१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार की अनेकों विवेचनाएँ उपनिषदों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती हैं। उनमें से कुछ नीचे देखिए:— “स्वर्णादि धातुओं का मल उन्हें तपाने से दूर होने के समान ही इन्द्रियों द्वारा प्राप्त दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। प्राणायाम से दोषों को और धारणा से पापों को जला डालें........जिस साधक का प्राण इस मण्डल को वेध कर मस्तक में पहुँच जाता है, उसकी कहीं भी मृत्यु नहीं होती वह पुनर्जन्म के चक्र में नहीं पड़ता।” —अमृतनादोपनिषद् "प्राणायाम पाप रूपी ईंधन के लिए अग्निस্বরূপ है और संसार सागर से पार होने के लिये सेतु के समान है। आसन से रोगों का नाश होता है और प्राणायाम से पापों का । योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से मन में धैर्य आता है, समाधि द्वारा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है" —योगचूड़ामणि उपनिषद् 'प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं। हिचकी, खांसी श्वास, शिर, कान और आँख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है। जिस प्रकार सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिए । —योगचूड़ामणि उपनिषद् इस प्रकार तीन वर्ष तक प्राणायाम करने वाला योग- सिद्ध हो जाता। वह योगी वायु को जीतने वाला, जितेन्द्रिय,