१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) है। मुनि का बताया हुआ यह तथ्य हम सबके लिये विचारणीय और मननीय है।” —मैत्रेयी उपनिषद् “यह पराविद्या सत्य, तप और ब्रह्मचर्य से वेदान्त-मार्ग द्वारा प्राप्त होती है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, जिनके दोष क्षीण होगये हैं, वे ही अपने भीतर स्वयं प्रकाशमान परमात्मा को देख सकते हैं। माया में फँसे हुये उनको नहीं देख सकते।” —पाशुपतब्रह्मोपनिषद् मन को कम महत्व की निस्सार बातों में भटकने से रोक कर उसे परम कल्याणकारक आत्म-पथ पर अग्रसर करने के लिए उपनिषदों का विशेष आग्रह है। साधना का यही महत्वपूर्ण अङ्ग भी है। —:०:— जैसा अन्न वैसा मन आत्म-कल्याण के पथ पर चलने का प्रधान आधार ‘अन्न-शुद्धि’ को माना गया है, क्योंकि उसी पर मन की शुद्धि निर्भर है। मन को शरीर का ही एक भाग माना गया है, उसे ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहते हैं। शरीर की उन्नति अवनति बहुत से आहार पर निर्भर रहती है। आहार के शरीर-पोषक स्थूल भावों को हम सभी जानते हैं। किसी वस्तु के खाने से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है विज्ञान द्वारा इसकी बहुत कुछ खोज हो चुकी है, पर अभी यह खोज होनी शेष है कि किस-किस आहार में कौन कौन सूक्ष्म गुण विद्यमान हैं और उसका मनोभूमि के उत्थान-पतन पर क्या प्रभाव पड़ता है? अध्यात्म-विद्या के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म