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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १६१

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ १६१ नाना प्रकार के विकल्प उत्पन्न होते हैं ? ॥ १४ ॥ कर्म से कर्मों का अस्तित्व है, कर्मत्याग से शान्ति हो जाती है । दक्षिण अयन में आने से उसे प्रपञ्च में लिप्त होना पड़ता है ॥ १५ ॥ अहंकाराभिमानेन जीवः स्याद्धि सदाशिवः । स चाविवेकप्रकृतिसङ्गत्या तत्र मुह्यते ॥१६ नानायोनिशतं गत्वा शेतेऽसौ वासनावशात् । विमोक्षात्संचरत्येव मत्स्यः कूलद्वयं यथा ॥१७ ततः कालवशादेव ह्यात्मज्ञानविवेकतः । उत्तराभिमुखो भूत्वा स्थानात्स्थानान्तरं क्रमात् ॥१८ मूर्ध्न्याधात्मनः प्राणान्योगाभ्यासं स्थितश्चरन् । योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रवर्तते ॥१९ योगज्ञानपरो नित्यं स योगी न प्रणश्यति । विकारस्थं शिवं पश्येद्विकारश्च शिवे न तु ॥२० योगप्रकाशकं योगैर्ध्यायेश्चानन्यभावनः । योगज्ञाने न विद्येते तस्य भावो न सिध्यति ॥२१ अहंकार से युक्त हो जाने के कारण सदाशिव ( परमात्मा ) को जीवकोटि में आना पड़ता है । वहां अविवेक और प्रकृति के संयोग से वह मोहग्रस्त होजाता है ॥ १६ ॥ वासनाओं में फँस कर वह सैकड़ों योनियों में जाता रहता है और मछली के घूमने के समान सर्वत्र भटकता रहता है ॥ १७ ॥ फिर काल प्रभाव से वह विवेक और आत्मज्ञान को प्राप्त होकर उत्तरामुख होकर एक दर्जा से दूसरे दर्जा को प्राप्त होता जाता है ॥ १८ ॥ तब वह अपने प्राणों को मूर्धा में धारण करके योगाभ्यास में प्रवृत्त होता है । योग से ज्ञान और ज्ञान से योग की प्रवृत्ति होती है ॥ १९ ॥ जो योगी सदैव ज्ञान योग में संलग्न रहता है वह

१६२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ शिखिब्राह्मणोपनिषत् नष्ट नहीं होता। वह विकारों में भी सदैव शिव ( ब्रह्मभाव ) के दर्शन करता है। ऐसा विज्ञान-योगी सर्व विकारों से रहित ब्रह्म का अनन्य भाव से ध्यान करे। जिसको इस प्रकार ज्ञानयोग नहीं होता उसको सिद्धि प्राप्त नहीं होती ॥२०--२१॥ तस्मादभ्यासयोगेन मनःप्राणान्निरोधयेत् । योगी निशितधारेण क्षुरेणेव निकृन्तयेत् ॥२२ शिखा प्राणमयी वृत्तिर्माहष्टाङ्गसाधनैः । ज्ञानयोगः कर्मयोग इति योगो द्विधा मतः ॥२३ क्रियायोगमथेदानीं शृणु ब्राह्मणसत्तम । अव्याकुलस्य चित्तस्य बन्धनं विषये क्वचित् ॥२४ इस प्रकार योग के अभ्यास द्वारा प्राणों से मन का निरोध करे मानो छुरी की पैनी धार से उसको काट दे। यम-नियम आदि अष्टांग -योगसाधन से ज्ञानमयी शिखा उत्पन्न होती है। योग की दो श्रेणियां हैं-ज्ञानयोग और कर्मयोग ॥ २२--२३ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! अब क्रिया (कर्म) योग के विषय में बतलाते हैं कि जिसका चित्त व्याकुलता रहित होता है वह विषयों के बन्धन में नहीं पड़ता ॥ २४ ॥ यत्संयोगो द्विजश्रेष्ठ स च द्वैविध्यमश्नुते । कर्म कर्तव्यमित्येव विहितेष्वेव कर्मसु ॥२५ बन्धनं मनसो नित्यं कर्म योगः स उच्यते । यत्तु चित्तस्य सततमर्थे श्रेयसि बन्धनम् ॥२६ ज्ञानयोगः स विज्ञेयः सर्वसिद्धिकरः शिवः । यस्योक्तलक्षणे योगे द्विविधेऽप्यव्ययं मनः ॥२७ स याति परमं श्रेयो मोक्षलक्षणमञ्जसा ।

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६३

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६३ देहेन्द्रियेषु वैराग्यं यम इत्युच्यते बुधैः ॥२८ अनुरक्तिः परे तत्त्वे सततं नियमः स्मृतः । सर्ववस्तुषूदासीनभाव आसनमुत्तमम् ॥२९ जगत्सर्वमिदं मिथ्याप्रतीतिः प्राणसंयमः । चित्तस्यान्तर्मुखीभावः प्रत्याहारस्तु सत्तम ॥३० इसी प्रकार संयोग भी दो प्रकार के होते हैं। शास्त्रानुकूल कर्मों में सदैव मन का निग्रह करते रहना कर्मयोग कहलाता है । चित्त को निरन्तर आत्म-कल्याण में संलग्न रखना ज्ञानयोग है। इससे सब प्रकार की आत्मा सम्बन्धी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इस प्रकार दोनों तरह के योगों का जो निर्विकार भाव से करता है वह बिना बिलम्ब मोक्ष रूपी परम श्रेय को प्राप्त कर लेता है। देह और इन्द्रियों के प्रति सब प्रकार से वैराग्य भावना यम कहलाता है ॥२५--२८॥ और परम तत्व से सदा अनुराग रखना नियम कहा गया है। सब वस्तुओं में उदासीन वृत्ति ही सर्वोत्तम आसन है ॥ २९ ॥ जगत के मिथ्या स्वरूप को भली प्रकार समझ लेना प्राणायाम है। चित्त की अन्तर्मुखी वृत्ति ही प्रत्याहार है ॥ ३० ॥ चित्तस्य निश्चलीभावो धारणा धारणं विदुः । सोऽहं चिन्मात्रमेवेति चिन्तनं ध्यानमुच्यते ॥३१ ध्यानस्य विस्मृतिः सम्यक्समाधिरभिधीयते । अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य्यँद्दताऽऽर्जवम् ॥३२ क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश । तपस्सन्तुष्टिरास्तिक्यं दानमाराधनं हरेः ॥३३ वेदान्तश्रवणञ्चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ।

