१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ पंचम अध्याय इस प्रकार मोह के चार भेद हैं। परन्तु यह परस्पर मिल मिलकर अनेक रूप वाले हो जाते हैं। अब मैं इन सबके पृथक-पृथक लक्षण तुम्हारे प्रति कहता हूँ। प्रथम बीज जाग्रत अवस्था वह है जो नाम रहित, विकारहीन चेतन में चित् की होने वाली चित्त, जीव नाम शब्द और अर्थ की दृष्टि वाली अवस्था होती है। ज्ञाता की यह नवीन अवस्था है। इस अवस्था के पश्चात् जाग्रत अवस्था होती है। अपने अन्तर में तेरा मेरा के भावों की स्थिति ही मोह की यह द्वितीय अवस्था है। यह अतिरिक्त भावनाओं से पूर्व होती है। महा जाग्रत अवस्था वह है जिसमें 'यह वह है' 'मैं यह हूँ अथवा यह वस्तु मेरी है' आदि पूर्व जन्मों के संस्कार सहित भावनाएं उत्पन्न होती हैं। जाग्रत स्वप्न अवस्था चौथी है। रूढ़ारूढ़ एवं मनोमय सृष्टि की अपना ही इसका रूप है। इसमें एक चन्द्रमा के स्थान पर दो चन्द्रमाओं का आभास, सीप में चाँदी का आभास और मृग तृष्णा में जल का आभास होता है। इस प्रकार जाग्रत स्वप्न के अनेक प्रकार हैं। स्वप्नावस्था वह है जिसमें देखा हुआ दृश्य फिर दिखाई न दे और जागने पर मनुष्य को उस दृश्य की स्मृति मात्र ही रह जाय। इस स्वप्नावस्था के पश्चात् जो अवस्था होती है उसमें पूर्ण विकसित न हुआ स्वप्न जो विभिन्न कार्य कलापों के साथ देर तक टिके तथा जो जाग्रत के समान ही प्रकट हो अथवा जाग्रत अवस्था में ही स्वप्न दिखाई दे उसे ज्ञानीजन, स्वप्न जाग्रत कहते हैं। जब प्राणी इन छः अवस्थाओं को पार कर सकता है और जड़ात्मक स्थिति में अवस्थित होता है, उस विगत दुःख बोध वाली अवस्था को ही सुषुप्ति कहते हैं। ऐसी अवस्था में यह विश्व आंतरिक अन्धकार में छुप जाता है। हे ब्रह्मन् ! हे पुत्र ! मैंने तुम्हारे प्रति अज्ञान की यह सात भूमिकायें बतलाई हैं। इनमें से प्रत्येक भूमिका विविध ऐश्वर्यों वाली, विभिन्न अवस्थाओं के रूप में असंख्य रूप धारण करने वाली है। अब मैं तुम्हें ज्ञान की सात भूमिकाओं की बात सुनाता Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi