भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

( ६ ) में मति होती हैं। जब ईशानकोण में वैडूर्य मणि के वर्ण के दल में निवास करता है तब दान, दया, एवं करुणा में मति होती है। संधियों में संधि की मति रहती है, तब वात, पित्त, कफ सम्बन्धी व्याधियों का प्रकोप होता है। जब मध्य में मति रहती है तब गाने, नृत्य करने, पढ़ने और आनन्द करने में मति होती है।" --ध्यानबिन्दु उपनिषद् मूलाधार में वीणा से उठने वाला अमूर्तनाद जान पड़ता है। उसी के मध्य में शङ्ख आदि के समान ध्वनि होती है। कपाल कुहर के मध्य में आकाश रन्ध्र से जाता हुआ नाद मोर के शब्द तुल्य होता है।" --ध्यानबिन्दु उपनिषद् "जिह्वा को लौटकर कपाल कुहर में ले जाय और दोनों भाहों के मध्य में दृष्टि को जमाकर रखे। इसके अभ्यास से रोग और मरण का भय नहीं रहता है और निद्रा भूख प्यास भी नहीं सताती। खेचरी मुद्रा द्वारा जिसने तालु के छेद को बन्दकर लिया है, उसका वीर्य क्षय नहीं होता है चाहे वह स्त्री का आलि- ङ्गन ही क्यों न करे और जब तक वीर्य देह में स्थित है तब तक मृत्यु का भय कैसा ? जब तक खेचरी मुद्रा रहेगी तब तक वीर्य पतन नहीं हो सकता।" --ध्यानबिन्दु उपनिषद् जिसने खेचरी द्वारा जिह्वा के ऊपरी विवर को बन्दकर लिया है उसका बिन्दु (वीर्य) फिर किसी तरह नष्ट नहीं हो सकता। रमणी के आलिङ्गन का भी उस पर प्रभाव नहीं पड़ता। जब तक देह में वीर्य स्थित है तब तक मृत्यु का क्या भय है?" --योगचूड़ामणि उपनिषद्