१६४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्

१६४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् आसनानि तदङ्गानि स्वस्तिकादीनि वै द्विज ॥३४ वर्ण्यते स्वस्तिकं पादतलयोरुभयोरपि । पूर्वोत्तरे जानुनी द्वे कृत्वाऽऽसनमुदीरितम् ॥३५ चित्त को निश्चल बना लेना धारणा है और मैं चिन्मात्र रूप हूँ-- यह भावना ध्यान है ॥ ३१ ॥ ध्यान का भी पूर्णतः विस्मरण कर देना समाधि है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव ( सरलता ), क्षमा, धैर्य, मिताहार और शुद्धता---ये दस नियम हैं । तप, संतोष, आस्तिकता, दान, भगवत्-आराधन, वेदान्त-श्रवण, ह्री और जप को व्रत कहा जाता है । अब स्वस्तिक आदि आसन और उनकी विधि को बतलाते हैं ॥३२--३४॥ दोनों पैरों के तलुओं को दोनों घुटनों के बीच में करके बैठना स्वास्तिक आसन है ॥३५॥ सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठापार्श्वे नियोजयेत् । दक्षिणोऽपि तथा सव्यं गोमुगं गोमुखं यथा ॥३६ एकं चरणमन्यस्मिन्नूरावारोप्य निश्चलः । आस्ते यदिमेनोघ्नं वीरासनमुदीरितम् ॥३७ गुदं नियम्य गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमेण समाहितः । योगासनं भवेदेतदिति योगविदो विदुः ॥३८ ऊर्वोरुपरि वै धत्ते यदा पादतले उभे । पद्मासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविषापहम् ॥३९ पद्मासनं सुसंस्थाप्य तदंगुष्ठद्वयं पुनः । व्युत्क्रमेणैव हस्ताभ्यां बद्धपद्मासनं भवेत् ॥४० पीठ के बांई ओर दाहिने गुल्फ को और दांयी और बांयें गुल्फ को लगाने से जो गौ के मुख की तरह होता है, वही गोमुख आसन होता है ॥ ३६ ॥ एक चरण को बांयी जांघ पर और दूसरे को दाहिनी जांघ पर रखने से वीरासन होता है ॥ ३७ ॥ दाहिनी

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् ] [ १६५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् ] [ १६५

ऐड़ी को गुदा के बांयी तरफ ओर बांयी ऐड़ी को गुदा के दाहिनी तरफ लगाकर बैठे तो वह योगासन कहा जाता है ॥ ३८ ॥ दोनों जांघों पर दोनों पैर के तलवों को रखकर बैठने से पद्मासन होता है जो सब व्याधियों और विषों का नाशक बतलाया गया है ॥ ३९ ॥ पद्मासन पर अच्छी तरह से बैठकर दाहिने हाथ से बांए पैर के अंगूठे को और बाँयें हाथ से दाहिने पैर के अंगूठे को पकड़ना बद्ध-पद्मासन कहलाता है ॥ ४० ॥

पद्मासनं सुसंस्थाप्य जानूर्वोरन्तरे करौ । निवेश्य भूमावातिष्ठेद्ब्योमस्थः कुक्कुटासनः ॥४१ कुक्कूटासनबन्धस्थो दोभ्यां संवध्य कन्धरम् । शेते कूर्मवदुत्तान एतदुत्तानकूर्मकम् ॥४२ पादांगुष्ठौ तु पाणिभ्यां गृहीत्वा श्रवणावधि । धनुराकर्षकाकृष्टं धनुरासनमीरितम् ॥४३ सीवनीं गुल्फदेशेभ्यो निपीड्य व्युत्क्रमेण तु । प्रसार्य जानुनोर्हस्तावासनं सिंहरूपकम् ॥४४ गुल्फौ च वृषणस्याधः सीविन्युभयपार्श्वयोः । निवेश्य भूमौ हस्ताभ्यां बद्धवा भद्रासनं भवेत् ॥४५

पद्मासन पर अच्छी तरह बैठकर दोनों हाथों को जानु और जंघाओं के बीच से निकाल कर भूमि पर लगाकर शरीर को आकाश में अधर स्थित रखने से कुक्कुट-आसन होता है ॥ ४१ ॥ कुक्कुट आसन लगाकर दोनों भुजाओं से दोनों कंधों को बांधकर कछुए के समान सीधा हो जाना उत्तान-कूर्मासन कहा जाता है ॥ ४२ ॥ दोनों पैरों के अंगूठों को पकड़ कर धनुष के आकार में कानों तक खींचे तो यह धनुराशन होता है ॥ ४३ ॥ दोनों एड़ियों से सींवन- स्थान को विपरीत विधि से दबाकर दोनों घुटनों तथा हाथों को फैला-

