१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
( ६ ) यही आध्यात्मिक अविमुक्त क्षेत्र ( काशी ) सबसे बड़ा तीर्थ है। यही देवताओं के लिये भी पवित्र है। यही सब देह- धारियों के लिये परमात्म प्राप्ति का स्थल है। यहाँ जब प्राणी के प्राण निकलते हैं तब अमृतत्व की प्राप्ति होती है।" —श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् ❀ ❀ ❀ लौकिक सुख शान्ति, ऐश्वर्य, आनन्द, समृद्धि सफलता से लेकर पारलौकिक अन्तः शुद्धि, आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग, मुक्ति, ब्रह्मप्राप्ति, अमृतत्व आदि सभी संभव सफलताओं का स्रोत साधना ही है। साधना के बिना केवल दैव के आश्रय बैठे रहने से किसी को कोई सफलता नहीं मिल सकती, इसलिये उपनिषद- कारों ने पग-पग पर साधना परायण होने के लिये उपदेश दिया है। बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष, रोगी-निरोगी, व्यस्त-निवृत्त सभी कोई अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप साधना कर सकते हैं और अपने लिये अनुकूल सफलताएँ प्राप्त कर सकते हैं। यह आवश्यक नहीं कि जो साधनाएँ योगी के लिए उप- युक्त हैं वे ही सब को करनी चाहिये। प्रत्येक परिस्थिति के व्यक्ति के लिये उसी लक्ष को प्राप्त कराने वाली साधनाएँ मौजूद हैं। इन उपनिषदों में भी उस भिन्नता का यत्र-तत्र वर्णन है। अनुभवी मार्गदर्शकों से तो हर कोई अपनी स्थिति के अनुरूप साधना पथ जान सकता है और उस मार्ग पर चलते हुए धीरे-धीरे लौकिक और पारलौकिक सिद्धियाँ उपलब्ध करता हुआ पूर्णता के लक्ष तक पहुँच सकता है। अष्ट सिद्धियां साधना का परिणाम 'सिद्धि' है। जीवनोद्देश्य की पूर्णता ही सबसे बड़ी सिद्धि मानी जाती है। साधना का लक्ष
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उसे ही प्राप्त करना है। ८४ प्रकार के योग उसी लक्ष तक पहुँचने के मार्ग हैं। इस मंजिल तक पहुँचाने में योग साधना ही एक मात्र अवलम्बन है। साधना मार्ग पर चलते हुये मील के पत्थरों की तरह अनेक छोटी-मोटी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती हैं। इनसे लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख शान्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। सिद्धियों का वर्णन सभी योग ग्रन्थों में मिलता है। योगी और सिद्ध पुरुषों में कुछ विलक्षण प्रतिभा, सामर्थ्य एवं शक्ति देखी भी जाती है। उनमें सामान्य मनुष्य की अपेक्षा कुछ विशेष आत्मबल होता है, जो विविध रूपों में परिलक्षित होता है। सिद्ध पुरुष अपनी उपार्जित सिद्धियों का लाभ अपने निज के लिये नहीं उठाते पर उससे दूसरे सत्पात्रों को लाभान्वित करते रहते हैं। अपना आत्मबल देकर दूसरों की आत्मा को ऊपर उठा देने की महान सेवा तो वे निरन्तर करते ही रहते हैं। यदा कदा किन्हीं सांसारिक अभाव और कष्टों से पीड़ित व्यक्तियों को अपनी साधना का एक अंश देकर उन्हें कष्टमुक्त कर देते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अपना पुण्य-तप कष्ट पीड़ित को दान रूप में देना पड़ता है और उसके कठिन प्रारब्ध-भोग को भुगतने को स्वयं तत्पर होना पड़ता है। संसार में हर वस्तु एक नियत नियम के आधार पर चल रही है। केवल सूखा आशीर्वाद देने से किसी का कोई भला नहीं हो सकता।। सच्चा आशीर्वाद जो फलित हो, वही दे सकता है जिसके पास तप की पूँजी संग्रहीत हो और उसके एक भाग को आशीर्वाद के साथ देते हुये दूसरे का कठिन प्रारब्ध भोगने के लिये स्वयं तैयार हो। शक्ति- पात के द्वारा दूसरों की आत्मा को ऊँचा उठाने में भी यही प्रक्रिया पूर्ण करनी पड़ती है। यह सब सिद्ध पुरुषों के लिये ही
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संभव है और सिद्धि साधना के ऊपर टिकी हुई है। कठिन तपश्चर्या द्वारा ही उसे उपार्जित या उपलब्ध किया जा सकता है। उपहार के रूप में वह किसी को नहीं मिलती। साधना मार्ग के पथिकों को समयानुसार जो सिद्धियाँ मिलती हैं, उनका वर्णन योगशास्त्रों में मिलता है। उनकी संख्या आठ है, इन्हें अष्ट सिद्धियां भी कहते हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है :— (१) आत्म सिद्धि—इन्द्रिय संयम, मनोनिग्रह, स्थित- प्रज्ञता की प्राप्ति, समाधि, आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, तत्व ज्ञान, भूतजय, मोक्ष, पंच क्लेशों से निवृत्ति, भव बन्धनों से मुक्ति, संसार की किसी भली-बुरी परिस्थिति का प्रभाव ग्रहण न करना। (२) विविधा सिद्धि—पंच तत्वों पर नियन्त्रण, उनके द्वारा अभीष्ट वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकना, दूसरों के मन में अपनी भावना तथा मान्यता की स्थापना। (३) ज्ञान सिद्धि—तीक्ष्ण बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति, भूतकाल में हुई तथा भविष्य में होने वाली घटनाओं को जान सकना, दूरस्थ और समीपवर्ती परिस्थितियों का समान रूप से साक्षात्कार, पूर्वजन्मों का वृत्तान्त जानना, सब प्राणियों के मनो- गत भावों को जानना, शास्त्रों का सार दर्शन, अन्तःकरण में वैराग्य और निस्पृह प्रेम। (४) तप सिद्धि—कठोर तप कर सकने की शक्ति, सर्दी- गर्मी को बिना कष्ट के सहन, भूख प्यास कर नियन्त्रण, जल थल और आकाश पर विचरण कर सकना। (५) क्षेत्र सिद्धि—थोड़े स्थान में बहुत विस्तृत वस्तुओं का समा सकना, सूक्ष्म शरीर द्वारा देश देशान्तरों और लोक
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लोकान्तरों में भ्रमण कर सकना, अपने तेजस को बाहर योजन प्रदेश तक फैलाकर उस क्षेत्र के दुख तथा अभावों को दूर कर सकना, शरीरस्थ देवताओं का साक्षात्कार । (६) देव सिद्धि—देवताओं, यक्ष, गन्धर्व, प्रेत, पिशाच, बेताल, ब्रह्म राक्षस छाया पुरुष आदि का अनुग्रह, स्वामित्व और सहयोग प्राप्त करना । मन्त्र सिद्धि । सिद्ध योगियों का ब्रह्म रन्ध्र में सम्बन्ध सान्निध्य, षट चक्रों और कुण्डलिनी शक्ति का जागरण । (७) शरीर सिद्धि—दृष्टि या स्पर्श मात्र से दूसरों को निरोग और कष्ट मुक्त कर देना, अपार शारीरिक बल, अद्भुत मनोबल, चिन्तन में थकान न होना, निर्वाध भाषण, शाप से दूसरों को नष्ट कर सकना, स्पर्श से पदार्थों का स्वादिष्ट और सुगन्धित हो जाना, स्वल्प आहार से बहुतों को तृप्त कर देना, वाणी से कहे हुये वचनों तथा आशीर्वादों का सफल होना, शरीर का कायाकल्प, दीर्घ जीवन या अमर होना । (८) विक्रिया सिद्धि—अपने शरीर को अन्य शरीरों में परिवर्तित कर लेना, दूसरों के शरीरों को परिवर्तित कर देना, शरीर को अति भारी, अति हल्का, अति सूक्ष्म, अति विशाल बना सकना, अन्तर्ध्यान हो जाना, सर्व वशीकरण, सब कामनाओं की पूर्ति के साधन जुटाना । किन्हीं ग्रन्थों में दूसरी आठ सिद्धियाँ गिनाई गई हैं, वे इस प्रकार हैं :— (१) अणिमा—शरीर को अणु के समान सूक्ष्म कर लेना । (२) महिमा—शरीर को बहुत बड़े आकार का बना लेना ।
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(३) गरिमा—शरीर को बहुत भारी कर लेना । (४) लघिमा—शरीर को बहुत हलका कर लेना । (५) प्राप्ति—दूरस्थ पदार्थों को स्पर्श अथवा प्राप्त कर लेना । (६) प्राकाम्य—कामनाओं को अभिलषित रूप में पूर्ण कर लेना । (७) ईशत्व—शरीर और मन के भीतरी संस्थानों एवं चक्रों पर पूर्ण प्रभुता तथा संसार के अन्य पदार्थों को अपनी इच्छानुसार प्रयोग कर सकने की सामर्थ्य । (८) वाशित्व—सब परिस्थितियों अथवा वस्तुओं को अपने वशवर्ती रख सकना । अन्य शास्त्रों में सिद्धियों को अन्य रूपों में भी उपस्थित किया गया है जिनका उल्लेख कई प्रकार से मिलता है।
