भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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शरीर रक्षा और पारिवारिक व्यवस्था के लिये उचित मनोयोग लगाना, सुव्यवस्थित प्रयत्न करना, श्रम संलग्न होना आवश्यक है। इन कर्तव्यों की उपेक्षा करने के लिये कोई नहीं कहता। लौकिक कर्तव्यों का उचित सीमा में पालन करना आत्म साधना का ही एक भाग है। शरीर और परिवार भी हमारे आत्म कुटुम्ब के सदस्य ही हैं, उनकी उपेक्षा क्यों की जाय ? ऐसी उपेक्षा से जीवन का स्वाभाविक और सामान्य क्रम अस्त व्यस्त होता है, तब आत्मिक प्रगति का मार्ग भी अवरुद्ध ही हो जाता है। इसलिये अतिवादियों की तरह जीवन के उचित उत्तरदायित्वों को वहन करने से इन्कार करना किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिये उचित नहीं कहा जा सकता। हमें अपने शारीरिक, पारिवारिक एवं सामाजिक सभी कर्तव्य उचित रीति से पूर्ण करने चाहिए। पर उनमें इतना अधिक लोभ और मोह न हो कि आत्मिक कर्तव्यों की ओर उपेक्षा की जाने लगे और अनिच्छा उत्पन्न हो जाय। जीवन का वास्तविक उद्देश्य और सच्चा लाभ आत्मिक प्रगति में ही है। उसकी ओर शारीरिक एवं सांसारिक कर्तव्यों की अपेक्षा कम नहीं वरन अधिक ही ध्यान रहना चाहिये क्योंकि शरीर की अपेक्षा आत्मा का महत्व निश्चित रूप से अधिक है। लौकिक जीवन सुखपूर्ण हो ऐसी इच्छा होना स्वाभाविक है पर आत्मिक शान्ति का महत्व नगण्य समझा जाय यह उचित नहीं, क्योंकि लौकिक जीवन क्षणिक और आत्मिक जीवन अनन्त है। क्षणिक सुखों के लिये, निस्सार वासनाओं और कभी तृप्त न हो सकने वाली मृगतृष्णाओं के पीछे भटकते हुए इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को नष्ट कर देना और आत्मिक प्रगति की ओर से विमुख रहना कोई दूरदर्शिता का