१६६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१६६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् कर स्थित होने को सिंहासन कहते हैं ॥ ४४ ॥ सींवन के दोनों तरफ दोनों एड़ियों को रखकर हाथ पैर को नांघकर बैठने से भद्रासन होता है ॥ ४५ ॥ सीवनीपार्श्वमुभयं गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमेण तु । निपीड्यासनमेतच्च मुक्तासनमुदीरितम् ॥४६ अवष्टभ्य धरां सम्यक्तलाभ्यां हस्तयोर्द्वयोः । कूर्परौ नाभिपाश्र्वे तु स्थापयित्वा मयूरवत् ॥४७ सामुन्नतशिरः पादो मयूरासनमिष्यते । वामोरूमूले दक्षांघ्रि जान्वोर्वेष्टितपाणिना ॥४८ वामेन वामांगुष्ठं तु गृहीतं मत्स्यपीठकम् । योनिं वामेन संपीड्य मेढ्रादुपरि दक्षिणम् ॥४९ ऋजुकायः समासीनः सिद्धासनमुदीरितम् । प्रसार्यं भुवि पादौ तु दोर्भ्यामंगुष्ठमादरात् ॥५० जानूपरि ललाटं तु पश्चिमं ताणमुच्यते । येन केन प्रकारेण सुखं धार्यं च जायते ॥५१ तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाचरेत् । आसनं विजितं येन जितं तेन जगत्त्रयम् ॥५२ सींवन के दोनों पाश्र्वों को दोनों एड़ियों से विपरीत रीति से दबाकर बैठने से मुक्तासन होता है ॥ ४६ ॥ दोनों हथेलियों को भूमि पर स्थापित करके दोनों कोहनियों को नाभि के दोनों तरफ लगावे, फिर मोर की तरह सब शरीर को अधर करके सिर और पैरों को ऊपर की तरफ उठाये रहने से मयूरासन होता है । बाँई जाँघ की जड़ में दाहिने पैर को रखे और फिर बाँये घुटने का हाथ से लपेटकर उसी पैर के अंगूठे को पकड़े तो यह मत्स्येन्द्र आसन होता हैं। बाँये पैर की ऐड़ी को सींवन पर लगाये और दाहिने पैर को

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् । [ १६७

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् । [ १६७ उपस्थ के ऊपर रखे, इस प्रकार सीधा शरीर करके बैठने को सिद्धासन कहते हैं । दोनों पैरों को जमीन पर फैलाकर दोनों हाथों से पैर के अँगूठों को पकड़ ले और फिर सिर को घुटनों पर लगावे, यह पश्चिमोत्तान आसन होता है । जिस प्रकार बैठने से सुख और स्थिरता प्राप्त हो, उसी प्रकार बैठने को सुखासन कहते हैं । जो व्यक्ति असमर्थता के कारण अन्य आसनों को न लगा सके, वह इसको लगावे । जिसने आसन को जीत लिया उसने तीनों लोकों को जीत लिया ॥४६-५२॥ यमैश्च नियमैश्चैव ह्यासनेश्च सुसंयतः । नाडीशुद्धिं च कृत्वाऽऽदौ प्राणायामं समाचरेत् ॥५३॥ देहमानं स्वांगुलिभिः षण्णवत्यंगुलायतम् । प्राणः शरीरादधिको द्वादशांगुलमानतः ॥५४ देहस्यमनिलं देहसमुद्भू तेन वह्निना । न्यूनं समं वा योगेन कुर्वन्ब्रह्मविदिष्यते ॥५५ देहमध्ये शिखिस्थानं तप्तजाम्बूनदप्रभम् । त्रिकोणं द्विपदामन्यच्चतुरश्रं चतुष्पदाम् ॥५६ वृत्तं विहङ्गमानां तु षडश्रं सर्पजन्मनाम् । अष्टाश्रं स्वेदजानां तु तस्मिन्दीपवदुज्ज्वलम् ॥ कन्दस्थानं मनुष्याणां देहमध्यं नवांगुलम् । चतुरंगुलमुत्सेधं चतुरंगुलमायतम् ॥५७ अण्डाकृति तिरश्चां च द्विजानां च चतुष्पदाम् । तुन्दमध्यं तदिष्टं वै तन्मध्यं नाभिरिष्यते ॥५८ तत्र चक्रं द्वादशारं तेषु विष्ण्वादिमूर्तयः । अहं तत्र स्थितश्चक्रं भ्रामयामि स्वमायया ॥५९ अरेषु भ्रमते जीवः क्रमेण द्विजसत्तमः । समथा भ्रमति लतिका ॥६०

