भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( १६ ) ' तप, सन्तोष, आस्तिक्य, दान, ईश्वर-पूजन, सिद्धान्त- श्रवण, ह्रीं, मति, जप और व्रत ये दस नियम हैं ।' —शाण्डिल्य उपनिषद् "जो चित् शक्ति, इच्छा और अनिच्छा वाले प्राणियों में विद्यमान है वह मलों से घिरी है और पाशबद्ध चिड़िया की तरह उड़ने में असमर्थ होती है । इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्दभाव के कारण ये प्राणी मोह-वश पृथिवी रूपी गढ़े में गिरे हुये कीट पतंगों के तुल्य ही हैं ।" —सन्यास उपनिषद् "मन ही मनुष्यों के बन्धन तथा मोक्ष का कारण है । जो मन विषयों में आसक्त होगा, वह बन्धन का तथा जो विषयों से पराङ्मुख होगा, वह मोक्ष का कारण होगा ।" —शाट्यायनीयोपनिषद् "मन के मैल को त्याग करना ही स्नान है । मन और इन्द्रियों को वश में करना ही पवित्रता है । शारीरिक मलों की शुद्धि मिट्टी जल आदि से होती है । यह तो लौकिक शुद्धि है । वास्तविक पवित्रता तो मोह और अहङ्कार का त्याग करने से ही होती है । ज्ञान रूप मिट्टी तथा वैराग्य रूप जल में धोने पर जो पवित्रता होती है, वही वास्तविक पवित्रता है ।" —मैत्रेयी उपनिषद् "तप द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान से मन वश में आता है । मन वश में होने से आत्मा की प्राप्ति होती है और तब संसार से छुटकारा मिल जाता है ।..................मनुष्य का चित्त जितना बाहरी विषयों में आसक्त रहता है, उतना ही अगर ब्रह्म में आसक्त हो जाय तो बन्धनों से मुक्ति सहज ही Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi