भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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उसे ही प्राप्त करना है। ८४ प्रकार के योग उसी लक्ष तक पहुँचने के मार्ग हैं। इस मंजिल तक पहुँचाने में योग साधना ही एक मात्र अवलम्बन है। साधना मार्ग पर चलते हुये मील के पत्थरों की तरह अनेक छोटी-मोटी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती हैं। इनसे लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख शान्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। सिद्धियों का वर्णन सभी योग ग्रन्थों में मिलता है। योगी और सिद्ध पुरुषों में कुछ विलक्षण प्रतिभा, सामर्थ्य एवं शक्ति देखी भी जाती है। उनमें सामान्य मनुष्य की अपेक्षा कुछ विशेष आत्मबल होता है, जो विविध रूपों में परिलक्षित होता है। सिद्ध पुरुष अपनी उपार्जित सिद्धियों का लाभ अपने निज के लिये नहीं उठाते पर उससे दूसरे सत्पात्रों को लाभान्वित करते रहते हैं। अपना आत्मबल देकर दूसरों की आत्मा को ऊपर उठा देने की महान सेवा तो वे निरन्तर करते ही रहते हैं। यदा कदा किन्हीं सांसारिक अभाव और कष्टों से पीड़ित व्यक्तियों को अपनी साधना का एक अंश देकर उन्हें कष्टमुक्त कर देते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अपना पुण्य-तप कष्ट पीड़ित को दान रूप में देना पड़ता है और उसके कठिन प्रारब्ध-भोग को भुगतने को स्वयं तत्पर होना पड़ता है। संसार में हर वस्तु एक नियत नियम के आधार पर चल रही है। केवल सूखा आशीर्वाद देने से किसी का कोई भला नहीं हो सकता।। सच्चा आशीर्वाद जो फलित हो, वही दे सकता है जिसके पास तप की पूँजी संग्रहीत हो और उसके एक भाग को आशीर्वाद के साथ देते हुये दूसरे का कठिन प्रारब्ध भोगने के लिये स्वयं तैयार हो। शक्ति- पात के द्वारा दूसरों की आत्मा को ऊँचा उठाने में भी यही प्रक्रिया पूर्ण करनी पड़ती है। यह सब सिद्ध पुरुषों के लिये ही