१६८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१६८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् यम, नियम और आसन द्वारा भली प्रकार नाड़ी-शोधन करके प्राणायाम करे ॥५३॥ मानव-देह का प्रमाण अपनी अँगुलियों से छियानवे अँगुल का है। शरीर से प्राण बाहर अँगुल अधिक प्रमाण वाला होता है ॥५४॥ देह में स्थित वायु को देहस्थ अग्नि के योग द्वारा न्यून और सम करने से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जाता है ॥५५॥ मानव देह के मध्य में तप्त सुवर्ण की प्रभा वाला तीन कोणयुक्त अग्नि का स्थान होता है। चार पैर वाले पशुओं में यह अग्नि स्थान चार कोने का होता है। पक्षियों का गोल, सर्प जाति वालों का छः कोने और स्वेदजों का आठ कोने वाला होता है। मानव-देह में उस स्थान पर नौ अँगुल प्रमाण का एक कन्द रहता है जो दीपक के समान प्रकाशित होता है। वह चार अँगुल ऊँचा और चार अँगुल चौड़ा होता है ॥५६-५६॥ तिर्यक, पक्षी और चौपायों में यह कन्द आण्डाकार होता है और उसका मध्यस्थान नाभि कहा जाता है इसमें बारह आरे वाला चक्र है जिसमें विष्णु आदि देवों की मूर्तियां हैं। इस चक्र को मैं (ब्रह्म) अपनी माया से फिराता रहता हूँ ॥५६॥ इन बारह आरों में जीव इस प्रकार घूमता रहता है जैसे मकड़ी अपने जाले में फिरती है ॥६०॥ प्राणाधिरूढश्चरति जीवस्तेन विना नहि। तस्योर्ध्वे कुण्डलीस्थानं नाभेस्तिर्यगथोर्ध्वतः ॥६१ अष्टप्रकृतिरूपा सा चाष्टधा कुण्डलीकृता। यथावद्वायु संचारं जलान्नादि च नित्यशः ॥६२ परितः कन्दपार्श्वे तु निरुद्ध्येव सदा स्थिता। मुखेनैव समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रमुखं यथा ॥६३ योग कालेनेन मरुता साग्निना बोधिता सती

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६६

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६६ स्फुरिता हृदयाकाशे नागरूपा महोज्ज्वला ॥६४ अपानाद्द्व्यङ्गुलादूर्ध्वमधो मेद्रस्य तावता । देहमध्यं मनुष्याणां हृन्मध्यं तु चतुष्पदाम् ॥६५ जीव प्राण पर आरूढ़ होकर ही भ्रमण करता है, उसके बिना नहीं कर सकता। उसके ऊपर कुण्डलिनी का तिरछा और ऊंचा स्थान है ॥६१॥ वह अष्ट प्रकृतिरूपा आठ प्रकार की कुण्डली करके कन्द को घेरे हुए है और वायु तथा अन्न-जल के सञ्चार को रोकती रहती है। उसने ब्रह्मरन्ध्र के मुख को अपने मुख से ढका हुआ है ॥६२- ॥६३॥ योगाभ्यास द्वारा यह कुण्डलिनी शक्ति पवन द्वारा जागृत अग्नि के समान हृदयाकाश में नाग रूप से अत्यन्त उज्ज्वल स्फुरित होती है ॥६४॥ अपान से दो अँगुल ऊपर और मेढ़ से नीचे, मानव-देह का मध्य भाग माना जाता है। चौपायों का मध्य भाग उनके हृदय- स्थान में होता है ॥६५॥ इतरेषां तुन्द मध्यं नानानाड़ीसमावृतम् । चतुष्प्रकारद्रव्ययुते देहमध्ये सुषुम्नया ॥६६ कन्दमध्ये स्थिता नाडी सुषुम्ना सुप्रतिष्ठिता । पद्मसूत्रप्रतीकाशा ऋजुरूर्ध्वप्रवर्तिनी ॥६७ ब्रह्मणो विवरं यावद्विद्युदाभासनालकम् । वैष्णवी ब्रह्मनाडी च निर्वाणप्रप्तिपद्धतिः ॥६८ इडा च पिङ्गला चैव तस्याः सव्येतरे स्थिते । इडा समुत्थिता कन्दान्द्वामनासापुटावधिः ॥६९ पिङ्गला चोत्थिता तस्माद्दक्षनासापुटाविधिः । गन्धारी हस्तिजिह्वा च द्वे चान्ये नाडिके स्थिते ॥७० पुरतः पृष्ठतस्तस्याः वामेतरदृशौ प्रति । पूषायशस्विनौनाड्यौ तस्मादेव समुत्थिते ॥७१

२०० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् सव्येतरश्रुत्यवधि पायु मूलावम्बुसा । अधोगता शुभा नाडी मेढ्रान्तावधिरायता ॥७२ अन्य प्राणियों का मध्य भाग नाभि के मध्य में होता है। प्राण और अपान से संयुक्त सुषुम्ना नाड़ी देह में चार प्रकार से प्रकाशित होती है ॥६६॥ कन्द के मध्य भाग में जो सुषुम्ना-नाड़ी स्थित है, वह पद्मसूत्र के समान अत्यन्त सूक्ष्म है और सीधी ऊपर की तरफ गई है॥६७॥ ब्रह्मरन्ध्र तक जाने वाली यह "वैष्णवी ब्रह्मनाड़ी" विद्युत के समान प्रकाशयुक्त और निर्वाण प्राप्त करने वाली है ॥६८॥ उसके अगल-बगल में इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ स्थित हैं। इड़ा कन्द से निकलकर बांये नासापुट तक गई है और पिङ्गला दांये नासापुट तक। गान्धारी और हस्तजिह्वा दो अन्य नाड़ियां भी वहां हैं जो उनके आगे-पीछे बांयी और दांयी आंख तक गई हैं। पूषा और यशस्विनी दो नाड़ियां गुदा मूल से निकलकर दांये और बांये कान तक गई हैं। अलम्बुसा नाम की नाड़ी मेढ़ स्थान के अन्त तक नीचे की ओर गई हैं ॥६६—७२॥ पादांगुष्ठावधिः कन्दादधोयाता च कौशिकी । दशप्रकारभूतास्ताः कथिताः कन्दसंभवाः ॥७३ तन्मूला बहवो नाड्यः स्थूलाः सूक्ष्माश्च नाडिकाः । द्वासप्ततिसहस्राणि स्थूलाः सूक्ष्मश्च नाड्यः ॥७४ संख्यातुं नैव शक्यन्ते स्थूलमूलाः पृथग्विधाः । यथाऽश्वत्थदले सूक्ष्माः स्थूलाश्च विततास्तथा ॥७५ प्राणापानौ समानश्च उदानो व्यान एव च । नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥७६ चरन्ति दशनाडीषु दश प्राणादिवायवः । प्राणादिपञ्चकं तेषु प्रधानं तत्र च द्वयम् ॥७७