शंकराचार्य के मत से सिद्धियाँ (१) जन्म सिद्धि—जन्म से ही पूर्व संचित संस्कार तथा वैभव प्राप्त होना । (२) शब्द ज्ञान सिद्धि—श्रवण मात्र से सही अनुमान होना । (३) शास्त्र ज्ञान सिद्धि—शास्त्रों के अभ्यास से असाधा- रण बुद्धि का विकास । (४) आधिभौतिक ताप सहन शक्ति । (५) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति । (६) आधिदैविक सहन शक्ति । (७) विज्ञान सिद्धि—अन्तःकरण से तत्वज्ञान का स्फुरण होना ।
(८) विद्या सिद्धि—विद्या के द्वारा अविद्या का नाश। कहीं-कहीं (१) परकाया प्रवेश (२) जल आदि में असङ्ग (३) उत्क्रान्ति (४) ज्वलन (५) दिव्य श्रवण (६) आकाश मार्ग गमन (७) प्रकाशावरण क्षण (८) भूतजय को अष्ट सिद्धि माना गया है। सच तो यह है कि शारीरिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र की सिद्धियां अगणित प्रकार की हैं, उन्हें आठ या किसी अन्य संख्या में विभाजित नहीं किया जा सकता। आत्मबल को जिस दिशा में भी लगा दिया जाय उसी में एक चमत्कार पैदा हो जायेगा और वह एक स्वतन्त्र सिद्धि दिखाई देने लगेगी। साधना की सफलता के रूप में यह सिद्धियाँ सामने आती हैं, पर उनकी ओर आकर्षित होना, उन्हें अधिक महत्व देना, उनका प्रदर्शन करना अथवा लाभ उठाना, गर्व करना और चमत्कारी बनकर लोगों को अपने पीछे लगाना एक भारी भूल है। जो साधक इस मार्ग में भटक जाते हैं, उन्हें अपनी थोड़ी सी संग्रहीत पूँजी से हाथ धोना पड़ता है और आगे की प्रगति अवरुद्ध ही हो जाती है। इसीलिये उन्हें विघ्न रूप ही माना गया है और उनकी ओर से मुँह मोड़े रहने का ही आचार्यों ने आदेश किया है— ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः —योग दर्शन० विभूति । ३७ ये सिद्धियाँ समाधि में विघ्न रूप हैं। जाग्रत अवस्था में सिद्धियां हैं। तद्वैराग्यादपि दोषबीज क्षये कैवल्यम्। —योग० विभूति । ५०
( १५ ) इन सिद्धियों से भी मन हटा लेने पर दोषों कां बीज नाश होकर मुक्ति की प्राप्ति होती है । यदि तन्नापेक्षास्यात् तदा मोक्षाद् भ्रष्टः । कथं कृतकृत्यताभियात्— —योग सुधाकर यदि इन सिद्धियों की आकांक्षा रही तो साधक मोक्ष-पथ से भ्रष्ट हो जायेगा । फिर उसे लक्ष्य प्राप्ति कैसे होगी ? मन को भटकने न दिया जाय साधना द्वारा आत्म-कल्याण की आकांक्षा करने वाले श्रेय-पथिकों के लिये यह आवश्यक है कि वे वासना और तृष्णा के प्रति दिन-दिन उदासीन होना सीखें और आत्मिक सम्पदाओं का महत्व समझते हुए उनको ओर अपना प्रेम बढ़ावें । जिसके मन में लोभ, मोह की जितनी प्रबलता रहेगी, वासना और तृष्णा में जो जितना ही डूबा रहेगा, उसका मन भगवान में उतना ही कम लगेगा । इसलिये उपनिषद् स्थान-स्थान पर यह कहते हैं कि मन को सांसारिक प्रलोभनों और आकर्षणों से रोका जाय, उन्हें व्यर्थ और सारहीन वस्तु समझा जाय । शरीर आत्मा का वाहनमात्र है । उसे निरोग और प्रसन्न रखने के लिये जितनी अनिवार्य आवश्यकतायें हैं, उतने में ही सन्तुष्ट रहा जाय । भौतिक सम्पदायें बढ़ाने की अपेक्षा आत्मिक सद्गुणों की सम्पदायें बढ़ाना अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है । यदि भौतिक प्रलोभनों में मन को बहुत आकर्षण रहा तो सारा मनोबल, शरीरबल और समय उसी दिशा में लगा रहेगा और आत्मिक प्रगति के तीनों ही साधन बहुत स्वल्पमात्रा में बचेंगे । फलस्वरूप सफलता भी थोड़ी सी ही मिलेगी ।
शरीर रक्षा और पारिवारिक व्यवस्था के लिये उचित मनोयोग लगाना, सुव्यवस्थित प्रयत्न करना, श्रम संलग्न होना आवश्यक है। इन कर्तव्यों की उपेक्षा करने के लिये कोई नहीं कहता। लौकिक कर्तव्यों का उचित सीमा में पालन करना आत्म साधना का ही एक भाग है। शरीर और परिवार भी हमारे आत्म कुटुम्ब के सदस्य ही हैं, उनकी उपेक्षा क्यों की जाय ? ऐसी उपेक्षा से जीवन का स्वाभाविक और सामान्य क्रम अस्त व्यस्त होता है, तब आत्मिक प्रगति का मार्ग भी अवरुद्ध ही हो जाता है। इसलिये अतिवादियों की तरह जीवन के उचित उत्तरदायित्वों को वहन करने से इन्कार करना किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिये उचित नहीं कहा जा सकता। हमें