१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४२ ] [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् एकां गार्हपत्ये एकां सर्वप्रायश्चित्तीये ॥ १२॥ अथापिधानमस्य मृतत्वायोपस्पृश्य पुनरादाय पुनः स्पृशेत् ॥ १३ ॥ सव्ये पाणा- वापो गृहीत्वा हृदयमन्वालभ्य जपेत्— प्राणोऽग्निः परमात्मा पञ्चवायुभिरावृतः । अभयं सर्वभूतेभ्यो न मे भीतिः कदाचन ॥१४ विश्वोऽसि वैश्वानरो विश्वरूपं त्वया धार्यते जायमानम् । विश्वं त्वाहुतयः सर्वा यत्र ब्रह्माऽमृतोऽसि ॥१५ कनिष्ठिका अँगुली तथा अंगूठे से प्राण में अनामिका से, अपान में मध्यमा से, व्यान में सभी अँगुलियों से, उदान में तर्जनी से, समान में आहुति डाले ( कल्पना करो ) ॥ ११ ॥ मौन होकर एक आहुति 'प्राणाय स्वाहा' इस एक ऋचा से 'अपानाय स्वाहा' ये दो आहुतियाँ आहवनीय में होम करे। एक दक्षिणाग्नि, एक गार्हपत्य तथा एक सर्व प्रायश्चितीय अग्नि में होम करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार पांच आहुतियां करके यथानियम खाकर ( आहुति शेष ) 'अथ पुरस्तात् चोप रिष्टाच्च अद्भिः परिदधाति' इति श्रुति के अनुरोध से— अपिधान स्वरूप को अमृतत्व के लिए छूकर फिर ग्रहण कर पुनः स्पर्श करे ॥ १३ ॥ बाँये हाथ में जल ग्रहण कर हृदयालम्भन कर ( हृदय के पास हाथ रख ) जप करे— मुख्य प्राण ही अग्नि है स्वगत विशेष अंशों की समाप्ति पर वही परमात्मा है विराड् आदि स्थानीय पांच वायुओं के द्वारा आवृत है। मुझे सब प्राणियों से अभय प्रदान करें, मुझे उनसे कभी भय उत्पन्न न हो ॥ १४ ॥ हे मुख्य प्राण ! व्यष्टि ( एक-एक ) समष्टि ( समूह रूप ) के उपाधि भेद से तू ही विश्व ( व्यावहारिक ) वैश्वानर ( विराड् ) होकर विश्व रूप को धारण करता है 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । जिस रूप में कि तू ब्रह्मामृत स्वरूप है, तेरे से