भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

(८) विद्या सिद्धि—विद्या के द्वारा अविद्या का नाश। कहीं-कहीं (१) परकाया प्रवेश (२) जल आदि में असङ्ग (३) उत्क्रान्ति (४) ज्वलन (५) दिव्य श्रवण (६) आकाश मार्ग गमन (७) प्रकाशावरण क्षण (८) भूतजय को अष्ट सिद्धि माना गया है। सच तो यह है कि शारीरिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र की सिद्धियां अगणित प्रकार की हैं, उन्हें आठ या किसी अन्य संख्या में विभाजित नहीं किया जा सकता। आत्मबल को जिस दिशा में भी लगा दिया जाय उसी में एक चमत्कार पैदा हो जायेगा और वह एक स्वतन्त्र सिद्धि दिखाई देने लगेगी। साधना की सफलता के रूप में यह सिद्धियाँ सामने आती हैं, पर उनकी ओर आकर्षित होना, उन्हें अधिक महत्व देना, उनका प्रदर्शन करना अथवा लाभ उठाना, गर्व करना और चमत्कारी बनकर लोगों को अपने पीछे लगाना एक भारी भूल है। जो साधक इस मार्ग में भटक जाते हैं, उन्हें अपनी थोड़ी सी संग्रहीत पूँजी से हाथ धोना पड़ता है और आगे की प्रगति अवरुद्ध ही हो जाती है। इसीलिये उन्हें विघ्न रूप ही माना गया है और उनकी ओर से मुँह मोड़े रहने का ही आचार्यों ने आदेश किया है— ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः —योग दर्शन० विभूति । ३७ ये सिद्धियाँ समाधि में विघ्न रूप हैं। जाग्रत अवस्था में सिद्धियां हैं। तद्वैराग्यादपि दोषबीज क्षये कैवल्यम्। —योग० विभूति । ५०