अपने शारीरिक, पारिवारिक एवं सामाजिक सभी कर्तव्य उचित रीति से पूर्ण करने चाहिए। पर उनमें इतना अधिक लोभ और मोह न हो कि आत्मिक कर्तव्यों की ओर उपेक्षा की जाने लगे और अनिच्छा उत्पन्न हो जाय। जीवन का वास्तविक उद्देश्य और सच्चा लाभ आत्मिक प्रगति में ही है। उसकी ओर शारीरिक एवं सांसारिक कर्तव्यों की अपेक्षा कम नहीं वरन अधिक ही ध्यान रहना चाहिये क्योंकि शरीर की अपेक्षा आत्मा का महत्व निश्चित रूप से अधिक है। लौकिक जीवन सुखपूर्ण हो ऐसी इच्छा होना स्वाभाविक है पर आत्मिक शान्ति का महत्व नगण्य समझा जाय यह उचित नहीं, क्योंकि लौकिक जीवन क्षणिक और आत्मिक जीवन अनन्त है। क्षणिक सुखों के लिये, निस्सार वासनाओं और कभी तृप्त न हो सकने वाली मृगतृष्णाओं के पीछे भटकते हुए इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को नष्ट कर देना और आत्मिक प्रगति की ओर से विमुख रहना कोई दूरदर्शिता का
(१७) कार्य नहीं है। यह तथ्य जब हम भली-भाँति समझलें तभी भौतिक और आत्मिक लाभों की तुलना करना और उनकी ओर उचित ध्यान दे सकना संभव हो सकेगा। उपनिषदकार इस बात पर बहुत बल देते हैं कि मन को सांसारिक कर्तव्यों के उचित मात्रा में पालन करने तक ही सीमित रहने दिया जाय। धन और वासना की जितनी उचित उपयोगिता है, उतनी सीमा तक ही उनमें मनको डूबने दिया जाय। अति आकर्षण, अति मोह, अति लोभ में आजकल जन-मानस डूबा पड़ा है। इस स्थिति से ऊपर उठे बिना न तो आत्म कल्याण का महत्व समझ में आवेगा और न उसमें मन ही लगेगा। फिर चिन्ह-पूजा के रूप में कुछ साधना की भी तो उसका प्रतिफल भी वैसा ही नगण्य होगा। आकर्षण की प्रधान धारा एक ही रह सकती है। यदि लौकिक तृष्णायें अधिक होंगी तो आत्म-उद्धार के लिये तत्परता कहाँ से होगी? और यदि आत्मिक लक्ष्य है तो तृष्णा और वासना में निरन्तर निमग्न रहना कैसे निभेगा? दोनों में से एक को प्रमुखता देनी पड़ेगी। उपनिषदों में आत्मलक्ष को प्रमुखता देने और मन को लौकिक आकर्षणों से बचाने का स्थान-स्थान पर प्रतिपादन हुआ है। इसी को सदाचार, तप, संयम, मनोनिग्रह, कर्मयोग आदि नामों से पुकारा जाता है। साधना-मार्ग में यह महत्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा करके आगे बढ़ सकना किसी के लिये भी संभव नहीं होता। मन को पवित्र रखने, इन्द्रियों में आसक्त न होने, अपवित्रता और पाप वृत्तियों में न डूबने का पवित्र कर्तव्य उपनिषदों में जगह-जगह प्रतिपादित हुआ है और आस्तिकता, तपश्चर्या, कर्तव्यनिष्ठा
( १८ ) एवं परमार्थ परायणता की ओर मन को बलपूर्वक प्रेरित करते रहने के लिये बहुत जोर दिया गया है। ऐसी प्रेरणाओं के कुछ निर्देश इस प्रकार हैं— "जब हृदय में रहने वाली कामनायें नष्ट हो जाती हैं तब यह मरणधर्मा मनुष्य ही अमृत हो जाता है और उसे इसी शरीर में ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।" —बृहदारण्यक, अध्याय ४, ब्राह्मण ४— "मन ही संसार है, प्रयत्नपूर्वक इस मन को ही शुद्ध करना चाहिये। जिसका जैसा मन होता है, वह वैसा ही बन जाता है। शान्त मन वाला व्यक्ति ही आत्मा को तथा अक्षय आनन्द को प्राप्त करता है, यही सनातन रहस्य है।" —मैत्रेयी उपनिषद् "इन्द्रियों के विषयों में आसक्त रहने के कारण अनेक दोषों का प्रादुर्भाव होता है । यदि वे ही इन्द्रियां भली प्रकार वशीभूत हो जायें तो वह सिद्धिदायिनी होती हैं। भोगों का उपयोग करने से विषयों की कामनाएं कभी शान्त नहीं होतीं। भोग तो घृत द्वारा अग्नि के अधिक प्रदीप्त होने के समान उनकी वृद्धि ही करते हैं॥" —नारदपरिव्राजकोपनिषद् "जिनके मन-वाणी में पवित्रता है, जो सदा दोष रहित हैं, वे ही मनुष्य वेदान्त को सुनकर उसका पूरा फल पा सकते हैं।" —नारदपरिव्राजकोपनिषद्
