भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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संभव है और सिद्धि साधना के ऊपर टिकी हुई है। कठिन तपश्चर्या द्वारा ही उसे उपार्जित या उपलब्ध किया जा सकता है। उपहार के रूप में वह किसी को नहीं मिलती। साधना मार्ग के पथिकों को समयानुसार जो सिद्धियाँ मिलती हैं, उनका वर्णन योगशास्त्रों में मिलता है। उनकी संख्या आठ है, इन्हें अष्ट सिद्धियां भी कहते हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है :— (१) आत्म सिद्धि—इन्द्रिय संयम, मनोनिग्रह, स्थित- प्रज्ञता की प्राप्ति, समाधि, आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, तत्व ज्ञान, भूतजय, मोक्ष, पंच क्लेशों से निवृत्ति, भव बन्धनों से मुक्ति, संसार की किसी भली-बुरी परिस्थिति का प्रभाव ग्रहण न करना। (२) विविधा सिद्धि—पंच तत्वों पर नियन्त्रण, उनके द्वारा अभीष्ट वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकना, दूसरों के मन में अपनी भावना तथा मान्यता की स्थापना। (३) ज्ञान सिद्धि—तीक्ष्ण बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति, भूतकाल में हुई तथा भविष्य में होने वाली घटनाओं को जान सकना, दूरस्थ और समीपवर्ती परिस्थितियों का समान रूप से साक्षात्कार, पूर्वजन्मों का वृत्तान्त जानना, सब प्राणियों के मनो- गत भावों को जानना, शास्त्रों का सार दर्शन, अन्तःकरण में वैराग्य और निस्पृह प्रेम। (४) तप सिद्धि—कठोर तप कर सकने की शक्ति, सर्दी- गर्मी को बिना कष्ट के सहन, भूख प्यास कर नियन्त्रण, जल थल और आकाश पर विचरण कर सकना। (५) क्षेत्र सिद्धि—थोड़े स्थान में बहुत विस्तृत वस्तुओं का समा सकना, सूक्ष्म शरीर द्वारा देश देशान्तरों और लोक

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