भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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महोपनिषत् [ १६५ है। वह शरीर ही अहङ्कार कलाओं से युक्त और बुद्धिबीज से समन्वित पुर्यष्टक कहा गया है। वह प्राणियों के हृदय कमल में मँडराने वाले भौंरे के समान है। जैसे पाक कराने पर विल्वफल स्थूलता को प्राप्त होता है वैसे ही उस सूक्ष्म शरीर में तीव्र संवेगात्मक तेजस्वी शरीर की भावना होने पर स्थूल हो जाता है। वह तेज उस स्वच्छ आकाश में मूषा में लगाये हुये सोने के समान स्फुरित होता और अपने स्वभावा- नुकूल ही गठित हो जाता है। वह ऊपर सिर के समान, नीचे पांवों के समान, पार्श्वों में भुजाओं और मध्य में उदर के समान होता जाता है। इस प्रकार पूर्ण शरीर को प्राप्त हो जाता है। वही शरीर बुद्धि, बल, वीर्य, उत्साह, विज्ञान एवं वैभव से सम्पन्न हुआ सब लोकों का पितामह ब्रह्मा बन जाता है ॥ १३४-१५७ ॥

अवलोक्य वपुर्ब्रह्मा कान्तमात्मोयमुत्तमम् ।।१५८ चिन्तामभ्येत्य भगवांस्त्रीकालामलदर्शनः । एतस्मिन् परमाकाशे चिन्मात्रैकात्मरूपिणि ।।१५६ अदृष्टापारपर्यन्ते प्रथमं किं भवेदिति । इति चिन्तितवान् ब्रह्मा सद्योजातामलात्महक् ।।१६० अपश्यत् सर्गवृन्द्वानि समतीतान्यनेकंशः । स्मरत्यथो स सकलान् सर्गधर्मगुणक्रमात् ।।१६१ लीलया कल्पयामास चित्राः संकल्पतः प्रजाः । नानाऽऽचारसमारम्भा गन्धर्वनगरं यथा ।।१६२ तासां स्वर्गापवर्गार्थं धर्मकामार्थसिद्धये । अनन्तानि विचित्राणि शास्त्राणि समकल्पयत् ।।१६३ विरिञ्चिरूपान्मनसः कल्पितत्वाज्जगत्स्थितेः । तावत्स्थितिरियं प्रोक्ता तन्नाशे नाशमाप्नुयात् ।।१६८ न जायते न म्रियते क्वचित् किंचित कदाचन ।