भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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लोकान्तरों में भ्रमण कर सकना, अपने तेजस को बाहर योजन प्रदेश तक फैलाकर उस क्षेत्र के दुख तथा अभावों को दूर कर सकना, शरीरस्थ देवताओं का साक्षात्कार । (६) देव सिद्धि—देवताओं, यक्ष, गन्धर्व, प्रेत, पिशाच, बेताल, ब्रह्म राक्षस छाया पुरुष आदि का अनुग्रह, स्वामित्व और सहयोग प्राप्त करना । मन्त्र सिद्धि । सिद्ध योगियों का ब्रह्म रन्ध्र में सम्बन्ध सान्निध्य, षट चक्रों और कुण्डलिनी शक्ति का जागरण । (७) शरीर सिद्धि—दृष्टि या स्पर्श मात्र से दूसरों को निरोग और कष्ट मुक्त कर देना, अपार शारीरिक बल, अद्भुत मनोबल, चिन्तन में थकान न होना, निर्वाध भाषण, शाप से दूसरों को नष्ट कर सकना, स्पर्श से पदार्थों का स्वादिष्ट और सुगन्धित हो जाना, स्वल्प आहार से बहुतों को तृप्त कर देना, वाणी से कहे हुये वचनों तथा आशीर्वादों का सफल होना, शरीर का कायाकल्प, दीर्घ जीवन या अमर होना । (८) विक्रिया सिद्धि—अपने शरीर को अन्य शरीरों में परिवर्तित कर लेना, दूसरों के शरीरों को परिवर्तित कर देना, शरीर को अति भारी, अति हल्का, अति सूक्ष्म, अति विशाल बना सकना, अन्तर्ध्यान हो जाना, सर्व वशीकरण, सब कामनाओं की पूर्ति के साधन जुटाना । किन्हीं ग्रन्थों में दूसरी आठ सिद्धियाँ गिनाई गई हैं, वे इस प्रकार हैं :— (१) अणिमा—शरीर को अणु के समान सूक्ष्म कर लेना । (२) महिमा—शरीर को बहुत बड़े आकार का बना लेना ।