भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् [ २४१ यदुच्छिष्टमभोज्यं यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहं स्वाहा ॥६॥ अमृतमस्त्वमृतोपस्तरणमस्यमृतं प्राणे होम्यमाशिष्यन्त्योऽसि ॐ प्राणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा ॐ व्यानाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा ॐ समानाय स्वाहा ॐ ब्रह्मसो स्वाहा ॐ ब्रह्मणि म आत्माऽमृतत्वायति ॥ १० ॥ इन मन्त्रों से अन्न को छूकर अभिमन्त्रित कर दाहिने हाथ में जल लेकर 'अन्न श्वरसि...' 'आपः पुनन्तु' इन दो मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर अन्न का प्रोक्षण करे (जल के छींटे दे) तू प्राणियों के हृदय में सर्वतोमुख रूप होकर (सर्वत्र व्यापक) स्थित है, भ्रमण करता है। तू ही यज्ञ, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, वषट्कार, जलराशि, ज्योतिः, रस, अमृत, ब्रह्म तथा भू भुवः एवं स्वः है, तुझे नमस्कार है ॥ ८ ॥ हे जल ! तुम पृथिवी को पवित्र करो और पवित्र हुई जो पृथ्बी वह मुझे पवित्र करे। ब्रह्मणस्पति भी पवित्र करे, ब्रह्मपूत पृथ्बी मुझे पवित्र करे। जो उच्छिष्ट, अभक्ष्य या दुश्चरित मेरा हो, उन सबको जल पवित्र कर दें और पापों को रोक दें ॥ ६ ॥ इस प्रकार प्रोक्षण करके दो बार अभिषेक कर बाँये हाथ से वेदिका को छूता हुआ दाहिने हाथ में ग्रहण कर 'अमृतभस्त्वमृतोपस्तरणमसि' यह कह कर उसे पी कर 'अमृत प्राणे होम्यभाशिष्यन्नोसि' यह कहकर मृतोपम होम करने योग्य वस्तु को तूने आस्वादित किया है यह समझ आत्मानुसन्धान पूर्वक प्राण में आहुतियाँ करे-ॐ प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान ये इन आहुतियों को प्राप्त करें। ब्रह्म भी आहुतियाँ प्राप्त करें। ब्रह्म में मेरी आत्मा अमृतत्व का आस्वादन करे ॥ १० ॥ कनिष्ठिकाऽङ्गुष्ठेनप्राणे जुहोति अनामिकयाऽपाने मध्यमिकया व्याने सर्वाभिरुदाने प्रदेशिन्या समाने ॥ ११ ॥ तूष्णीमेकामेकऋचा जुहोति द्वे आहवनीये एकां दक्षिणाग्नौ