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०१

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०१ प्राण एवाथवा ज्येष्ठो जीवात्मानं विभर्ति यः । आस्यनासिकयोर्मध्यं हृदयं नाभिमण्डलम् ॥७८ पादांगुष्ठमिति प्राणस्थानानि द्विजसत्तम । अपानश्चरति ब्रह्मन् गुदमेढ्रोरुजानुषु ॥७९ समानः सर्वगात्रेषु सर्वव्यापी व्यवस्थितः । उदानः सर्वसन्धिस्थः पादयोर्हस्तयोरपि ॥८० कन्द से पैर के अंगूठे तक कौशिकी नाम वाली नाड़ी गई है । इस प्रकार ये दस नाड़ियाँ कन्द से निकली हुई कही गई हैं ॥ ७३ ॥ उनसे निकलने वाली अन्य बहुत सी स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जिनकी संख्या सब मिलाकर बहत्तर हजार कही गई है ॥ ७४ ॥ इन स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियों की गिनती कर सकना कठिन है, वे उसी प्रकार फैली हुई हैं जिस प्रकार पीपल के पत्ते में नसें फैली होती हैं ॥ ७५ ॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनञ्जय—ये दश वायु भी नाड़ियों में चलते रहते हैं । इनमें प्राण आदि प्रथम पाँच मुख्य हैं, अथवा दो (प्राण और अपान) मुख्य हैं अथवा प्राणवायु ही सबसे मुख्य है जो जीव को धारण किये रहता है । हे द्विज श्रेष्ठ ! प्राण के मुख्य स्थान पाँच हैं-मुख नासिका का मध्य भाग, हृदय, नाभि-मण्डल और पैर का अँगूठा अपान, गुदा, मेढ्र, जङ्घा, और घुटने में चलता है । समान वायु सब अङ्गों में व्याप्त रहता है और उदान चारों हाथ पैरों और सब संधि स्थानों में स्थित है ॥७६-८०॥ व्यानः श्रोत्रोरुकट्यां च गुल्फस्कन्धगलेषु च । नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिषु संस्थिताः ॥८१ तुन्दस्थं जलमन्नं च रसादि च समीकृतम् । तुन्दमध्यगतः प्राणस्तानि कुर्यात्पृथक्पृथक् ॥८२

२०२ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०२ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् इत्यादिश्चेष्टनं प्राणः करोति च पृथक्स्थितः । अपानवायुर्मूत्रादेः करोति च विसर्जनम् ॥८३ प्राणापानादिचेष्टादि क्रियते व्यानवायुना । उज्जीर्यंते शरीरस्थमुदानेन नभस्वता ॥८४ पोषणादि शरीरस्य समानः कुरुते सदा । उद्गारादिक्रियो नागः कूर्मोक्ष्यादिनिमीलनः ॥८५ व्यान नामक वायु श्रोत्र, जङ्घा कमर एड़ी, कन्धे, गले में रहता है तथा नाग आदि पाँच उपवायु त्वचा, अस्थि आदि में स्थित हैं ॥ ८१ ॥ आमाशय में स्थित जल, अन्न रसादिक को प्राणवायु एकत्र करके फिर पृथक् पृथक करता है ॥ ८२ ॥ इन कार्यों को प्राणवायु पृथक रह कर करता है । मल और मूत्र के विसर्जन का कार्य अपान-वायु द्वारा होता है ॥ ८३ ॥ प्राण, अपान वायुओं की चेष्टाएं व्यान वायु के योग से की जाती हैं और शरीरस्थ उदान से ऊर्ध्वगामी हुआ जाता है ॥ ८४ ॥ शरीर को पोषण सदैव समान वायु द्वारा होता है । डकार आदि क्रिया नाग से होती है और आंखों का खोलना बन्द करना कूर्म का कार्य है ॥ ८५ ॥ कृकरः क्षपयोः कर्ता दत्तो निद्रादिकर्मकृत् । मृतगात्रस्य शोभादि धनंजय उदाहृतः ॥८६ नाडीभेदं मरुद्भेदं मरुतां स्थानमेव च । चेष्टाश्च विविधास्तेषां ज्ञात्वैवं द्विजसत्तम ॥८७ शुद्धौ यतेत नाडीनां पूर्वोक्तज्ञानसंयुतः । विविक्तदेशमास्थाय सर्व संबन्धवर्जितः ॥८८ योगाङ्गद्रव्यसंपूर्णं तत्र दारुमये शुभे । आसने कल्पिते दर्भकुशकृष्णाजिनादिभिः ॥८९

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०३ ]

