१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगया है। साधना खंड के अधिकांश उपनिषदों में किसी न किसी रूप में प्राणायाम का वर्णन हुआ है। यद्यपि वह संक्षिप्त है और विविध प्राणायामों को पूरा साधन-विधान जानने के लिये अनुभवी गुरु अथवा तत्सम्बन्धी अन्य विवेचनात्मक ग्रन्थों के पढ़ने की आवश्यकता होती है, तो भी यह निर्विवाद है कि उपनिषदों का साधना-विज्ञान प्राणायाम को अपनी साधना में सम्मिलत रखने के लिये प्रत्येक ब्रह्मपरायण व्यक्ति पर जोर देता है। किस प्रयोजन के लिये, किस विधि विधान के साथ कौन-सा प्राणायाम कितनी मात्रा में, किस समय किया जाय, यह प्रश्न साधकों की व्यक्तिगत स्थिति की भिन्नता पर निर्भर है। इसलिये उसकी एक विधि बता देना भी कठिन था। उप- निषद्कारों ने इस कठिनाई को समझते हुये प्राण विद्या की साधना विषयक विविध प्रक्रियाओं की बारीकी में जाना उचित नहीं समझा है और इस कार्य को गुरु शिष्य के परस्पर विचार विनिमय एवं विवेक पर छोड़ दिया है। पर एक बात पर पूरा- पूरा जोर दिया है कि हर साधक किसी न किसी रूप में प्राणा- याम की साधना नियमित रूप से किया करे। प्राणायाम का प्रभाव कुसंस्कारी के शमन और मन के निग्रह तक ही सीमत नहीं है, वरन् आरोग्य की वृद्धि, मानसिक विकास, आत्मिक प्रगति तथा अनेकों प्रकार की आध्यात्मिक चमत्कारी सिद्धियाँ भी उससे सम्बन्धित हैं। प्राणायाम करने से अनेकों प्रकार के रोग दूर हो सकते है। षट्चक्रों, सूक्ष्म ग्रन्थियों तथा उपत्यिकाओं का जागरण होने से दिव्य सिद्धियां उपलब्ध होती हैं, लौकिक सुख सम्पदाओं का द्वार खुलता है और जो बन्धन आत्मा को निविड़ पाश में जकड़े हुये हैं, उनका कटना सहज हो जाता है।