१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरकाण्ड ] [ २३७ उसके लिए ही आवश्यक है जिसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है ।।३७।। क्योंकि सम्यक् ज्ञानी का स्वरूप अज्ञानी के समान भेद ज्ञानयुक्त नहीं होता। ज्ञानी यह जानता है कि खाने वाला मैं हूँ और अन्न भी मैं हूँ ॥ ॥३८॥ पर जो ब्रह्मज्ञानी होता है वह सब को ब्रह्ममय देखता है, इसलिये ब्राह्मण क्षत्रिय आदि की भावना ही उसका भोजन हो जाता है ॥ ३६ ॥ मृत्यु जिसका अन्न ( भोजन ) है ऐसे ब्रह्म को जानने वाला भी वैसा ही हो जाता है और यह समस्त जगत उसके लिये भोजन स्वरूप हो जाता है ।।४०।। जगदात्मतया भाति यदा भोज्यं भवेत्तदा । ब्रह्मस्वात्मतया नित्यं भक्षित सकल तदा ।।४१ यदा भानेन रूपेण जगद्भोज्यं भवेत्तु तत् । मानतः स्वात्मना भातं भक्षितं भवति ध्रुवम् ।।४२ स्वस्वरूपं स्वयं भुङ्क्ते नास्ति भोज्यं पृथक् स्वतः। अस्ति चेदस्तितारूपं ब्रह्म वास्तित्वलक्षणम् ।।४३ अस्तितालक्षणा सत्ता सत्ता ब्रह्म न चापरा । नास्ति सत्ताऽतिरेकेण नास्ति माया च वस्तुतः ।।४४ योगिनामात्मनिष्ठानां माया ह्यात्मनि कल्पिता । साक्षिरूपतया भांति ब्रह्मज्ञानेन बाधिता ॥४५ ब्रह्मविज्ञानसंपन्नः प्रतीतमखिलं जगत् । पश्यन्नपि सदा नैव पश्यति स्वात्मनः पृथक् ॥४६ इत्युपनिषत् ॥ जब जगत को आत्मरूप में अनुभव किया जाता है, तो वह भोज्यरूप हो जाता है। आत्मरूप से ब्रह्म सदैव उसे भक्षण करता रहता है ।।४१।। जिसका आभास होने से यह जगत भोजन रूप बन जाता है, जब वह आत्मरूप विदित हो जाता है तो अवश्य ही