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०३ ] तावदासनमुत्सेधे तावद्द्वयसमायते । उपविश्यासनं सम्यक्स्वस्तिकादि यथारुचि ॥६० भूख लगना कृकर का, निद्रा आदि देवदत्त का और मृत शरीर की शोभा आदि धनञ्जय वायु का कार्य है ॥ ८६ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! नाड़ी, वायु, प्राणों के स्थान और चेष्टाएँ विविध प्रकार की हैं, उनको जानना चाहिये ॥ ८७ ॥ जब पूर्वोक्त विधि से नाड़ियों को शुद्ध कर ले तब सब प्रकार के सम्बन्धों को त्याग कर एकान्त स्थान में, सब प्रकार की योग-साधन में आवश्यक सामग्री लेकर लकड़ी की बनी कुटी में दर्भ, कुशा और मृग चर्म का आसन प्रस्तुत करे ॥ ८८--८९ ॥ जब तक दोनों तरफ के अङ्ग समान न हो जांय तब तक आसन-साधन करता रहे । इसके लिए आसन स्थान पर बैठकर अपनी रुचि के अनुसार स्वास्तिक आदि कोई-सा भी आसन लगाता रहे ॥ ९० ॥ बद्ध्वा प्रागासनं विप्र ऋजुकायः समाहितः । नासाग्रन्यस्तनयनो दन्तैर्दन्तानस्पृशन् ॥९१ रसनां तालुनि न्यस्य स्वस्थचित्तो निरामयः । आकुञ्चितशिरः किञ्चिन्निबध्नन्योगमुद्रया ॥९२ हस्तौ यथोक्तविधिना प्राणायामं समाचरेत् । रेचनं पूरणं वायो शोधनं रेचनं तथा ॥९३ चतुर्भिः क्लेशनं वायोः प्राणायाम उदीर्यते । हस्तेन दक्षिणेनैव पीडयेन्नासिकापुटम् ॥९४ शनैः शनैरथ बहिः प्रक्षिपेत्पिङ्ग़लानिलम् । इडया वायुमापूर्य ब्रह्मान्धोशमानया ॥६५ पूरितं कुम्भयेत्तस्माच्चतुःषष्ट्या तु मात्रया ।

२०४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् द्वात्रिंशन्मात्रया सम्यग्रे चयेत्पिङ्गलाऽनिलम् ॥६६ पहले आसन लगाकर, शरीर को सीधा रखकर, नासाग्र पर दृष्टि रखते, दाँतों को दांतों से स्पर्श न करते हुये, जिह्वा को तालु में रखकर, स्वस्थ चित्त और निरागम भावसे, शिर को आंकुचित करके, योगमुद्रा में हाथों को बाँधकर विधिपूर्वक प्राणायाम करे। रेचक, पूरक, वायु का शोधन तथा रेचक करे ॥ ६१--६३ ॥ इन चार विधियों से वायु को चलाने को प्राणायाम कहते हैं। दाहिने हाथ से नासापुटों को दबाकर पिङ्गला ( दाँयी नासिका ) से वायु को बाहर निकाले । फिर सोलह मात्रा से वायु को भीतर खींचे और चौंसठ मात्रा में कुम्भक करे और बत्तीस मात्रा से उस वायु को पिंगला द्वारा बाहर निकाल दे ॥ ६६ ॥ एवं पुनः पुनः कार्यं व्युत्क्रमानुक्रमेण तु । संपूर्णकुम्भवद्देहं कुम्भयेन्मातरिश्वना ॥६७ पूरणान्नाडयः सर्वाः पूर्यन्ते मातरिश्वना । एवं कृते सति ब्रह्मंश्चरन्ति दश वायवः ॥६८ हृदयाम्भोरुहं चापि व्याकोचं भवति स्फुटम् । तत्र पश्येत्परात्मानं वासुदेवमकल्मषम् ॥६६ प्रातर्मध्यन्दिने सायमर्धरात्रे च कुम्भकान् । शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥१०० इस प्रकार बारम्बार क्रम और विपरीत क्रम से अभ्यास करे और देह के भीतर भरे वायु को कुम्भ के समान रोके ॥ ६७ ॥ इससे सब नाड़ियाँ वायु से भर जाती हैं और उनमें दसों वायु भली प्रकार चलने लगते हैं ॥ ६८ ॥ तब हृदयरूपी कमल विकसित होकर स्पष्ट हो जाता है और वहाँ भगवान् वासुदेव के दर्शन होने लगते हैं

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०५ ॥ ९९ ॥ इस विधि से प्रातः मध्याह्न, सायं और आधीरात को चार बार कुम्भक करे और उसे क्रमशः अस्सी मात्रा तक पहुंचा दे ॥ १०० ॥ एकाहमात्रं कुर्वाणः सर्वपापैः प्रमुच्यते । संवत्सरत्रयादूर्ध्वं प्राणायामपरो नरः ॥१०१ योगसिद्धो भवेद्योगी वायुजिद्विजितेन्द्रियः । अल्पाशी स्वल्पनिद्रश्च तेजस्वी बलवान्भवेत् ॥१०२ अपमृत्युमपक्रम्य दीर्घमायुरवाप्नुयात् । प्रस्वेदजननं यस्य प्राणायामेषु सोऽधमः ॥१०३ कम्पनं वपुषो यस्य प्राणायामेषु मध्यमः । उत्थानं वपुषो यस्य स उत्तम उदाहृतः ॥१०४ अधमे व्याधिपापानां नाशः स्यान्मध्यमे पुनः । पापरोगमहाव्याधिनाशः स्यादुत्तमे पुनः ॥१०५ अल्पमूत्रोऽल्पविष्ठश्च लघुदेहो मिताशनः । पट्विन्द्रियः पटुमतिः कालत्रयविदात्मवान् ॥१०६ इस विधि से एक दिन अभ्यास करने से ही सब पापों से छुटकारा हो जाता है और तीन वर्ष तक इस प्रकार प्राणायाम करने वाला योग सिद्ध हो जाता है। वह योगी वायु को जीतने वाला, जितेन्द्रिय, अल्प आहार, स्वल्प निद्रा वाला, तेजस्वी तथा बलवान होता है। अकाल मृत्यु का भय मिटाकर दीर्घ आयु प्राप्त होती है। जिस प्राणायाम में पसीना आता है वह अधम है, जिसमें शरीर में कँपकँपी होती है वह मध्यम है और जिसमें शरीर ऊपर को उठता है वह उत्तम है ॥ १०१--१०४ ॥ अधम प्राणायाम से व्याधि और पापों का नाश होता है, मध्यम से महाव्याधियां, पाप तथा रोग मिट जाते हैं, उत्तम से अल्प-मूत्र, अल्प-मल शरीर की लघुता