( १६ ) ' तप, सन्तोष, आस्तिक्य, दान, ईश्वर-पूजन, सिद्धान्त- श्रवण, ह्रीं, मति, जप और व्रत ये दस नियम हैं ।' —शाण्डिल्य उपनिषद् "जो चित् शक्ति, इच्छा और अनिच्छा वाले प्राणियों में विद्यमान है वह मलों से घिरी है और पाशबद्ध चिड़िया की तरह उड़ने में असमर्थ होती है । इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्दभाव के कारण ये प्राणी मोह-वश पृथिवी रूपी गढ़े में गिरे हुये कीट पतंगों के तुल्य ही हैं ।" —सन्यास उपनिषद् "मन ही मनुष्यों के बन्धन तथा मोक्ष का कारण है । जो मन विषयों में आसक्त होगा, वह बन्धन का तथा जो विषयों से पराङ्मुख होगा, वह मोक्ष का कारण होगा ।" —शाट्यायनीयोपनिषद् "मन के मैल को त्याग करना ही स्नान है । मन और इन्द्रियों को वश में करना ही पवित्रता है । शारीरिक मलों की शुद्धि मिट्टी जल आदि से होती है । यह तो लौकिक शुद्धि है । वास्तविक पवित्रता तो मोह और अहङ्कार का त्याग करने से ही होती है । ज्ञान रूप मिट्टी तथा वैराग्य रूप जल में धोने पर जो पवित्रता होती है, वही वास्तविक पवित्रता है ।" —मैत्रेयी उपनिषद् "तप द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान से मन वश में आता है । मन वश में होने से आत्मा की प्राप्ति होती है और तब संसार से छुटकारा मिल जाता है ।..................मनुष्य का चित्त जितना बाहरी विषयों में आसक्त रहता है, उतना ही अगर ब्रह्म में आसक्त हो जाय तो बन्धनों से मुक्ति सहज ही Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( २० ) है। मुनि का बताया हुआ यह तथ्य हम सबके लिये विचारणीय और मननीय है।” —मैत्रेयी उपनिषद् “यह पराविद्या सत्य, तप और ब्रह्मचर्य से वेदान्त-मार्ग द्वारा प्राप्त होती है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, जिनके दोष क्षीण होगये हैं, वे ही अपने भीतर स्वयं प्रकाशमान परमात्मा को देख सकते हैं। माया में फँसे हुये उनको नहीं देख सकते।” —पाशुपतब्रह्मोपनिषद् मन को कम महत्व की निस्सार बातों में भटकने से रोक कर उसे परम कल्याणकारक आत्म-पथ पर अग्रसर करने के लिए उपनिषदों का विशेष आग्रह है। साधना का यही महत्वपूर्ण अङ्ग भी है। —:०:— जैसा अन्न वैसा मन आत्म-कल्याण के पथ पर चलने का प्रधान आधार ‘अन्न-शुद्धि’ को माना गया है, क्योंकि उसी पर मन की शुद्धि निर्भर है। मन को शरीर का ही एक भाग माना गया है, उसे ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहते हैं। शरीर की उन्नति अवनति बहुत से आहार पर निर्भर रहती है। आहार के शरीर-पोषक स्थूल भावों को हम सभी जानते हैं। किसी वस्तु के खाने से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है विज्ञान द्वारा इसकी बहुत कुछ खोज हो चुकी है, पर अभी यह खोज होनी शेष है कि किस-किस आहार में कौन कौन सूक्ष्म गुण विद्यमान हैं और उसका मनोभूमि के उत्थान-पतन पर क्या प्रभाव पड़ता है? अध्यात्म-विद्या के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म
( ३१ ) गुणों का अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया था और यह पाया था कि प्रत्येक खाद्य-पदार्थ अपने में सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण धारण किये हुये है और उनके खाने से मनोभूमि का निर्माण भी वैसा ही होता है। साथ ही यह भी शोध की गई थी कि आहार में निकटवर्ती स्थिति का प्रभाव ग्रहण करने का भी एक विशेष गुण है। दुष्ट, दुराचारी, दुर्भावनायुक्त या हीन मनोवृत्ति के लोग यदि भोजन पकावें या परसें तो उनके वे दुर्गुण आहार के साथ सम्मिश्रित होकर खाने वाले पर अपना प्रभाव अवश्य डालेंगे। न्याय और अन्याय से, पाप और पुण्य से कमाये हुये पैसे से जो आहार खरीदा गया है, उससे भी वह प्रभावित रहेगा। अनीति की कमाई से जो आहार बनेगा वह भी अवश्य ही उसके उपभोक्ता को अपनी बुरी प्रकृति से प्रभावित करेगा। इन बातों पर भली प्रकार विचार करके उपनिषदों के ऋषियों ने साधक को सतोगुणी आहार ही अपनाने पर बहुत जोर दिया