भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् अल्प भोजन होता है, इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं और तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है ॥ १०५-१०६ ॥ रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भोकरणमेव यः । करोति त्रिषु कालेषु नैव तस्यास्ति दुर्लभम् ॥१०७ नाभिकन्दे च नासाग्रे पादांगुष्ठे च यत्नवान् । धारयेन्मनसा प्राणान्सन्ध्याकालेषु वा सदा ॥१०८ सर्वरोगैर्विनिमुक्तो जीवेद्योगी गतक्लमः । कुक्षिरोगविनाशः स्यान्नाभिकन्देषु धारणात् ॥१०६ नासाग्रधारणाद्दीर्घमायुः स्याद्देहलाघवः । ब्राह्मे मुहूर्ते संप्राप्ते वायुमाकृष्य जिह्वया ॥११० पिवतस्त्रिषु मासेषु वाक्सिद्धिर्महती भवेत् । अभ्यस्यतुश्च षण्मासान्महारोगविनाशनम् ॥१११ जो रेचक और पूरक को छोड़कर केवल कुम्भक ही करने लगता है । उसके लिए तीनों काल में कुछ भी कठिन नहीं रहता ॥ १०७ ॥ प्रयत्नशील साधक नाभिकन्द, नासाग्र और पैर के अंगूठे में सदैव संध्या समय मन द्वारा प्राण को धारण करे ॥ १०८ ॥ ऐसा साधक सब रोगों से छूटकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है । नाभिकन्द में प्राण-धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं ॥ १०६ ॥ नासग्र धारण करने से दीर्घायु और देह की लाघवता प्राप्त होती है । ब्राह्म मुहूर्त में जिह्वा से वायु को खींच कर पीने से तीन मास में वाक्य-सिद्धि प्राप्त होती है और छः मास में महारोग से छुटकारा मिल जाता है ॥ ११०-१११ ॥ यत्रयत्र धृतो वायुरङ्गे रोगादिदूषिते । धारणादेव मरुत्तत्तदारोग्यमंश्नुते ॥११२