भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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(१७) कार्य नहीं है। यह तथ्य जब हम भली-भाँति समझलें तभी भौतिक और आत्मिक लाभों की तुलना करना और उनकी ओर उचित ध्यान दे सकना संभव हो सकेगा। उपनिषदकार इस बात पर बहुत बल देते हैं कि मन को सांसारिक कर्तव्यों के उचित मात्रा में पालन करने तक ही सीमित रहने दिया जाय। धन और वासना की जितनी उचित उपयोगिता है, उतनी सीमा तक ही उनमें मनको डूबने दिया जाय। अति आकर्षण, अति मोह, अति लोभ में आजकल जन-मानस डूबा पड़ा है। इस स्थिति से ऊपर उठे बिना न तो आत्म कल्याण का महत्व समझ में आवेगा और न उसमें मन ही लगेगा। फिर चिन्ह-पूजा के रूप में कुछ साधना की भी तो उसका प्रतिफल भी वैसा ही नगण्य होगा। आकर्षण की प्रधान धारा एक ही रह सकती है। यदि लौकिक तृष्णायें अधिक होंगी तो आत्म-उद्धार के लिये तत्परता कहाँ से होगी? और यदि आत्मिक लक्ष्य है तो तृष्णा और वासना में निरन्तर निमग्न रहना कैसे निभेगा? दोनों में से एक को प्रमुखता देनी पड़ेगी। उपनिषदों में आत्मलक्ष को प्रमुखता देने और मन को लौकिक आकर्षणों से बचाने का स्थान-स्थान पर प्रतिपादन हुआ है। इसी को सदाचार, तप, संयम, मनोनिग्रह, कर्मयोग आदि नामों से पुकारा जाता है। साधना-मार्ग में यह महत्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा करके आगे बढ़ सकना किसी के लिये भी संभव नहीं होता। मन को पवित्र रखने, इन्द्रियों में आसक्त न होने, अपवित्रता और पाप वृत्तियों में न डूबने का पवित्र कर्तव्य उपनिषदों में जगह-जगह प्रतिपादित हुआ है और आस्तिकता, तपश्चर्या, कर्तव्यनिष्ठा