भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ६ ) यही आध्यात्मिक अविमुक्त क्षेत्र ( काशी ) सबसे बड़ा तीर्थ है। यही देवताओं के लिये भी पवित्र है। यही सब देह- धारियों के लिये परमात्म प्राप्ति का स्थल है। यहाँ जब प्राणी के प्राण निकलते हैं तब अमृतत्व की प्राप्ति होती है।" —श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् ❀ ❀ ❀ लौकिक सुख शान्ति, ऐश्वर्य, आनन्द, समृद्धि सफलता से लेकर पारलौकिक अन्तः शुद्धि, आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग, मुक्ति, ब्रह्मप्राप्ति, अमृतत्व आदि सभी संभव सफलताओं का स्रोत साधना ही है। साधना के बिना केवल दैव के आश्रय बैठे रहने से किसी को कोई सफलता नहीं मिल सकती, इसलिये उपनिषद- कारों ने पग-पग पर साधना परायण होने के लिये उपदेश दिया है। बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष, रोगी-निरोगी, व्यस्त-निवृत्त सभी कोई अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप साधना कर सकते हैं और अपने लिये अनुकूल सफलताएँ प्राप्त कर सकते हैं। यह आवश्यक नहीं कि जो साधनाएँ योगी के लिए उप- युक्त हैं वे ही सब को करनी चाहिये। प्रत्येक परिस्थिति के व्यक्ति के लिये उसी लक्ष को प्राप्त कराने वाली साधनाएँ मौजूद हैं। इन उपनिषदों में भी उस भिन्नता का यत्र-तत्र वर्णन है। अनुभवी मार्गदर्शकों से तो हर कोई अपनी स्थिति के अनुरूप साधना पथ जान सकता है और उस मार्ग पर चलते हुए धीरे-धीरे लौकिक और पारलौकिक सिद्धियाँ उपलब्ध करता हुआ पूर्णता के लक्ष तक पहुँच सकता है। अष्ट सिद्धियां साधना का परिणाम 'सिद्धि' है। जीवनोद्देश्य की पूर्णता ही सबसे बड़ी सिद्धि मानी जाती है। साधना का लक्ष