है। मद्य, मांस, प्याज, लहसुन, मसाले, चटपटे, उत्तेजक, नशीले, गरिष्ट, बासी, बुसे, तमोगुणी प्रकृति के पदार्थ त्याग देने ही योग्य हैं। इसी प्रकार दुष्ट प्रकृति के लोगों द्वारा बनाया हुआ अथवा अनीति से कमाया हुआ आहार भी सर्वथा त्याज्य है। इन बातों का ध्यान रखते हुये स्वाद के लिये या जीवन रक्षा के लिये जो अन्न औषधि रूप समझ कर, भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जायगा वह शरीर और मन में सतोगुणी स्थिति पैदा करेगा और उसी के आधार पर साधना- मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी। उपनिषदों में इस सम्बन्ध में अनेकों आदेश भरे पड़े हैं। जैसे :—
(२२) "खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग है वह मल बनता है, जो मध्यम भाग है, वह मांस बनता है और जो सूक्ष्म भाग है सो मन बन जाता है। पिया हुआ जल तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है, जो सूक्ष्म भाग है, वह प्राण हो जाता है।......हे सौम्य ! मन अन्नमय है। प्राण जलमय है। वाक् तेजोमय है।" —छान्दोग्य, अध्याय ६, खण्ड ५ "अन्न ही बल से बढ़कर है। इसी से यदि दस दिन भोजन मिले तो प्राणी को समस्त शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और वे फिर तभी लौटती हैं जब वह पुनः भोजन करने लगे। तुम अन्न की उपासना करो। यह अन्न ही ब्रह्म है।" --छान्दोग्य, अध्याय ६, खण्ड ६ "आहार मे अभक्ष्य त्याग देने से चित्त शुद्ध हो जाता है। आहार शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती हैं। जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रन्थियां टूटती जाती हैं।" --पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् "आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण शुद्ध होने से भावना दृढ़ हो जाती है और भावना की स्थिरता से हृदय की समस्त गांठें खुल जाती हैं।" --छान्दोग्य तैत्तरीय उपनिषद में इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला गया है और आत्मकल्याण के इच्छुकों को आहार-शुद्धि का विशेष रूप से ध्यान रखने का निर्देश किया गया है।
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याश्च पृथिवी ँश्रिताः । अथो अन्ने नैव जीवन्ति । अथैनदपियन्त्यन्ततः । अन्नः ँहि भूतानां जेष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । "इस पृथिवी पर रहने वाले समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं । फिर अन्न से ही जीते हैं । अन्त में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं । अन्न ही सबसे श्रेष्ठ है । इसलिये वह औषधि रूप कहा जाता है । जो साधक अन्न को ब्रह्म रूप में उपासना करते हैं, वे उसे प्राप्त कर लेते हैं । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । सवा एष पुरुष विध एव । —तैत्तरीय २।२ "इस अन्न रसमय शरीर के भीतर जो प्राणमय पुरुष है, वह अन्न से व्याप्त है । यह प्राणमय पुरुष ही आत्मा है । अन्नं न निन्द्यात् । तद् व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रति- ष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान भवति । प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान कीर्त्या । —तैत्तरीय ३।७ "अन्न की निन्दा न करे । यह व्रत है । प्राण ही अन्न है । शरीर प्राण पर आधारित है । इसलिये वह अन्न में ही स्थित है । जो मनुष्य यह जान लेता है कि मैं अन्न में ही प्रतिष्ठित हूँ वह प्रतिष्ठावान् हो जाता है । अन्नवान हो जाता है । प्रजावान् हो जाता है, पशुवान् भी । वह ब्रह्मतेज से सम्पन्न होकर महान् बनता है । कीर्ति से सम्पन्न होकर भी महान् बनता है ।
