाग्रता आने लगती है। वासनाओं के वन में घूमने वाला मन रूपी हाथी नाद के अभ्यास रूपी अंकुश से ही काबू में आ पाता है। जब शब्दों के साथ मिला हुआ नाद