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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पूर्वकाण्ड ] [ २२७

पूर्वकाण्ड ] [ २२७ इन्द्र होता है। महेश्वर का मानस रूप ब्रह्मा की यज्ञ को भोगने वाला देवता है ॥ ११ ॥ उस मानस ब्रह्म का रूप है 'हंस सोऽहं ।" इस तन्मयता को प्राप्त करने के लिये जो यज्ञ किया जाता है, वह नादानुसंधान । तन्मयता का विकार ही जीव है ॥ १२ ॥ यह हंस परमात्मा का स्वरूप है जो बाहर और भीतर चलता रहता है। भीतर जाने पर अनवकाश वाले स्थान में यह हंस सुपर्ण स्वरूप ( ईश्वर ) होता है ॥ १३ ॥ छियानवे तन्तुओं के रूप में व्यक्त होने वाला, चित् के तीन सूत्रों से चिन्मय, नौ तत्वों से तिगुना किया हुआ, ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप तीन अग्नियों से संयुक्त चिद् ग्रन्थि से बँधा, अद्वैत ग्रन्थि से युक्त, यज्ञ के साधारण अङ्ग रूप में बाह्य और अन्तर को सुप्रकाशित करने वाला यज्ञोपवीत हंस ही है ॥१४-१५॥ इस प्रकार उपवीत के सूत्र ब्रह्म-यज्ञ रूप हैं, अर्थात् यज्ञोपवीत ब्रह्म का प्रतीक रूप है। इस प्रकार यज्ञोपवीत और ब्रह्मयज्ञ एक दूसरे के स्वरूप हैं ॥ १६ ॥ इसके अङ्ग मात्रा है। यज्ञोपवीत इस मनोयज्ञ का हंस है। ब्रह्म-यज्ञ से युक्त प्रणव भी ब्रह्मसूत्र हैं। प्रणव का अन्तवर्ती हंस भी ब्रह्म सूत्र है; यह ब्रह्म-यज्ञ मोक्ष का साधन रूप है ॥ १७ ॥ ब्रह्म-संध्या मानसिक यज्ञ की क्रिया है। संध्या-क्रिया मानसिक यज्ञ का लक्षण है ॥ १८ ॥ जो यज्ञ सूत्र, प्रणव, ब्रह्म-यज्ञ की क्रिया से युक्त है, वह ब्राह्मण है। ब्रह्मचर्य में देव रहते हैं। सूत्र रूप हंस यज्ञ में रहते हैं, हंस और प्रणव एक ही हैं ॥ १६ ॥ हंसस्य प्रार्थनास्त्रिकालाः । त्रिकालास्त्रिवर्णाः । त्रेताग्न्य- नुसंधांनो यागः । त्रेताग्न्यात्माकृतिकवर्णोद्धारहंसानुधानोऽन्तर्यागः ॥२०॥ चित्स्वरूपन्तन्मयं तुरीयस्वरूपम् । अन्तरादित्ये ज्योतिः

२२८ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् स्वरूपो हंसः ॥२१॥ यज्ञाङ्गं ब्रह्मसंपत्तिः । ब्रह्मप्रवृत्तितत्प्रणव- हंससूत्रेणैव ध्यानमाचरन्ति ॥२२ प्रोवाच पुनः स्वयंभुवं प्रतिजानीते ब्रह्मपुत्रो ऋषिखालि- खिल्यः । हंससूत्राणि कतिसंख्यानि कियद्वा प्रमाणम् ॥२३॥ हृदादित्यमरीचीनां पदं षण्णवतिः । चित्सूत्राघ्राणयोः स्वनिर्गता प्रणवाधारा षडङ्गुलदशाशीतिः ॥२४॥ वामबाहुदक्षिणकट्योरन्तश्चरति हंस परमात्मा ब्रह्म- गुह्यप्रकारो नान्यत्र विदितः ॥२५॥ ये जानन्ति तेऽमृतफलकाः । सर्वकालं हंसं न प्रकाशकम् । प्रणवहंसान्तर्ध्यानप्रकृतिं विना न मुक्तिः ॥२६॥ हंस की प्रार्थना तीन समय की जाती है तीन काल में तीन वर्ण होते हैं। यह यज्ञ तीनों अग्नियों से करने का है। तीन अग्नि, आत्मा की आकृति और वर्ण वाले ॐकार रूप हंस का विचारना भीतर का यज्ञ है ॥ २० ॥ चित् रूप से तन्मय होना तुरीय का स्वरूप है। भीतर के सूर्य में हंस की ज्योति रूप है ॥ २१ ॥ यज्ञ का यह अंग ही ब्रह्म-सम्पत्ति है। इसलिये ब्रह्म की प्राप्ति के निमित्त प्रणव रूप हंस की साधना ही विधेय है ॥ २२ ॥ ब्रह्मपुत्र बालखिल्य ने पुनः स्वयंभू से पूछा—“हंस सूत्रों की संख्या कितनी है और उनका प्रमाण कितने हैं ? आप तो सब जानते हैं, बतलाइये ।” ॥ २३ ॥ स्वयंभू ब्रह्म ने उत्तर दिया— “हृदय--आदित्य की छियानवे किरणें हैं। चित्त सूत्र रूप घ्राण से स्वर सहित निकलने वाली धारा भी छियानवे अंगुल होती है ॥ २४ ॥ बाम भुजा के पास कमर के दाहिनी ओर के मध्य में परमात्मा हंस का निवास है ॥ २५ ॥ पर इस गुह्य विषय को कोई जान नहीं पाता। जिनको अमृतत्व प्राप्त हो गया है, वे ही