( २४ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आगे चल कर अष्टम अनुवाक में और भी निर्देश है— अन्नं न परिचक्षीत । तद व्रतम्............अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम् । “ अन्न की अवहेलना न करे । यह व्रत है । अन्न को बहुत बढ़ावे । यह व्रत है ।” हाइवु, हाइवु, हाइवु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अह मन्नादो ऽहमन्नादो ऽहमन्नादः । —तैत्तिरीय ३।१० “आश्चर्य ! आश्चर्य ! ! आश्चर्य ! ! ! मैं अन्न हूँ । मैं अन्न हूँ । मैं अन्न हूँ। मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ । मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ, मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ ।” आहार शुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृति- लब्ध्ये सर्व ग्रन्थीनां विप्र मोक्ष स्तस्यै मृदित कषायाय तमसस्पा- दर्शयति भगवान सनत्कुमारः । “जब आहार शुद्ध होता है तब सत्व यांनी अन्तःकरण शुद्ध होता है अन्तःकरण शुद्ध होने पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है । उस विवेक से अज्ञानजन्य बन्धन-ग्रन्थियां खुलती हैं। फिर परम-तत्व का साक्षात्कार हो जाता है । यह ज्ञान नारद को भगवान् सनत्कुमार ने दिया ।” अथर्ववेद में अनुपयुक्त अन्न को त्याज्य ठहराया गया है । प्राचीनकाल में हर व्यक्ति आहार ग्रहण करने से पूर्व यह देखता था कि यह अन्न किस प्रकार के व्यक्ति द्वारा उपार्जित एवं निर्मित है । उसमें थोड़ा भी दोष होने पर उसे त्याग दिया जाता था । केवल पुण्यात्माओं का अन्न ही लोग स्वीकार करते Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
थे। किसी के पुण्यात्मा होने की एक कसौटी यह भी थी कि लोग उसका अन्न ग्रहण करते हैं या नहीं। अथर्ववेद ८।६। २५ में कहा गया है:— सर्वौ वा एष जग्ध पाप्मा यस्यान्रमश्नन्ति । ‘अर्थात्, वही व्यक्ति पुण्यात्मा है जिसका अन्न दूसरे खाते हैं।” आज भी पुरानी वह प्रथा देहाती क्षेत्रों में किसी रूप में प्रचलित है कि जिसके आचरण अनुचित समझे जायें, उसके यहाँ का अन्न जल ग्रहण न किया जाय। जातिच्युत होने में यही दण्ड मुख्य होता है। वाल्मीकि रामायण में अन्तःकरण को देवता के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसी प्रकार का प्रतिफल किया गया है, लिखा है:— “यदन्न पुरुषो भवति तदन्ना स्तस्य देवताः ।” “अर्थात् मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके देवता खाते हैं।” कुधान्य खाकर साधना करने से साधक का इष्ट भी भ्रष्ट हो जाता है और उससे जिस प्रतिफल की आशा की गई थी, वह प्रायः नहीं ही प्राप्त होता । प्राण और उसका निग्रह ब्रह्म की उपासना में प्राण साधना का अत्यधिक महत्व है। आत्मा ईश्वर का अंश होने से साक्षी, दृष्टा और निर्लिप्त है। उसकी शक्ति प्राण है और इस प्राण-शक्ति के आधार पर ही जीव का सारा जीवनक्रम संचालित होता है। जैसे निर्लिप्त ब्रह्म की क्रिया-शक्ति माया या प्रकृति है, उसी प्रकार जीव की सक्रियता प्राण-शक्ति में सन्निहित है।
(२६) जिस प्रकार पंचतत्वों के हेर-फेर से शरीर में विविध प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्राण की स्थिति में हेर-फेर होने से मनोभूमि में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते है। चूंकि अनेक जन्मों के संग्रहीत कुसंस्कारों के कारण मन में कितनी ही विकृतियां भरी रहती हैं और वे साधक को पथभ्रष्ट करने के लिये निरन्तर दुरभिसंधि करती रहती हैं। मन का उच्चाटन, जहाँ घूमना, निर्दिष्ट लक्ष पर स्थिर न होना आदि विघ्नों के शमन का एक महत्वपूर्ण उपाय प्राणों का निरोध है। इसी प्रकार जो कुसंस्कार मन को सन्मार्ग पर चलने से डराते और कुमार्ग की ओर ललचाते हैं, उन्हें नियंत्रित करने का सुनिश्चित शस्त्र भी प्राण-संयम ही है। सत्संग, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन से कुविचारों को बहुत हद तक शान्त किया जा सकता है, पर अन्तर्मन के प्रसुप्त क्षेत्र में जो कुसंस्कारों