२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् अल्प भोजन होता है, इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं और तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है ॥ १०५-१०६ ॥ रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भोकरणमेव यः । करोति त्रिषु कालेषु नैव तस्यास्ति दुर्लभम् ॥१०७ नाभिकन्दे च नासाग्रे पादांगुष्ठे च यत्नवान् । धारयेन्मनसा प्राणान्सन्ध्याकालेषु वा सदा ॥१०८ सर्वरोगैर्विनिमुक्तो जीवेद्योगी गतक्लमः । कुक्षिरोगविनाशः स्यान्नाभिकन्देषु धारणात् ॥१०६ नासाग्रधारणाद्दीर्घमायुः स्याद्देहलाघवः । ब्राह्मे मुहूर्ते संप्राप्ते वायुमाकृष्य जिह्वया ॥११० पिवतस्त्रिषु मासेषु वाक्सिद्धिर्महती भवेत् । अभ्यस्यतुश्च षण्मासान्महारोगविनाशनम् ॥१११ जो रेचक और पूरक को छोड़कर केवल कुम्भक ही करने लगता है । उसके लिए तीनों काल में कुछ भी कठिन नहीं रहता ॥ १०७ ॥ प्रयत्नशील साधक नाभिकन्द, नासाग्र और पैर के अंगूठे में सदैव संध्या समय मन द्वारा प्राण को धारण करे ॥ १०८ ॥ ऐसा साधक सब रोगों से छूटकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है । नाभिकन्द में प्राण-धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं ॥ १०६ ॥ नासग्र धारण करने से दीर्घायु और देह की लाघवता प्राप्त होती है । ब्राह्म मुहूर्त में जिह्वा से वायु को खींच कर पीने से तीन मास में वाक्य-सिद्धि प्राप्त होती है और छः मास में महारोग से छुटकारा मिल जाता है ॥ ११०-१११ ॥ यत्रयत्र धृतो वायुरङ्गे रोगादिदूषिते । धारणादेव मरुत्तत्तदारोग्यमंश्नुते ॥११२

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०७.

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०७. मनसो धारणादेव पवनो धारितो भवेत् । मनसः स्थापने हेतुरुच्यते द्विजपुङ्गव ॥११३ कारणानि समाहृत्य विषयेभ्यः समाहितः । अपानमूर्ध्वमाकृष्येदुदरोपरि धारयेत् ॥११४ बध्नन्कराभ्यां श्रोत्रादिकरणानि यथातथम् । युञ्जानस्य यथोक्तेन वर्त्मना स्ववशं मनः ॥११५ शरीर का जो अङ्ग रोग पीड़ित हो तो उसमें वायु को धारण करने से वह दूर हो जाता है ॥ ११२ ॥ मन की धारणा हो जाने से वायु की धारणा भी होने लगती है। मन को स्थित करने के लिये प्राण को साधन बतलाया गया है ॥ ११३ ॥ इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपान वायु को ऊपर खींचकर ऊपर ही धारण करे, कानों को हाथों से बन्द किये रहे। इस साधन से मन वश में हो जाता है ॥ ११४-११५ ॥ मनोवशात्प्राणवायुः स्ववशे स्थाप्यते सदा । नासिकापुटयोः प्राणः पर्यायेण प्रवर्तते ॥११६ तिस्रश्च नाडिकास्तासु म यावन्तश्चरत्ययम् । शङ्खिनीविवरे याम्ये प्राणः प्राणभृतां सताम् ॥११७ तावन्तं च पुनः कालं सौम्ये चरित संततम् । इत्थं क्रमेण चरता वायुना वायुजिन्नरः ॥११८ अहश्च रात्रि पक्षं च मासं मत्वायनादिकम् । अन्तर्मुखो विजानीयात् कालभेदं समाहितः ॥११९ अङ्गुष्ठादिस्ववावयवास्फुरणदर्शनैरपि । अरिष्टं जीवितस्यापि जानीयात्क्षयमात्मनः ॥१२० इस प्रकार मन पर अधिकार हो जाने से प्राणवायु नियमित-

२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् हो जाता है और नासिका से क्रमपूर्वक आता जाता रहता है ॥ ११६ ॥ तीन नाड़ियाँ हैं। प्राणायाम करने वाले योगियों का श्वास दांये और बाँये नासापुट के समान समय तक चलता रहता है। इस प्रकार जिसका प्राणवायु क्रम से चलता है, वह प्राणजित हो जाता है। फिर वह दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन आदि के काल-भेद को अन्तर्मुख होकर जानने लगता है ॥ ११७--११९ ॥ अँगूठा आदि अपने अवयवों में स्फुरण ( नदियों का रक्त गति से फड़कना ) बन्द हो जाने पर शीघ्र ही अपने जीवन का अन्त होना समझ लेना चाहिये ॥ १२० ॥ ज्ञात्वा यतेत कैवल्यप्राप्तये योगवित्तमः । पादांगुष्ठे करांगुष्ठे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२१ तस्य संवत्सरादूर्ध्वं जीवितव्यक्षयो भवेत् । मणिबन्धे तथा गुल्फे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२२ षष्मासावधिरेतस्य जीवितस्य स्थितिर्भवेत् । कूर्परास्फुरणं यस्य तस्य त्रैमासिकी स्थितिः ॥१२३ कक्षे मेहनपार्श्वे च स्फुरणानुपलम्भने । मासावधिजीवितं स्यात् तदर्धं सत्वदर्शने ॥१२४ आश्रिते जठरे द्वारे दिनानि दश जीवितम् । ज्योतिः खद्योतवद्यस्थ तदर्धं तस्य जीवितम् ॥१२५ इस प्रकार अनिष्ट सूचक संकेतों को जानकर योगी को मोक्ष-साधन में ध्यान लगाना चाहिए। जिसके पैर तथा हाथ के अँगूठों में स्फुरण न जान पड़े। उसका जीवन एक वर्ष में समाप्त हो जाता है। मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (टखना) का स्फुरण बन्द हो जाने पर छः महीने तक जीवित रहता है। जब कोहनी में स्फुरण न हो तो जीवन की अवधि तीन मास रह जाती है

