भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवाव है । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषाव है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करें, वह हम दोनों का पालन करें, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। अथातः सर्वोपनिषत्सारं संसारज्ञानातीतमन्नसूक्तं शरीर यज्ञं व्याख्यास्यामो यस्मिन्नेव पुरुषशारीरे विनाऽप्यग्निहोत्रेण विनाऽपि सांख्येन संसारनिवृत्तिर्भवतीति ॥ १ ॥ स्वेन विधिनाऽन्नं भूमौ निक्षिप्य या ओषधयः सोमराज्ञी- रिति तिसृभिरन्नपत इति द्वाभ्यामभिमन्त्रयति ॥ २ ॥ या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः । बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥३ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः । बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥४ जीवला नघारिषां मा ते बध्नाम्योषधीः । यातयायु रुपाहरादप रक्षांसि चातयात् ॥५ अब सब उपनिषदों का सारभूत सांसारिक ज्ञान से अतीत (परे) अन्नसूक्त तथा शरीर यज्ञ की व्याख्या की जाती है। जिस पुरुष शरीर के जान लेने पर बिना ही अग्निहोत्र के, बिना ही सांख्य