पूर्वकाण्ड [ २२६

पूर्वकाण्ड [ २२६ उस सर्वकाल प्रकाशमान हंस को जानते हैं । प्रणव रूप हंस का अन्तर्ध्यान किये बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता ॥ २६ ॥ नवसूत्रान्परिचर्चितान् । तेऽपि यद्ब्रह्म चरन्ति । अन्तरा- दित्यं न ज्ञातं मनुष्याणाम् ॥२७॥ जगदादित्यो रोचत इति ज्ञात्वा ते मर्त्या विबुधास्तत्पनब्रार्थनायुक्ता आचरन्ति ॥२८॥ वाजपेयः पशुहर्ता अध्वर्युं रिन्द्रो देवता अहिंसा धर्मयागः परमहंसोऽध्वर्युः परमात्मा देवता पशुपतिः ॥२९॥ ब्रह्मोपनिषदो ब्रह्म । स्वाध्याय- युक्ता ब्राह्मणाश्चरन्ति ॥३०॥ अश्वमेधो महायज्ञकथा । तद्राज्ञा ब्रह्मचर्यमाचरन्ति । सर्वेषां पूर्वोक्तब्रह्मयज्ञक्रमं मुक्तिक्रममिति ॥३१॥ ब्रह्मपुत्रः प्रोवाच । उदितो हंस ऋषिः । स्वयंभूस्तिरोधधे । रुद्रो ब्रह्मोपनिषदो हंसज्योतिः पशुपतिः प्रणवस्तारकः स एवं वेद ॥३२॥ जो रंगे हुये नौ सूत्रों के यज्ञोपवीत को धारण करते हैं, वे भी ब्रह्म समझ कर ही उसकी उपासना करते हैं । पर इन लोगों को अन्तरादित्य रूप ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता ॥ २७ ॥ सूर्य जगत को प्रकाश देता है, यह समझकर वे बुद्धिमान मनुष्य शुद्ध बुद्धि और ज्ञान के लिए उसकी प्रार्थना करते हैं ॥ २८ ॥ बाजपेय यज्ञ पशुपति रूप हैं, उसका देवता इन्द्र होता है । अहिंसा का पालन बहुत बड़ा यज्ञ है, इसमें परमहंस अध्वर्यु, परमात्मा देवता है ॥ २९ ॥ वेद और उपनिषद् में जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है, उसी की ये स्वाध्याययुक्त ब्रह्मज्ञानी उपासना करते हैं ॥ ३० ॥ इस महायज्ञ का ज्ञान ही अश्वमेध यज्ञ है। इसके आश्रय से ही वे ब्रह्मज्ञान का आचरण करते हैं । पूर्वोक्त सब ब्रह्म यज्ञ ही मुक्ति प्रदान कर सकने वाले हैं ॥ ३१ ॥ ब्रह्मपुत्र ने फिर कहा—

॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥

२३० ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् “हँस विषयक ज्ञान का उदय हो गया ।” यह सुन कर स्वयंभू तिरोधान हो गये । उपनिषद् में जिस हंस ज्योति को कहा गया है, वही रुद्र है और संसार से उद्धार करने वाला प्रणव ही पशुपति है ॥३२॥ ॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥ उत्तर काण्डः हंसात्ममालिका वर्णब्रह्मकालप्रचोदिता । परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी ॥१॥ अध्यात्मब्रह्मकल्पस्य आकुतिः कीदृशी कथा । ब्रह्मज्ञानप्रभा सन्ध्या कालो गच्छति धीमताम् । हंसाख्यो देवमात्माख्यमात्मतत्त्वप्रजा कथम् ॥२ अन्तःप्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः । अन्तर्गतप्रमागूढं ज्ञाननालं विराजितम् ॥३ शिवशक्त्यात्मकं रूपं चिन्मयानन्दवेदितम् । नादबिन्दुकला त्रीणि नेत्र विश्वविचेष्टितम् ॥४ त्रियङ्गानि शिखा त्रीणि द्वित्रीणि संख्यमाकृतिः । अन्तर्गूढप्रमा हंसः प्रमाणान्निर्गतं बहिः ॥५ 'हंस' का जप ही वर्ण ब्रह्म है, इसी से ब्रह्म की प्राप्ति होती है । परमात्मा और पुरुष भी यही है ॥ १ ॥ जो आत्मज्ञान से ब्रह्म सदृश्य हो गया हो उसके विषय में कहने को क्या रह जाता है ? ज्ञानी जन अपना समय ब्रह्म की चर्चा और उपासना में ही व्यतीत करते हैं । जब हंस और आत्मा में एकता स्थापित हो जाती है, तो प्रजा कहाँ हो सकती है ॥ २ ॥ भीतर में होने वाले प्रणव रूपी नाद से जो हंस विदित होता है, वही सब ज्ञान कराने वाला है । अन्तरानुभव द्वारा बाह्य ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ शिव

उत्तरकाण्ड [ २३१

उत्तरकाण्ड [ २३१ सक्ति रूप, चिन्मय और आनन्द से विदित होने वाला वही है। नाद, बिन्दु और कला---इन तीनों नेत्रों से ही जगत चेष्टायुक्त है ॥४॥ तीन अङ्ग, तीन शिखा और दो या तीन मात्राओं से उसकी आकृति विदित होती है। जब इस प्रकार अन्तर्ज्ञान हो जाता है, तब इस गूढ़ आत्मा का ज्ञान बाह्यरूप से भी होने लगता है ॥ ५ ॥ ब्रह्मसूत्रपदं ज्ञेयं ब्राह्मयं विध्युक्तलक्षणम् । हंसार्कंप्रणवध्यानमित्युक्तो ज्ञानसागरे ॥६ एतद्विज्ञानमात्रेण ज्ञानसागरपारगः । स्वतः शिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य सर्वदा ॥७ सर्वेषां तु मनस्तेन प्रेरितं नियमेन तु । विषये गच्छति प्राणश्चेष्टते वाग्वदत्यपि ॥८ चक्षुः पश्यति रूपाणि श्रोत्रं सर्वं शृणोत्यपि । अन्यानि खानि सर्वाणि तेनैव प्रेरितानि तु ॥६ स्वं स्वं विषयमुद्दिश्य प्रवर्तन्ते निरन्तरम् । प्रवर्तकत्व चाप्यस्य मायया न स्वभावतः ॥१० जगत के सूत्र रूप ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और हंस रूपी सूर्य का प्रणव सहित ध्यान करना चाहिये, यही ज्ञानियों का उपदेश है ॥ ६ ॥ इस तरह के ज्ञान की प्राप्ति होने से ही ज्ञान सागर के पार पहुंचा जा सकता है। स्वयं शिव और पशुपति ही सर्वदा साक्षी रूप हैं ॥ ७ ॥ वही शिव सब से मन को प्रेरित और नियमन करने वाला है, जिसके प्रभाव से मन विषयों में जाता है, प्राण चेष्टा करते हैं और वाणी उच्चारण करती है ॥ ८ ॥ उसकी प्रेरणा से ही नेत्र देखते हैं, कान सुनते है और अन्य सब इन्द्रियां भी