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ Public Domain. Digitization by eGangotri ] २०९ ॥ १२१-१२२ ॥ अगर कुक्षि, उपस्थेन्द्रिय में स्फुरण न हो तो एक महीने में और नेत्रों में स्फुरण न हो तो पन्द्रह दिन में जीवन का अन्त हो जाता है ॥ १२४ ॥ जठर-द्वार पर स्फुरण न होने से जीवन की अवधि दस दिन रह जाती है और अगर ज्योति जुगनू के समान हो जाय तो पाँच ही दिन शेष रह जाते हैं ॥ १२५ ॥ जिह्वाग्रादर्शने त्रीणि दिनानि स्थितिरात्मनः । ज्वालाया दर्शने मृत्युर्द्विदिने भवति ध्रुवम् ॥१२६ एवमादीन्वरिष्टानि दृष्ट्वाऽऽयुःक्षरकारणम् । निःश्रेयसाय युञ्जीत जपध्यानपरायणः ॥१२७ मनसा परमात्मानं ध्यात्वा तद्रूपतामियात् । यद्यष्टादशमेदेषु मर्मस्थानेषु धारणम् ॥१२८ स्थानात्स्थानं समाकृष्य प्रत्याहारः स उच्यते । पादांगुष्ठं तथा गुल्फं जङ्घामध्यं तथैव च ॥१२९ मध्यमूर्वोश्च मूलं च पयायुर्हृदयमेव च । मेहनं देहमध्यं च नाभिं च गलकूर्परम् ॥१३० तालुमूलं च मूलं च घ्राणस्याक्षणोश्च मण्डलम् । भ्रुवोर्मध्यं ललाटं मूलमूर्ध्वं च जानुनी ॥१३१ मूलं च करयोर्मूलं महाम्येतानि वै द्विजः । पञ्चभूतमये देहे भूतेष्वेतेषु पञ्चसु ॥१३२ अगर जिह्वा दिखलाई पड़ना बन्द हो जाय तो तीन दिन का समय समझना चाहिये और ज्वाला का दिखाई देना बन्द हो जाय तो दो ही दिन समझना चाहिये ॥ १२६ ॥ ये सब अरिष्ट आयु के क्षय के कारण रूप हैं । इनको जानकर अपने कल्याणार्थ जप और ध्यान में संलग्न हो ॥ १२७ ॥ मन से परमात्मा का ध्यान करते हुये उसकी एकरूपता को प्राप्त होने का यत्न करे । शरीर के अठारह मर्म स्थानों में धारणा की जाती है ॥१२८॥ एक स्थान से दूसरे स्थान Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् को खींचना प्रत्याहार कहा जाता है। पैर का अँगूठा, एड़ी जांघ का मध्यभाग उरु का मध्य, गुदा का मूल, हृदय, उपस्थ, देह का मध्य, नाभि, कण्ठ, कोहनी, तालु-मूल, नासिका का मूल, आंखों का मण्डल भौंहों का मध्य, ललाट, मस्तक का मूल, घुटने का मूल, हाथों का मूल स्थान—ये सब इस पञ्चभौतिक देह के मर्म स्थल हैं ॥ १२६--१३२ ॥ मनसो धारणं यत्तुयुक्तस्य च यमादिभिः । धारणा सा च संसारसागरोत्तारकारणम् ॥१३३ आजानुपदपर्यन्तं पृथिवीस्थानमिष्यते । पीतला चतुरस्त्रा च वसुधा वज्रलाञ्छिता ॥१३४ स्मर्त्तव्या पञ्चघटिका तत्रारोप्य प्रभञ्जनम् । आजानुकटिपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम् ॥१३५ अर्धचन्द्रसमाकारं श्वेतमजुंनलाञ्छितम् । स्मर्त्तव्यमम्भः श्वसनमारोप्य दशनाडिका ॥१३६ आदेहमध्यकट्यन्तमग्निस्यानमुदाहृतम् । तत्र सिन्दूरवर्णोऽग्निर्ज्वलनं दश पञ्च च ॥१३७ स्मर्त्तव्या घटिका प्राणं कृत्या कुम्भे तथेरितम् । नाभेरुपरि नासान्तं वायुस्थानं तु तत्र वै ॥१३८ वेदिकाकारबद्ध श्रो बलवान्भूतमारुतः । स्मर्तव्यः कुम्भकेनैव प्राणमारोप्य मारुतम् ॥१३९ घटिकाविंशतिस्तस्माद् घ्राणाद्ब्रह्मबिलावधि । व्योमस्थानं नभस्तत्र भिन्नाञ्जनसमप्रभम् ॥१४० यमादि द्वारा मन का जो धारण करना है वही धारणा है जिससे मनुष्य संसार-सागर को पार करने में समर्थ होता है ॥१३३॥ घुटनों से पैर तक पृथ्वी-स्थान कहा जाता है, पीतवर्ण की