भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 572 में से

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२३८ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषद् ब्रह्म द्वारा भक्षित होती है ॥४२॥ इस प्रकार ब्रह्म अपने स्वरूप को स्वयं ही खाता है, क्योंकि भोज्य पदार्थ उससे पृथक नहीं है, वैसे भी यदि वह अस्तित्व रूप है तो भी वह ब्रह्म है, क्योंकि ब्रह्म के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व ही नहीं है ॥४३॥ सत्ता का लक्षण अस्तित्व माना जाता है और सत्ता ब्रह्म से भिन्न नहीं होती । ब्रह्म के सिवाय कोई सत्ता नहीं है, माया से कोई वास्तविक वस्तु नहीं होती ॥ ४४ ॥ योगीजन माया की कल्पना अपनी आत्मा से करते हैं। ब्रह्मज्ञान से बाधित होकर वह [उनको साक्षी रूप भासती है ॥४५॥ इस प्रकार जिस ज्ञानी को ब्रह्मज्ञान का अनुभव हो गया है, वह चाहे जगत को अपने सम्मुख देखता रहे, पर वह उसे अपने से पृथक नहीं मानता ॥४६॥ ॥ पाशुपत ब्रह्म उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

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