१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५ ) इन सिद्धियों से भी मन हटा लेने पर दोषों कां बीज नाश होकर मुक्ति की प्राप्ति होती है । यदि तन्नापेक्षास्यात् तदा मोक्षाद् भ्रष्टः । कथं कृतकृत्यताभियात्— —योग सुधाकर यदि इन सिद्धियों की आकांक्षा रही तो साधक मोक्ष-पथ से भ्रष्ट हो जायेगा । फिर उसे लक्ष्य प्राप्ति कैसे होगी ? मन को भटकने न दिया जाय साधना द्वारा आत्म-कल्याण की आकांक्षा करने वाले श्रेय-पथिकों के लिये यह आवश्यक है कि वे वासना और तृष्णा के प्रति दिन-दिन उदासीन होना सीखें और आत्मिक सम्पदाओं का महत्व समझते हुए उनको ओर अपना प्रेम बढ़ावें । जिसके मन में लोभ, मोह की जितनी प्रबलता रहेगी, वासना और तृष्णा में जो जितना ही डूबा रहेगा, उसका मन भगवान में उतना ही कम लगेगा । इसलिये उपनिषद् स्थान-स्थान पर यह कहते हैं कि मन को सांसारिक प्रलोभनों और आकर्षणों से रोका जाय, उन्हें व्यर्थ और सारहीन वस्तु समझा जाय । शरीर आत्मा का वाहनमात्र है । उसे निरोग और प्रसन्न रखने के लिये जितनी अनिवार्य आवश्यकतायें हैं, उतने में ही सन्तुष्ट रहा जाय । भौतिक सम्पदायें बढ़ाने की अपेक्षा आत्मिक सद्गुणों की सम्पदायें बढ़ाना अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है । यदि भौतिक प्रलोभनों में मन को बहुत आकर्षण रहा तो सारा मनोबल, शरीरबल और समय उसी दिशा में लगा रहेगा और आत्मिक प्रगति के तीनों ही साधन बहुत स्वल्पमात्रा में बचेंगे । फलस्वरूप सफलता भी थोड़ी सी ही मिलेगी ।