की ग्रन्थियाँ जमी होती हैं, वे अवसर पाते ही पुनः जाग्रत हो जाती हैं और सत्संग आदि से संग्रहीत ज्ञान देखते-देखते तिरोहित हो जाता है। कई बार ज्ञानी गुरु कहे जाने वाले लोग भी कुमार्ग- गामी होते देखे गये हैं। इसका कारण यही है कि उसने सद्- विचारों को सुना समझा तो बहुत था पर प्राण-निग्रह द्वारा गुप्त मन की संस्कार-ग्रन्थियों का शमन नहीं किया था। फल- स्वरूप वे अवसर पाते ही सजीव हो उठीं और आँधी-तूफान जिस प्रकार घास के ढेर को उड़ा ले जाता है, उसी प्रकार कुसंस्कारों का प्रवाह उस संग्रहीत ज्ञान को उड़ा ले गया। मनोभूमि को शोधने और चिर संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन करने के लिये प्राणायाम का बड़ा महत्व है। उपनिषदों में वर्णित साधना विधान में प्राणायाम को प्रमुख स्थान दिया
गया है। साधना खंड के अधिकांश उपनिषदों में किसी न किसी रूप में प्राणायाम का वर्णन हुआ है। यद्यपि वह संक्षिप्त है और विविध प्राणायामों को पूरा साधन-विधान जानने के लिये अनुभवी गुरु अथवा तत्सम्बन्धी अन्य विवेचनात्मक ग्रन्थों के पढ़ने की आवश्यकता होती है, तो भी यह निर्विवाद है कि उपनिषदों का साधना-विज्ञान प्राणायाम को अपनी साधना में सम्मिलत रखने के लिये प्रत्येक ब्रह्मपरायण व्यक्ति पर जोर देता है। किस प्रयोजन के लिये, किस विधि विधान के साथ कौन-सा प्राणायाम कितनी मात्रा में, किस समय किया जाय, यह प्रश्न साधकों की व्यक्तिगत स्थिति की भिन्नता पर निर्भर है। इसलिये उसकी एक विधि बता देना भी कठिन था। उप- निषद्कारों ने इस कठिनाई को समझते हुये प्राण विद्या की साधना विषयक विविध प्रक्रियाओं की बारीकी में जाना उचित नहीं समझा है और इस कार्य को गुरु शिष्य के परस्पर विचार विनिमय एवं विवेक पर छोड़ दिया है। पर एक बात पर पूरा- पूरा जोर दिया है कि हर साधक किसी न किसी रूप में प्राणा- याम की साधना नियमित रूप से किया करे। प्राणायाम का प्रभाव कुसंस्कारी के शमन और मन के निग्रह तक ही सीमत नहीं है, वरन् आरोग्य की वृद्धि, मानसिक विकास, आत्मिक प्रगति तथा अनेकों प्रकार की आध्यात्मिक चमत्कारी सिद्धियाँ भी उससे सम्बन्धित हैं। प्राणायाम करने से अनेकों प्रकार के रोग दूर हो सकते है। षट्चक्रों, सूक्ष्म ग्रन्थियों तथा उपत्यिकाओं का जागरण होने से दिव्य सिद्धियां उपलब्ध होती हैं, लौकिक सुख सम्पदाओं का द्वार खुलता है और जो बन्धन आत्मा को निविड़ पाश में जकड़े हुये हैं, उनका कटना सहज हो जाता है।
इस प्रकार की अनेकों विवेचनाएँ उपनिषदों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती हैं। उनमें से कुछ नीचे देखिए:— “स्वर्णादि धातुओं का मल उन्हें तपाने से दूर होने के समान ही इन्द्रियों द्वारा प्राप्त दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। प्राणायाम से दोषों को और धारणा से पापों को जला डालें........जिस साधक का प्राण इस मण्डल को वेध कर मस्तक में पहुँच जाता है, उसकी कहीं भी मृत्यु नहीं होती वह पुनर्जन्म के चक्र में नहीं पड़ता।” —अमृतनादोपनिषद् "प्राणायाम पाप रूपी ईंधन के लिए अग्निस্বরূপ है और संसार सागर से पार होने के लिये सेतु के समान है। आसन से रोगों का नाश होता है और प्राणायाम से पापों का । योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से मन में धैर्य आता है, समाधि द्वारा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है" —योगचूड़ामणि उपनिषद् 'प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं। हिचकी, खांसी श्वास, शिर, कान और आँख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है। जिस प्रकार सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिए । —योगचूड़ामणि उपनिषद् इस प्रकार तीन वर्ष तक प्राणायाम करने वाला योग- सिद्ध हो जाता। वह योगी वायु को जीतने वाला, जितेन्द्रिय,