भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( १८ ) एवं परमार्थ परायणता की ओर मन को बलपूर्वक प्रेरित करते रहने के लिये बहुत जोर दिया गया है। ऐसी प्रेरणाओं के कुछ निर्देश इस प्रकार हैं— "जब हृदय में रहने वाली कामनायें नष्ट हो जाती हैं तब यह मरणधर्मा मनुष्य ही अमृत हो जाता है और उसे इसी शरीर में ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।" —बृहदारण्यक, अध्याय ४, ब्राह्मण ४— "मन ही संसार है, प्रयत्नपूर्वक इस मन को ही शुद्ध करना चाहिये। जिसका जैसा मन होता है, वह वैसा ही बन जाता है। शान्त मन वाला व्यक्ति ही आत्मा को तथा अक्षय आनन्द को प्राप्त करता है, यही सनातन रहस्य है।" —मैत्रेयी उपनिषद् "इन्द्रियों के विषयों में आसक्त रहने के कारण अनेक दोषों का प्रादुर्भाव होता है । यदि वे ही इन्द्रियां भली प्रकार वशीभूत हो जायें तो वह सिद्धिदायिनी होती हैं। भोगों का उपयोग करने से विषयों की कामनाएं कभी शान्त नहीं होतीं। भोग तो घृत द्वारा अग्नि के अधिक प्रदीप्त होने के समान उनकी वृद्धि ही करते हैं॥" —नारदपरिव्राजकोपनिषद् "जिनके मन-वाणी में पवित्रता है, जो सदा दोष रहित हैं, वे ही मनुष्य वेदान्त को सुनकर उसका पूरा फल पा सकते हैं।" —नारदपरिव्राजकोपनिषद्