२३२ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् अपने-अपने विषयों में निरन्तर प्रवृत्त रहती हैं। यह प्रवृत्त होना माया रूप होता है, स्वभावतः नहीं होता ॥६--१०॥ श्रोत्रमात्मनि चाध्यस्तं स्वयं पशुपतिः पुमान् । अनुप्रविश्य श्रोत्रस्य ददादि श्रोत्रतां शिवः ॥११ मनः स्वात्मनि चाध्यस्तं प्रविश्य परमेश्वरः । मनस्त्वं तस्य सत्यस्थो ददाति नियमेन तु ॥१२ स एव विदितादन्यस्तथैवाविदितादपि । अन्येषामिन्द्रियाणां तु कल्पितानामहीश्वरः ॥१३ तत्तद्रूपमनुप्राप्य ददाति नियमेन तु । ततश्चक्षुश्च वाक्चैव मनश्चान्यानि खानि च ॥१४ न गच्छन्ति स्वयंज्योतिःस्वभावे परमात्मनि । अकर्तुर्विषयप्रत्यक्प्रकाशं स्वात्मनैव तु ॥१५ विना तर्कप्रमाणाभ्यां ब्रह्म यो वेद वेद सः । प्रत्यगात्मा परं ज्योतिर्माया सा तु महत्तमः ॥१६ श्रोत्र आत्मा के आश्रित है और स्वयं पशुपति ही श्रोत्र में प्रविष्ट होकर उसको श्रवण शक्ति देते हैं ॥ ११ ॥ मन भी आत्मा में अध्यस्त है और परमेश्वर उसमें प्रविष्ट होकर, यहां रहते हुये उसे नियम रखते हैं और मनस्त्व प्रदान करते हैं ॥ १२ ॥ इसी प्रकार वे ही परमेश्वर सब इन्द्रियों को सचेष्ट करते हैं, पर लोग उनको जैसा बताते हैं या अनुमान करते हैं, उससे वे भिन्न हैं ॥ १३ ॥ परमेश्वर ही इन सब इन्द्रियों को तदनुकूल रूप देते हैं और उनका नियमन करते हैं, इसलिये ये नेत्र, वाणी, मन आदि समस्त इन्द्रियाँ परमात्मा के स्वयं ज्योति रूप को प्राप्त नहीं हो सकतीं ( उसे नहीं जान सकतीं) जो यह समझता है कि परमात्मा अन्तः-

उत्तरकाण्ड ] [ २३३

उत्तरकाण्ड ] [ २३३ करण के विषयों से भिन्न हैं और इसलिये बिना तर्क और प्रमाण के उसे अपनी आत्मा से जानने का प्रयत्न करना चाहिए, उसी को यथार्थ में परमात्मा का ज्ञान हो सकता है। यह आत्मा ही परम प्रकाशरूप है, जब कि माया घोर तमरूप है ॥१४—१६॥ तथा सति कथं मायासम्भवः प्रत्यगात्मनि । तस्मात्तर्कप्रमाणाभ्यां स्वानुभूत्या च चिद्घने ॥१७ स्वप्रकाशैकसंसिद्धे नास्ति माया परात्मनि । व्यावहारिकदृष्ट्येयं विद्याऽविद्या न चान्यथा ॥१८ तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् । व्यावहारिकदृष्टिस्तु प्रकाशाव्यभिचारतः ॥१९ प्रकाश एव सततं तस्मादद्वैत एव हि । अद्वैतमिति चोक्तिश्च प्रकाशाव्यभिचारतः ॥२० इसलिए प्रत्यगात्मा और माया को एकता किसी प्रकार संभव नहीं। इस प्रकार तर्क, प्रमाणों और अनुभव से विदित होता है कि चैतन्य रूप, स्वयं प्रकाश परमात्मा में माया नहीं है। विद्या और अविद्या के विषय व्यवहारिक हैं, परमात्मा से उनका सम्बन्ध नहीं ॥१७-१८॥ तत्व की दृष्टि से यह सब मिथ्या है, केवल एक तत्व ही वास्तविक है । व्यवहारिक दृष्टि से भी जो भी कुछ जान पड़ता है वह भी उसी प्रकार का आभास है। इससे यह सब अद्वैत ही है और अद्वैत भी उस प्रकार के अभेद से कहा जाता है ॥२०॥ प्रकाश एव सततं तस्मान्मौनं हि युज्यते । अयमर्थो महान्यस्य स्वयमेव प्रकाशितः ॥२१ न स जीवो न च ब्रह्मा न चान्यदपि किंचन । न तस्य वर्णा विद्यन्ते नाश्रमाश्च तथैव च ॥२२

२३४ ] पाशुपतब्रह्मोपनिषत् न तस्य धर्मोऽधर्मश्च न निषेधो विधिर्न च । यदा ब्रह्मात्मकं सर्वं विभाति स्वत एव तु ॥२३ तदा दुःखादिभेदोऽयमाभासोऽपि न भासते । जगज्जीवादिरूपेण पश्यन्नपि परात्मवित् ॥२४ न तत्पश्यति चिद्रूपं ब्रह्मवस्त्वेव पश्यति । धर्मधर्मित्ववार्ता च भेदे सति हि भिद्यते ॥२५ इस प्रकार सब एक ही प्रकाश है और इसके सम्बन्ध में अधिक कुछ कहने की अपेक्षा मौन श्रेष्ठ है । जिसको यह महान ज्ञान स्वयं ही विदित हो गया है वह न जीव रूप है, न ब्रह्म है और न कुछ और है । उसको वर्ण भी नहीं है, आश्रम भी नहीं है, धर्म भी नहीं है, अधर्म भी नहीं है, निषेध भी नहीं, विधि भी नहीं है । जब उसको सब कुछ ब्रह्ममय दिखाई देता है, तो उसे यह दुःखादि भेद का आभास बिल्कुल नहीं जान पड़ता । परब्रह्म का इस प्रकार ज्ञान रखने वाला इस जीवादि रूप वाले जगत को देखते हुए भी नहीं देखता । वह केवल चिद्रूप ब्रह्म को ही देखता है, धर्म तथा धर्मों का विषय भेद के रहते हुये भिन्न है ॥२१—२५॥ भेदा [दोऽ] भेदस्तथा भेदाभेदः साक्षात्परात्मनः । नास्ति स्वात्मातिरेकेण स्वयमेवास्ति सर्वदा ॥२६ ब्रह्मव विद्यते साक्षाद्वस्तुतोऽवस्तुतोऽपि च । तथैव ब्रह्मविज्ज्ञानी किं गृह्णाति जहाति किम् ॥२७ अधिष्ठानमनौपम्यमवाङ् मनसगोचरम् । यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् ॥२८ अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिदं तथा । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ॥२६

उत्तरकाण्ड ] [ २३५

उत्तरकाण्ड ] [ २३५ ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्ता— द्व्रह्मानन्दं परमं चैव पश्चात् । ब्रह्मानन्दं परमं दक्षिणे च ब्रह्मानन्दं परमं चोत्तरं च ॥३० एक मात्र वह परमात्मा ही सदा से वर्तमान है और अन्य सब भेद, आदि तथा भेदाभेद उसमें ही व्याप्त हैं ॥ २६ ॥ वस्तु या अवस्तु जो कुछ है वह सब साक्षात् ब्रह्म ही है । ऐसी अवस्था में ब्रह्मज्ञान रखने वाला किसी का ग्रहण या त्याग कैसे कर सकता है ? ॥ २७ ॥ जो ब्रह्म उपमारहित, वाणी और मन से अगोचर, दृष्टि से दिखाई न देने वाला, ग्रहण न कर सकने योग्य, अगोत्र, रूप रहित है, जो नेत्र, कान, हाथ, पैर आदि से रहित, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्म, अव्यय, मृत्युरहित है वही सब का अधिष्ठान या आधार स्वरूप है । उसके आगे और पीछे श्रेष्ठ ब्रह्मानन्द ही है, दांये, बांये भी वह परम ब्रह्मानन्द है ॥३०॥ स्वात्मन्येव स्वयं सर्वं सदा पश्यति निर्भयः । तदा मुक्तो न मुक्तश्च बद्धस्यैव विमुक्तता ॥३१ एवंरूपा परा विद्या सत्येन तपसाऽपि च । ब्रह्मचर्यादिभिर्धर्मैर्लभ्या वेदान्तवर्त्मना ॥३२ स्वशरीरे स्वयंज्योतिःस्वरूपं परमार्थिकम् । क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥३३ एवं स्वरूपविज्ञानं यस्य कस्यास्ति योगिनः । कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य संपूर्ण रूपिणः ॥३४ आकाशमेकं संपूर्णं कुत्रचिन्न हि गच्छति । तद्वद्ब्रह्मात्मविच्छ्रेष्ठः कुत्रचिन्नैव गच्छति ॥३५

२३६ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् ऐसा साधक सब को सदा अपनी आत्मा के भीतर ही निःशङ्क भाव से देखता है । इस प्रकार भाव रखने से ज्ञानी ही नहीं अज्ञानी तक भी मुक्त हो जाता है ॥ ३१ ॥ यह परविद्या सत्य, तपस्या और ब्रह्मचर्य से वेदान्त मार्ग द्वारा प्राप्त होती है ॥३२॥ जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, जिसके दोष क्षीण हो गये हैं, वे ही अपने भीतर स्वयं प्रकाशमान परमात्मा को देख सकते हैं, माया में फंसे हुये उसको नहीं देख सकते ॥ ३३ ॥ जो योगी अपने स्वरूप को इस प्रकार जानता है, उस पूर्णता प्राप्त का आवागमन नहीं होता है ॥ ३४ ॥ जैसे जो सर्वत्र उपस्थित है वह कहीं नहीं आता जाता, उसी प्रकार जिसने अपने को ब्रह्म रूप समझ लिया है वह कहीं नहीं आ-जा सकता ॥३५॥ अभक्ष्यस्य निवृत्या तु विशुद्धं हृदयं भवेत् । आहारशुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ॥३६ चित्ते शुद्धे क्रमाज्ज्ञानं त्रुट्यन्ते ग्रन्थयः स्फुटम् । अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञानस्यैव देहिनः ॥३७ न सम्यग्ज्ञानिनस्तद्वत्स्वरूपं सकलं खलु । अहमन्नं सदाऽन्नाद इति हि ब्रह्मवेदनम् ॥३८ ब्रह्मविद्ग्रसति ज्ञानात्सर्वं ब्रह्मात्मनैव तु । ब्रह्मक्षत्रादिकं सर्वं यस्य स्यादोदनं सदा ॥३९ यस्योपसेचनं मृत्युस्त्यज्ज्ञानी तादृशः खलु । ब्रह्मस्वरूपविज्ञानाज्जगद्भोज्यं भवेत्खलु ॥४० आहार में अभक्ष्य का त्याग कर देने से चित्त शुद्ध हो जाता है, आहार की शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती है ॥३६॥ जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रन्थियां नष्ट हो जाती हैं । पर भक्ष्याभक्ष्य का विचार Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

उत्तरकाण्ड ] [ २३७

उत्तरकाण्ड ] [ २३७ उसके लिए ही आवश्यक है जिसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है ।।३७।। क्योंकि सम्यक् ज्ञानी का स्वरूप अज्ञानी के समान भेद ज्ञानयुक्त नहीं होता। ज्ञानी यह जानता है कि खाने वाला मैं हूँ और अन्न भी मैं हूँ ॥ ॥३८॥ पर जो ब्रह्मज्ञानी होता है वह सब को ब्रह्ममय देखता है, इसलिये ब्राह्मण क्षत्रिय आदि की भावना ही उसका भोजन हो जाता है ॥ ३६ ॥ मृत्यु जिसका अन्न ( भोजन ) है ऐसे ब्रह्म को जानने वाला भी वैसा ही हो जाता है और यह समस्त जगत उसके लिये भोजन स्वरूप हो जाता है ।।४०।। जगदात्मतया भाति यदा भोज्यं भवेत्तदा । ब्रह्मस्वात्मतया नित्यं भक्षित सकल तदा ।।४१ यदा भानेन रूपेण जगद्भोज्यं भवेत्तु तत् । मानतः स्वात्मना भातं भक्षितं भवति ध्रुवम् ।।४२ स्वस्वरूपं स्वयं भुङ्क्ते नास्ति भोज्यं पृथक् स्वतः। अस्ति चेदस्तितारूपं ब्रह्म वास्तित्वलक्षणम् ।।४३ अस्तितालक्षणा सत्ता सत्ता ब्रह्म न चापरा । नास्ति सत्ताऽतिरेकेण नास्ति माया च वस्तुतः ।।४४ योगिनामात्मनिष्ठानां माया ह्यात्मनि कल्पिता । साक्षिरूपतया भांति ब्रह्मज्ञानेन बाधिता ॥४५ ब्रह्मविज्ञानसंपन्नः प्रतीतमखिलं जगत् । पश्यन्नपि सदा नैव पश्यति स्वात्मनः पृथक् ॥४६ इत्युपनिषत् ॥ जब जगत को आत्मरूप में अनुभव किया जाता है, तो वह भोज्यरूप हो जाता है। आत्मरूप से ब्रह्म सदैव उसे भक्षण करता रहता है ।।४१।। जिसका आभास होने से यह जगत भोजन रूप बन जाता है, जब वह आत्मरूप विदित हो जाता है तो अवश्य ही

२३८ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषद् ब्रह्म द्वारा भक्षित होती है ॥४२॥ इस प्रकार ब्रह्म अपने स्वरूप को स्वयं ही खाता है, क्योंकि भोज्य पदार्थ उससे पृथक नहीं है, वैसे भी यदि वह अस्तित्व रूप है तो भी वह ब्रह्म है, क्योंकि ब्रह्म के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व ही नहीं है ॥४३॥ सत्ता का लक्षण अस्तित्व माना जाता है और सत्ता ब्रह्म से भिन्न नहीं होती । ब्रह्म के सिवाय कोई सत्ता नहीं है, माया से कोई वास्तविक वस्तु नहीं होती ॥ ४४ ॥ योगीजन माया की कल्पना अपनी आत्मा से करते हैं। ब्रह्मज्ञान से बाधित होकर वह [उनको साक्षी रूप भासती है ॥४५॥ इस प्रकार जिस ज्ञानी को ब्रह्मज्ञान का अनुभव हो गया है, वह चाहे जगत को अपने सम्मुख देखता रहे, पर वह उसे अपने से पृथक नहीं मानता ॥४६॥ ॥ पाशुपत ब्रह्म उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवाव है । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करें, वह हम दोनों का पालन करें, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। अथातः सर्वोपनिषत्सारं संसारज्ञानातीतमन्नसूक्तं शरीर यज्ञं व्याख्यास्यामो यस्मिन्नेव पुरुषशारीरे विनाऽप्यग्निहोत्रेण विनाऽपि सांख्येन संसारनिवृत्तिर्भवतीति ॥ १ ॥ स्वेन विधिनाऽन्नं भूमौ निक्षिप्य या ओषधयः सोमराज्ञी- रिति तिसृभिरन्नपत इति द्वाभ्यामभिमन्त्रयति ॥ २ ॥ या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः । बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥३ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः । बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥४ जीवला नघारिषां मा ते बध्नाम्योषधीः । यातयायु रुपाहरादप रक्षांसि चातयात् ॥५ अब सब उपनिषदों का सारभूत सांसारिक ज्ञान से अतीत (परे) अन्नसूक्त तथा शरीर यज्ञ की व्याख्या की जाती है। जिस पुरुष शरीर के जान लेने पर बिना ही अग्निहोत्र के, बिना ही सांख्य

२४० ] [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् आदि दर्जनों के ज्ञान के संसार की निवृत्ति ( संसार से निवृत्ति ) पराङ्मुखता ( मोक्ष प्राप्ति ) हो जाती है ॥ १ ॥ बाह्य प्राणाग्नि- होत्र की विधि अपनी-अपनी विधि के अनुसार पृथ्वी में बनाई वेदिका में शाकयुक्त अन्न रख कर 'या ओषधय' या फलिनी......जीवला नया- रिशां......'इन तीन तथा' अन्नपते अन्नस्य......यदन्नमग्नि......इन दो से अभिमन्त्रित करे ॥ २ ॥ अब क्रमशः वह उपर्युक्त तीन व दो ऋचायें लिखी जाती हैं—जो सोम देवता प्रधान शतवीर्यं बहुशाखा वाली वृहस्पति प्रसूत ओषधियां हैं वह हमें पापमुक्त करदें ॥ ३ ॥ जो फल- युक्त, फलहीन, पुष्पहीन, अथवा पुष्प ( फूल ) युक्त वृहस्पति प्रसूत ( उत्पन्न ) ओषधियां हैं, वह हमें पापमुक्त करदें ॥ ४ ॥ इन दो मन्त्रों तथा 'जीवला......रक्षांसि चातयान्'—इस तीसरे मन्त्र द्वारा एवं......अन्नपते......द्विपदे चतुष्पदे यदंग्निना......ईशानाय स्वाहा, इन दो मन्त्रों से अभिषेक करना चाहिये । अर्थात् क्रमशः दिये इन पांच मन्त्रों से उस पिण्ड पर जलाभिषेक करना चाहिये ॥ ५ ॥ अन्नेपतेऽन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः । प्रप्रदातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥६ यदन्नमग्निर्बहुधा विरुदं रुद्रैः प्रजाधं यदि वा पिशाचैः । सर्वं तदीशानो अभयं कृणोतु शिवमीशानाय स्वाहा ॥७ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः । त्वं तज्ञस्त्वं ब्रह्मा त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्रों नमः ॥८ आपः पुनन्तु पृथिवीं पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मा पूता पुनातु माम् ॥

प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् [ २४१ यदुच्छिष्टमभोज्यं यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहं स्वाहा ॥६॥ अमृतमस्त्वमृतोपस्तरणमस्यमृतं प्राणे होम्यमाशिष्यन्त्योऽसि ॐ प्राणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा ॐ व्यानाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा ॐ समानाय स्वाहा ॐ ब्रह्मसो स्वाहा ॐ ब्रह्मणि म आत्माऽमृतत्वायति ॥ १० ॥ इन मन्त्रों से अन्न को छूकर अभिमन्त्रित कर दाहिने हाथ में जल लेकर 'अन्न श्वरसि...' 'आपः पुनन्तु' इन दो मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर अन्न का प्रोक्षण करे (जल के छींटे दे) तू प्राणियों के हृदय में सर्वतोमुख रूप होकर (सर्वत्र व्यापक) स्थित है, भ्रमण करता है। तू ही यज्ञ, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, वषट्कार, जलराशि, ज्योतिः, रस, अमृत, ब्रह्म तथा भू भुवः एवं स्वः है, तुझे नमस्कार है ॥ ८ ॥ हे जल ! तुम पृथिवी को पवित्र करो और पवित्र हुई जो पृथ्बी वह मुझे पवित्र करे। ब्रह्मणस्पति भी पवित्र करे, ब्रह्मपूत पृथ्बी मुझे पवित्र करे। जो उच्छिष्ट, अभक्ष्य या दुश्चरित मेरा हो, उन सबको जल पवित्र कर दें और पापों को रोक दें ॥ ६ ॥ इस प्रकार प्रोक्षण करके दो बार अभिषेक कर बाँये हाथ से वेदिका को छूता हुआ दाहिने हाथ में ग्रहण कर 'अमृतभस्त्वमृतोपस्तरणमसि' यह कह कर उसे पी कर 'अमृत प्राणे होम्यभाशिष्यन्नोसि' यह कहकर मृतोपम होम करने योग्य वस्तु को तूने आस्वादित किया है यह समझ आत्मानुसन्धान पूर्वक प्राण में आहुतियाँ करे-ॐ प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान ये इन आहुतियों को प्राप्त करें। ब्रह्म भी आहुतियाँ प्राप्त करें। ब्रह्म में मेरी आत्मा अमृतत्व का आस्वादन करे ॥ १० ॥ कनिष्ठिकाऽङ्गुष्ठेनप्राणे जुहोति अनामिकयाऽपाने मध्यमिकया व्याने सर्वाभिरुदाने प्रदेशिन्या समाने ॥ ११ ॥ तूष्णीमेकामेकऋचा जुहोति द्वे आहवनीये एकां दक्षिणाग्नौ

२४२ ] [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् एकां गार्हपत्ये एकां सर्वप्रायश्चित्तीये ॥ १२॥ अथापिधानमस्य मृतत्वायोपस्पृश्य पुनरादाय पुनः स्पृशेत् ॥ १३ ॥ सव्ये पाणा- वापो गृहीत्वा हृदयमन्वालभ्य जपेत्— प्राणोऽग्निः परमात्मा पञ्चवायुभिरावृतः । अभयं सर्वभूतेभ्यो न मे भीतिः कदाचन ॥१४ विश्वोऽसि वैश्वानरो विश्वरूपं त्वया धार्यते जायमानम् । विश्वं त्वाहुतयः सर्वा यत्र ब्रह्माऽमृतोऽसि ॥१५ कनिष्ठिका अँगुली तथा अंगूठे से प्राण में अनामिका से, अपान में मध्यमा से, व्यान में सभी अँगुलियों से, उदान में तर्जनी से, समान में आहुति डाले ( कल्पना करो ) ॥ ११ ॥ मौन होकर एक आहुति 'प्राणाय स्वाहा' इस एक ऋचा से 'अपानाय स्वाहा' ये दो आहुतियाँ आहवनीय में होम करे। एक दक्षिणाग्नि, एक गार्हपत्य तथा एक सर्व प्रायश्चितीय अग्नि में होम करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार पांच आहुतियां करके यथानियम खाकर ( आहुति शेष ) 'अथ पुरस्तात् चोप रिष्टाच्च अद्भिः परिदधाति' इति श्रुति के अनुरोध से— अपिधान स्वरूप को अमृतत्व के लिए छूकर फिर ग्रहण कर पुनः स्पर्श करे ॥ १३ ॥ बाँये हाथ में जल ग्रहण कर हृदयालम्भन कर ( हृदय के पास हाथ रख ) जप करे— मुख्य प्राण ही अग्नि है स्वगत विशेष अंशों की समाप्ति पर वही परमात्मा है विराड् आदि स्थानीय पांच वायुओं के द्वारा आवृत है। मुझे सब प्राणियों से अभय प्रदान करें, मुझे उनसे कभी भय उत्पन्न न हो ॥ १४ ॥ हे मुख्य प्राण ! व्यष्टि ( एक-एक ) समष्टि ( समूह रूप ) के उपाधि भेद से तू ही विश्व ( व्यावहारिक ) वैश्वानर ( विराड् ) होकर विश्व रूप को धारण करता है 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । जिस रूप में कि तू ब्रह्मामृत स्वरूप है, तेरे से

प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् ] [ २४३ प्रादुर्भूत होने वाला विश्व तो तुरीयाग्नि में सभी आहुतियां हो जाता है (विलीन हो जाता है) ॥१५॥ महानवोऽयं पुरुषो योऽङ्गुष्ठाग्रे प्रतिष्ठितः । तमद्भिः परिषिञ्चामि सोऽस्यान्ते अमृताय च ॥१६॥ अनादित्येष बाह्यात्मा ध्यायेताग्निहोत्रं जुहोति । सर्वेषा मेव सूनुर्भवतु । अस्य यज्ञपरिवृता आहुतीर्होमयंति ॥१७॥ स्वे शरीरे यज्ञं परिवर्तयामीति । चत्वारोऽग्नयस्ते किं कामरवंयाः ॥१८॥ तत्र सूर्याग्निर्नामि सूर्यमण्डलाकृतिः हसस्र- रश्मिपरिवृत एकऋषिर्भूत्वा मूर्धनि तिष्ठति यस्मादुक्तो दर्शना- ग्निर्नाम चतुराकृतिराहवनीयो भूत्वा मुखे तिष्ठति । शारीरोग्नि- र्नाम जराप्रणुदा हविरवस्कन्दति अधचन्द्राकृतिर्दक्षाग्निर्भूत्वा हृदये तिष्ठति । तत्र कोष्ठाग्निरिति-कोष्ठाग्निर्नामाश्चितपीतलीढ स्वादितं सम्यग्व्यष्टयं विषचित्वा गार्हपतयो भूत्वा नाभ्यां तिष्ठति ॥ १८ ॥ प्रायश्चित्तयस्तवधस्तात्तिर्यक् तिस्रो हिमांशुः प्रभुः प्रजननकर्मा ॥२०॥ “त प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम्” इस श्रुति के अनुरोध से जो पैर के दोनों अँगूठों के आगे प्राण रूप से प्रतिष्ठित है वह तू प्रतिक्षण अभिनव ( नया २ ) पुरुष होता है अर्थात् नित्य नवीन रूप में रहता है। इस भोजन के (प्राशन के) अन्त में अमृतत्व की प्राप्ति के लिये उस व्यापक अन्न जल द्वारा सिञ्चित करता हूँ (अर्थात् उच्छ्वास निवास रूप से अभिषिक्त करता हूँ ) तेरा अभिषेक करता हूँ ॥ १६ ॥ ये चेष्टा विशिष्ट है अतः बाह्यात्मा इनका ध्यान करे। यह पुरुष प्रतिदिन प्राण रूपी अग्निहोत्र करता है क्योंकि सभी तुझ परमात्मा (अग्निरूप) का पुत्रवत् पोषण करते हैं अतः तू सब का पुत्र भी होता है, इस प्रकार

२४४ ] [प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्] जो तू तेरी यह लोक आहुतियों का होम करता है ॥ १७ ॥ अपने शरीर में यज्ञ की कल्पना की जाती है । इन शरीर निर्वर्त्य अग्नियों की संख्या चार है । उनका स्वरूप अत्यन्त (सूक्ष्म छोटा) है । ये सब अर्धमात्रिक मात्र हैं ॥ १८ ॥ इन चार में से सूर्याग्नि नामक अग्नि जो कि सूर्य मण्डल की आकृति का है, हजारों अत्यन्त तेजस्वी किरणों से युक्त व्यापक रूप होकर सिर में स्थित रहता है जैसे कि प्रसिद्ध है ‘तुरीयं मूर्धिन संस्थितम्’ । क्योंकि यह जीवात्मा सर्वज्ञ ईश्वर रूप में दीखता है, इसी कारण यह एक दर्शनाग्नि कहलाता है जो कि बीज, विराड् आदि चार आकृति वाला आहवनीय होकर (होम का आधार स्थल बनकर) मुख में रहता है । (स्थूल शरीर का दाह करने वाली) शरीर अग्नि (हिरण्यगर्भ) स्थूल शरीराश्रित जरादि (वृद्धावस्था) द्वारा क्षीण किया जाता है स्थूल प्रपंच रूप हवि को ग्रसित करता है जो कि अर्धचन्द्र की आकृति वाला दक्षिणाग्नि होकर सब प्राणियों के हृदय में स्थिर रहता है । ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः प्राणायाम समायुक्त। पंचाभ्यन्नं चतुर्विधम्’ इस रूप में सिद्ध ‘कोष्ठाग्नि’ है जो कि खाई, पी हुई, चाटी तथा आस्वादित वस्तु को भली भाँति पकाकर गार्हपत्य रूप में नाभि स्थल में रहता है ॥ १९ ॥ प्रायः चित्तोपाधि स्वरूप विराड् आदि के नीचे प्रतिष्ठित वक्र, तीन (पराग वृत्तियाँ) जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन तीन अवस्था के प्रकाशक हिमांशु अर्थात् चिद्रूप चन्द्र सभी प्रकार प्रभु हैं । [समर्थ] है सब कुछ प्रकाशित कर देने वाला है ॥२०॥ अस्य शारीरयज्ञस्य यूपरशनाऽशोभितस्य को यजमानः का पत्नी के ऋत्विजः के सदस्याः कानि यज्ञपात्राणि कानि हवींषि का वेदिः कान्तर्वेदिः को द्रोणकलशः को रथः कः पशुः कोऽध्वर्युः को होता को ब्रह्मा को उद्गाता कः प्रति-

प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् [ २४५ प्रस्थाता कः प्रस्तोता को मैत्रावरुणः क उद्गाता का धारा कः पोता के दर्भाः कः स्रुवः काऽऽज्यस्थाली कावाधारौ कावाज्य- भागौ के प्रयाजाः के अनुयाजाः केडा कः सूक्तवाकः कः शंयोर्वाकः के पत्नीसंयाजाः को यूपः का रशना का इष्टयः का दक्षिणा किमवभृथमिति ॥२१॥ अस्य शारीरयज्ञस्य यूपरशना- ऽशोभितस्यात्मा यजमानः बुद्धिः पत्नी वेदा महर्त्विजः अहंकारोऽध्वर्युः चित्तं होता प्राणो ब्राह्मणाच्छंसी अपानः प्रतिप्रस्थाता व्यानः प्रस्तोता उदान उद्गाता समानो मैत्रा- वरुणः शरीरं वेदिः नासिकाऽन्तर्वेदिः मूर्धा द्रोणकलशः पादो रथः दक्षिणहस्तः स्रुवः सव्य आज्यस्थाली श्रोत्रे आधारौ चक्षुषी आज्यभागौ ग्रीवा धारा पोता तन्मात्राणि सदस्याः महाभूतानि प्रयाजाः गुणा अनुयाजाः जिह्वोडा दन्तोष्ठौ सूक्त- वाकः तालुः शंयोर्वाकः स्मृतिदया क्षान्तिरहिंसा पत्नीसंयाजाः ओंकारो यूपः आशा रशना मनो रथः कामः पशुः केशा दर्भाः इन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि कर्मेन्द्रियाणि हवींषि अहिंसा इष्टयः त्यागो दक्षिणा अवभृथं मरणात् सर्वाण्यस्मिन् देवता शरीरे- ऽधिसमाहिताः ॥२२॥ वाराणस्यां मृतो वाऽपि इदं वा ब्राह्मणः पठेत् । एकेन जन्मना जन्तुर्मोक्षं च प्राप्नुयादित्यपनिषत् ॥२३ इस शरीर यज्ञ का, जो कि खम्भे तथा रशनाहीन है, कौन यजमान है ? तथा पत्नी, ऋत्विज, सदस्य कौन है ? यज्ञ-पात्र हवि, वेदि अन्तर्वेरदिका ( छोटी ) द्रोण कलश, रथ, पशु ( बलिपशु ) अध्वर्युं, होता, ब्राह्मणच्छंसी, प्रतिस्थाता, प्रस्तोता, मैत्रावरुण उद्गाता, धारा, पवन करने वाला, दर्भ ( कुश ) स्रुवा, आज्यस्थाली ( घृतपात्र ) आधार, आज्यभाग, प्रयाज, अनुयाज, इडा, सूक्तवाक् शंयोवाक्, पत्नीसंयाज, यूप, ( खम्भा ), रशना इष्ट दक्षिणा एवं यज्ञ के

[Header] २४६ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्

[Body] अन्त में किये जाने वाला अवभृथ ( एक स्नान विशेष ) कौन कौन हैं ? अर्थात् जैसे यज्ञ में उपर्युक्त सभी वस्तुयें अपेक्षित हैं वैसे ही इस शरीर यज्ञ के लिये भी ये अवश्य अपेक्षित हैं, फिर ये कहाँ हैं तथा कौन हैं ? ॥ २१ ॥ इस शरीर यज्ञ का आत्मा यजमान है, बुद्धि पत्नी है, वेद ही महा ऋत्विज है, अहङ्कार तत्त्व ही अध्वर्यु है, चित्त ही होता है, प्राण ब्राह्मणच्छंसी है, अपान प्रतिप्रस्थाता है, व्यान प्रस्तोता, उदान उद्गाता, समान, मैत्रावरुण, शरीर वेदि, नाक, अन्त, वेदी, सिर द्रोण कलश, पैर, रथ, दाहिना हाथ स्रुवा, बाँया हाथ घृतपात्र, कान आधार (प्रणिया प्रोक्षणीपात्र) आंख आज्यभाग, गर्दन धारा, तन्मात्राएँ [पाँच] पोता, पञ्चमहाभूत सदस्य, गुण प्रयाज अनुयाज, जीभ इडा, दांत ओष्ट सूक्तवाक, बालु शंयोर्वाक, स्मृति दया शान्ति अहिंसा, पत्नीसंयाज, ॐकार खम्भा, आशा रशना, मन रथ, काम ही पशु, काल ही कुशायें इन्द्रियां यज्ञपात्र, कर्मेन्द्रियां हवि, अहिंसा इष्टकायें, त्याग ही दक्षिण मृत्यु ही अवभृथ स्नान है । अर्थात् उपर्युक्त वस्तुओं में तत्तद् वस्तु की स्थिति समझ उन्हीं के अनुसार क्रियायें भी समझनी चाहिये । तभी यह यज्ञ पूरा फलदायक होता है [ मोक्ष की प्राप्ति का साधन होता है ] तथा सभी देवता इस शरीर में समाहित होते हैं ॥ २२ ॥ यदि किसी का शरीर काशी में छूटे अथवा यदि कोई ब्राह्मण इसे पढ़े तो एक ही जन्म से चित्त शुद्धि करने वाले ज्ञान तथा मोक्ष को प्राप्त करले ॥२३॥

॥ प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् समाप्त ॥

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[Footer] Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi