१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् अल्प भोजन होता है, इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं और तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है ॥ १०५-१०६ ॥ रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भोकरणमेव यः । करोति त्रिषु कालेषु नैव तस्यास्ति दुर्लभम् ॥१०७ नाभिकन्दे च नासाग्रे पादांगुष्ठे च यत्नवान् । धारयेन्मनसा प्राणान्सन्ध्याकालेषु वा सदा ॥१०८ सर्वरोगैर्विनिमुक्तो जीवेद्योगी गतक्लमः । कुक्षिरोगविनाशः स्यान्नाभिकन्देषु धारणात् ॥१०६ नासाग्रधारणाद्दीर्घमायुः स्याद्देहलाघवः । ब्राह्मे मुहूर्ते संप्राप्ते वायुमाकृष्य जिह्वया ॥११० पिवतस्त्रिषु मासेषु वाक्सिद्धिर्महती भवेत् । अभ्यस्यतुश्च षण्मासान्महारोगविनाशनम् ॥१११ जो रेचक और पूरक को छोड़कर केवल कुम्भक ही करने लगता है । उसके लिए तीनों काल में कुछ भी कठिन नहीं रहता ॥ १०७ ॥ प्रयत्नशील साधक नाभिकन्द, नासाग्र और पैर के अंगूठे में सदैव संध्या समय मन द्वारा प्राण को धारण करे ॥ १०८ ॥ ऐसा साधक सब रोगों से छूटकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है । नाभिकन्द में प्राण-धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं ॥ १०६ ॥ नासग्र धारण करने से दीर्घायु और देह की लाघवता प्राप्त होती है । ब्राह्म मुहूर्त में जिह्वा से वायु को खींच कर पीने से तीन मास में वाक्य-सिद्धि प्राप्त होती है और छः मास में महारोग से छुटकारा मिल जाता है ॥ ११०-१११ ॥ यत्रयत्र धृतो वायुरङ्गे रोगादिदूषिते । धारणादेव मरुत्तत्तदारोग्यमंश्नुते ॥११२
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०७.
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०७. मनसो धारणादेव पवनो धारितो भवेत् । मनसः स्थापने हेतुरुच्यते द्विजपुङ्गव ॥११३ कारणानि समाहृत्य विषयेभ्यः समाहितः । अपानमूर्ध्वमाकृष्येदुदरोपरि धारयेत् ॥११४ बध्नन्कराभ्यां श्रोत्रादिकरणानि यथातथम् । युञ्जानस्य यथोक्तेन वर्त्मना स्ववशं मनः ॥११५ शरीर का जो अङ्ग रोग पीड़ित हो तो उसमें वायु को धारण करने से वह दूर हो जाता है ॥ ११२ ॥ मन की धारणा हो जाने से वायु की धारणा भी होने लगती है। मन को स्थित करने के लिये प्राण को साधन बतलाया गया है ॥ ११३ ॥ इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपान वायु को ऊपर खींचकर ऊपर ही धारण करे, कानों को हाथों से बन्द किये रहे। इस साधन से मन वश में हो जाता है ॥ ११४-११५ ॥ मनोवशात्प्राणवायुः स्ववशे स्थाप्यते सदा । नासिकापुटयोः प्राणः पर्यायेण प्रवर्तते ॥११६ तिस्रश्च नाडिकास्तासु म यावन्तश्चरत्ययम् । शङ्खिनीविवरे याम्ये प्राणः प्राणभृतां सताम् ॥११७ तावन्तं च पुनः कालं सौम्ये चरित संततम् । इत्थं क्रमेण चरता वायुना वायुजिन्नरः ॥११८ अहश्च रात्रि पक्षं च मासं मत्वायनादिकम् । अन्तर्मुखो विजानीयात् कालभेदं समाहितः ॥११९ अङ्गुष्ठादिस्ववावयवास्फुरणदर्शनैरपि । अरिष्टं जीवितस्यापि जानीयात्क्षयमात्मनः ॥१२० इस प्रकार मन पर अधिकार हो जाने से प्राणवायु नियमित-
२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् हो जाता है और नासिका से क्रमपूर्वक आता जाता रहता है ॥ ११६ ॥ तीन नाड़ियाँ हैं। प्राणायाम करने वाले योगियों का श्वास दांये और बाँये नासापुट के समान समय तक चलता रहता है। इस प्रकार जिसका प्राणवायु क्रम से चलता है, वह प्राणजित हो जाता है। फिर वह दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन आदि के काल-भेद को अन्तर्मुख होकर जानने लगता है ॥ ११७--११९ ॥ अँगूठा आदि अपने अवयवों में स्फुरण ( नदियों का रक्त गति से फड़कना ) बन्द हो जाने पर शीघ्र ही अपने जीवन का अन्त होना समझ लेना चाहिये ॥ १२० ॥ ज्ञात्वा यतेत कैवल्यप्राप्तये योगवित्तमः । पादांगुष्ठे करांगुष्ठे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२१ तस्य संवत्सरादूर्ध्वं जीवितव्यक्षयो भवेत् । मणिबन्धे तथा गुल्फे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२२ षष्मासावधिरेतस्य जीवितस्य स्थितिर्भवेत् । कूर्परास्फुरणं यस्य तस्य त्रैमासिकी स्थितिः ॥१२३ कक्षे मेहनपार्श्वे च स्फुरणानुपलम्भने । मासावधिजीवितं स्यात् तदर्धं सत्वदर्शने ॥१२४ आश्रिते जठरे द्वारे दिनानि दश जीवितम् । ज्योतिः खद्योतवद्यस्थ तदर्धं तस्य जीवितम् ॥१२५ इस प्रकार अनिष्ट सूचक संकेतों को जानकर योगी को मोक्ष-साधन में ध्यान लगाना चाहिए। जिसके पैर तथा हाथ के अँगूठों में स्फुरण न जान पड़े। उसका जीवन एक वर्ष में समाप्त हो जाता है। मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (टखना) का स्फुरण बन्द हो जाने पर छः महीने तक जीवित रहता है। जब कोहनी में स्फुरण न हो तो जीवन की अवधि तीन मास रह जाती है
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ Public Domain. Digitization by eGangotri ] २०९ ॥ १२१-१२२ ॥ अगर कुक्षि, उपस्थेन्द्रिय में स्फुरण न हो तो एक महीने में और नेत्रों में स्फुरण न हो तो पन्द्रह दिन में जीवन का अन्त हो जाता है ॥ १२४ ॥ जठर-द्वार पर स्फुरण न होने से जीवन की अवधि दस दिन रह जाती है और अगर ज्योति जुगनू के समान हो जाय तो पाँच ही दिन शेष रह जाते हैं ॥ १२५ ॥ जिह्वाग्रादर्शने त्रीणि दिनानि स्थितिरात्मनः । ज्वालाया दर्शने मृत्युर्द्विदिने भवति ध्रुवम् ॥१२६ एवमादीन्वरिष्टानि दृष्ट्वाऽऽयुःक्षरकारणम् । निःश्रेयसाय युञ्जीत जपध्यानपरायणः ॥१२७ मनसा परमात्मानं ध्यात्वा तद्रूपतामियात् । यद्यष्टादशमेदेषु मर्मस्थानेषु धारणम् ॥१२८ स्थानात्स्थानं समाकृष्य प्रत्याहारः स उच्यते । पादांगुष्ठं तथा गुल्फं जङ्घामध्यं तथैव च ॥१२९ मध्यमूर्वोश्च मूलं च पयायुर्हृदयमेव च । मेहनं देहमध्यं च नाभिं च गलकूर्परम् ॥१३० तालुमूलं च मूलं च घ्राणस्याक्षणोश्च मण्डलम् । भ्रुवोर्मध्यं ललाटं मूलमूर्ध्वं च जानुनी ॥१३१ मूलं च करयोर्मूलं महाम्येतानि वै द्विजः । पञ्चभूतमये देहे भूतेष्वेतेषु पञ्चसु ॥१३२ अगर जिह्वा दिखलाई पड़ना बन्द हो जाय तो तीन दिन का समय समझना चाहिये और ज्वाला का दिखाई देना बन्द हो जाय तो दो ही दिन समझना चाहिये ॥ १२६ ॥ ये सब अरिष्ट आयु के क्षय के कारण रूप हैं । इनको जानकर अपने कल्याणार्थ जप और ध्यान में संलग्न हो ॥ १२७ ॥ मन से परमात्मा का ध्यान करते हुये उसकी एकरूपता को प्राप्त होने का यत्न करे । शरीर के अठारह मर्म स्थानों में धारणा की जाती है ॥१२८॥ एक स्थान से दूसरे स्थान Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् को खींचना प्रत्याहार कहा जाता है। पैर का अँगूठा, एड़ी जांघ का मध्यभाग उरु का मध्य, गुदा का मूल, हृदय, उपस्थ, देह का मध्य, नाभि, कण्ठ, कोहनी, तालु-मूल, नासिका का मूल, आंखों का मण्डल भौंहों का मध्य, ललाट, मस्तक का मूल, घुटने का मूल, हाथों का मूल स्थान—ये सब इस पञ्चभौतिक देह के मर्म स्थल हैं ॥ १२६--१३२ ॥ मनसो धारणं यत्तुयुक्तस्य च यमादिभिः । धारणा सा च संसारसागरोत्तारकारणम् ॥१३३ आजानुपदपर्यन्तं पृथिवीस्थानमिष्यते । पीतला चतुरस्त्रा च वसुधा वज्रलाञ्छिता ॥१३४ स्मर्त्तव्या पञ्चघटिका तत्रारोप्य प्रभञ्जनम् । आजानुकटिपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम् ॥१३५ अर्धचन्द्रसमाकारं श्वेतमजुंनलाञ्छितम् । स्मर्त्तव्यमम्भः श्वसनमारोप्य दशनाडिका ॥१३६ आदेहमध्यकट्यन्तमग्निस्यानमुदाहृतम् । तत्र सिन्दूरवर्णोऽग्निर्ज्वलनं दश पञ्च च ॥१३७ स्मर्त्तव्या घटिका प्राणं कृत्या कुम्भे तथेरितम् । नाभेरुपरि नासान्तं वायुस्थानं तु तत्र वै ॥१३८ वेदिकाकारबद्ध श्रो बलवान्भूतमारुतः । स्मर्तव्यः कुम्भकेनैव प्राणमारोप्य मारुतम् ॥१३९ घटिकाविंशतिस्तस्माद् घ्राणाद्ब्रह्मबिलावधि । व्योमस्थानं नभस्तत्र भिन्नाञ्जनसमप्रभम् ॥१४० यमादि द्वारा मन का जो धारण करना है वही धारणा है जिससे मनुष्य संसार-सागर को पार करने में समर्थ होता है ॥१३३॥ घुटनों से पैर तक पृथ्वी-स्थान कहा जाता है, पीतवर्ण की
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चारकोण वाली पृथ्वी वज्र-लंछिता है ॥ १३४ ॥ पांच घड़ी तक वायु को धारण करके पृथ्वी का ध्यान करना चाहिये। घुटनों से कमर तक जल का स्थान कहा है ॥ १३५ ॥ इस जल स्थान का आकार आधे चन्द्रमा के समान है, वर्ण श्वेत है तथा चांदी से लांछित है। इसमें दस घड़ी तक श्वाँस रोककर जल का ध्यान करे ॥ १३६ ॥ कटि से देह के मध्य अग्नि स्थान है। वह सिन्दूर के रङ्ग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोककर अग्नि का ध्यान करना चाहिये। नाभि से नासिका तक वायु का स्थान है, जिसका आकार वेदी के तुल्य है, धूम्रवत्, शक्तिशाली पवन का ध्यान बीस घड़ी तक कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर करना चाहिये । नासिका से ब्रह्मरन्ध्र तक आकाश स्थान है जिसकी नीले रंग की प्रभा है ॥ १३६-१४० ॥
व्योम्नि मारुतमारोप्य कुम्भकेनैव यत्नवान् । पृथिव्यंशे तु देहस्य चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥१४१ अनिरुद्धं हरिं योगी यतेत भवमुक्तये । अबंशे पूरयेद्योगी नारायणमुदग्रधीः ॥१४२ प्रद्युम्नमग्नौ वाय्वंशे संकर्षणमतः परम् । व्योमांशे परमात्मानं वासुदेवं सदा स्मरेत् ॥१४३ अचिरादेव तत्प्राप्तिर्युञ्जानस्य न संशयः । बद्ध्वा योगासनं पूर्वं हृद्देशे हृदयाञ्जलिः ॥१४४ नासाग्रन्यस्तनयनो जिह्वां कृत्वा च तालुनि । दन्तैर्दन्तानसंस्पृश्य ऊर्ध्वकायः समाहितः ॥१४५ संयमेच्चेन्द्रियग्राममात्मबुद्ध्या विशुद्धया । चिन्तनं वासुदेवस्य परस्य परमात्मनः ॥१४६ प्रयत्नशील साधक कुम्भक द्वारा वायु को आकाश में रोके। फिर पृथ्वी अंश वाले भाग में चतुर्भुज किरीटधारी अनिरुद्ध हरि का
२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ध्यान करे, जिससे योगी मुक्ति को प्राप्त करने में समर्थ होता है। जल वाले अंश में नारायण का ध्यान करे, अग्नि के अंश में प्रद्युम्न का, वायु-अंश में संकर्षण का और आकाश वाले अंश में परमात्मा वासुदेव का ध्यान करे ॥ १४१-१४३ ॥ जो सदैव इस अभ्यास को करता रहता है उसको परमात्मा का साक्षात्कार शीघ्र ही हो जाता है। पहले योगासन पर बैठकर हृदय-प्रदेश में हृदय को स्थिति करते हुये नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करे, जिह्वा को तालु में लगावे, ऊपर और नीचे के दांतों का स्पर्श न होने दे, शरीर को ऊँचा करके समाहित होकर बैठे और शुद्ध आत्मबुद्धि से इन्द्रियों का संयम करता हुआ भगवान् वासुदेव का चिन्तन करे ॥ १४४-१४६ ॥ स्वरूपव्याप्तरूपस्य ध्यानं कैवल्यसिद्धिदम् । याममात्रं वासुदेवं चिन्तयेत्कुम्भकेन यः ॥१४७ सप्तजन्मार्जितं पापं तस्य नश्यति योगिनः । नाभिकन्दात्समारभ्य यावद्धृदयगोचरम् ॥१४८ जाग्रद्वृत्तिं विजानीयात्कण्ठस्थं स्वप्नवर्तनम् । सुषुप्तं तालुमध्यस्थं तुर्यं भ्रूमध्यसंस्थितम् ॥१४६ तुर्यातीतं परं ब्रह्म ब्रह्मरन्ध्रे तु लक्षयेत् । जाग्रद्वृत्तिं समारभ्य यावद्ब्रह्मबिलान्तरम् ॥१५० तत्रात्माऽयं तुरीयः स्यात् तुर्यान्ते विष्णुरुच्यते । ध्यानेनैव समायुक्तो व्योम्नि चात्यन्तनिर्मले ॥१५१ सूर्यकोटिद्युतिधरं नित्योदितमधोक्षजम् । हृदयाम्बुरुहासीनं ध्यायेद्वा विश्वरूपिणम् ॥१५२ इस प्रकार अपने भीतर व्याप्त परमात्मा के स्वरूप का ध्यान करने से कैवल्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार एक प्रहर तक
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३ कुम्भक करते हुए जो भगवान वासुदेव का ध्यान करता है, उसके सात जन्म के पाप विनष्ट हो जाते हैं। नाभिकन्द से लेकर हृदय-प्रदेश तक जाग्रत वृत्ति का स्थान है, स्वप्न वृत्ति कण्ठ में रहती है, सुषुप्ति तालु के मध्य में और तुरीय भ्रुकुटियों के मध्य में स्थित है ॥ १४७-१४६ ॥ तुर्यातीत का स्थान ब्रह्मरन्ध्र में परब्रह्म की ओर होता है। जागृत वृत्ति से लगाकर ब्रह्मरन्ध्र तक तुरीय का आत्मा रहता है। उसके पश्चात् वह विष्णु कहलाता है। तब साधक अत्यन्त निर्मल आकाश में हृदय-कमल पर आसीन करोड़ों सूर्यं के समान प्रभा वाले नित्य उदयरूपी विश्वरूप विष्णु का ध्यान करे ॥ १५०--१५२ ॥ अनेकाकारखचितमनेकवदनान्वितम् । अनेकभुजसंयुक्तमनेकायुधमण्डितम् ॥१५३ नानावर्णधरं देवं शान्तमुग्रमुदायुधम् । अनेकनयनाकीर्णं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥१५४ ध्यायतो योगिनः सर्वमनोवृत्तिर्विनश्यति । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं चैतन्यज्योतिरव्ययम् ॥१५५ कदम्बगोलकाकारं तुर्यातीतं परात्परम् । अनन्तमानन्दमयं चिन्मयं भास्करं विभुम् ॥१५६ निवातदीपसदृशमकृत्रिममणिप्रभम् । ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्तिः करतले स्थिता ॥१५७ उन नाना आकार वाले, अनेक मुखों वाले, अनेक भुजाओं वाले, अनेक आयुधों वाले, अनेक वर्ण वाले, देवरूप, शान्त, उग्र, आयुधों को उठाये हुये, अनेक नेत्रयुक्त, करोड़ों सूर्यों की प्रभा वाले विश्वरूप विष्णु का ध्यान करने से योगी की सब मनोवृत्तियां नष्ट हो जाती हैं। हृदत-कमल के मध्य स्थान में स्थित चैतन्य, ज्योतिरूप, अव्यय, कदम्ब के समान गोलाकार, तुर्यातीत, परात्पर, अनन्त, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् आनन्दमय, चिन्मय, प्रकाशमान, निर्वात स्थान में स्थित दीपक के समान अकृत्रिम मणि की प्रभा वाले परब्रह्म का ध्यान करने से मुक्ति योगी के करतलगत रहती है ॥१५३-१५७॥ विश्वरूपस्य देवस्य रूपं यत्किंचिदेव हि । स्थवीयः सूक्ष्ममन्यद्वा पश्यन्हृदयपंकजे ॥१५८ ध्यायतो योगिनो यस्तु साक्षादेव प्रकाशते । अणिमादिफलं चैव सुखेनैवोपजायते ॥१५९ जीवात्मनः परस्यापि यच्चैवमुभयोरपि । अहमेव परं ब्रह्म ब्रह्माहमिति संस्थितिः ॥१६० समाधिः स तु विज्ञेयः सर्ववृत्तिविवर्जितः । ब्रह्म संपद्यते योगी न भूयः संसृतिं व्रजेत ॥१६१ एवं विशोध्य तत्त्वानि योगी निःस्पृहचेतसा । यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥१६२ ग्राह्याभावे मनःप्राणौ निश्चयज्ञानसंयुक्तः । शुद्धसत्त्वे परे लीनो जीवः सैन्धवपिण्डवत् ॥१६३ मोहजालकसंघातं विश्वं पश्यति स्वप्नवत् । सुषुप्तिवच्चश्चरति स्वभावपरिनिश्चलः ॥१६४ निर्वाणपदमाश्रित्य योगी कैवल्यमश्नुते । इत्युपनिषत् ॥ विश्व-रूप देव का जो कुछ स्थूल, सूक्ष्म अथवा अन्य प्रकार का रूप है, उसका अपने हृदय-कमल में जो योगी ध्यान करता है वह साक्षात् उन्हीं के रूप का हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल को अनायास ही पा लेता है ॥ १५८-१५९ ॥ जीवात्मा और परमात्मा दोनों का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर "मैं ही ब्रह्म हूँ" इस
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५ स्थिति को पा लेना ही समाधि कहा जाता है। उसमें समस्त वृत्तियों का अन्त हो जाता है। जो योगी इस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है वह पुनः संसार में नहीं आता ॥ १६०-१६१ ॥ इस प्रकार योगी तत्व का शोध करता हुआ निस्पृह चित्त से ईंधन रहित अग्नि के समान स्वयं ही शान्त हो जाता है ॥ १६२ ॥ फिर उसके लिये कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं रहता, उसका मन और प्राण सच्चे आत्म-ज्ञान से युक्त हो जाते हैं और उसका जीव शुद्ध परमात्म तत्व में जल में नमक के समान लय हो जाता है ॥ १६३ ॥ उसे यह मोह जाल में फँसा हुआ संसार स्वप्न की तरह दिखाई देने लगता है और वह पूर्ण निश्चल हो स्वभाव से ही सुषुप्ति की-सी अवस्था में रहने लगता है ॥ १६४ ॥ ऐसा योगी निर्वाण पद को प्राप्त कर कैवल्य स्थिति में रहता है। यह उपनिषद् है। ॥ त्रिशिखिब्राह्मण उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—
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अद्वयतारकोपनिषत्
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्ति पाठ—यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है। पूर्ण में से पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । अथातोऽद्वयतारकोपनिषदं व्याख्यास्यामो यतये जितेन्द्रियाय शमादिषड्गुणपूर्णाय ॥१॥ चित्स्वरूपोऽहमिति सदा भावयन् सम्यङ्निमीलिताक्षः किंचिदुन्मीलिताक्षो वाऽन्तर्दृष्ट्या भ्रू दहरादुपरि सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं परं ब्रह्मावलोकयन् तद्रूपो भवति ॥२॥ गर्भजन्मजरामरणसंसारमहद्भयात् संतारमति तस्मा- त्तारकमिति। जीवेश्वरौ मायिकाविति विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म ॥३॥ तत्सिद्ध्यर्थं लक्ष्यत्रयानुसंधानं कर्तव्यम् ॥४॥ देहमध्ये ब्रह्मनाडी सुषुम्ना सूर्यरूपिणी पूर्णचन्द्राभा वर्तते । सा तु मूलाधारादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रगामिनी भवति । तन्मध्ये तटित्कोटिसमानकान्त्या मृणालसूत्रवत् सूक्ष्माङ्गी कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्ति । तां दृष्ट्वा मनसैव नरः सर्वपापविना- शद्वारा मुक्तो भवति । फालोर्ध्वगललाटविशेषमण्डले निरन्तरं तेजस्तारकयोगविस्फुरणेन पश्यति चेत् सिद्धो भवति । तर्जन्य- ग्रोन्मीलितकर्णरन्ध्रद्वये तत्र फूत्कारशब्दो जायते । तत्र स्थिते Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
अद्वयतारकोपनिषत् [ २१७ मनसि चक्षुर्मध्यगतनीलज्योतिस्थलं विलोक्य अन्तर्दृष्ट्या निर- तिशयसुखं प्राप्नोति । एवं हृदये पश्यति । एवमन्तर्लक्ष्यलक्षणं मुमुक्षुभिरुपास्यम् ॥५॥ ॐ। अब अद्वयतारक उपनिषद का कथन करते हैं जो संन्यासी, जितेन्द्रिय तथा शम-दम आदि षट गुणों से युक्त साधकों के लिये है ॥ १ ॥ आंखें बन्द अथवा अधखुली रख कर अन्तर दृष्टि से भ्रुकुटियों के ऊपर के स्थान में "मैं चित् स्वरूप हूँ" इस प्रकार का भाव निरन्तर रखते हुये सच्चिदानन्द, तेज समूह रूप परब्रह्म की झांकी करने से परब्रह्म रूप हो जाता है ॥ २ ॥ जो गर्भ, जन्म, जरा, मरण, संसार आदि महान पापों से तारता है, उसे तारकब्रह्म कहा जाता है। जीव और ईश्वर को मायिक जानते हुए अन्य सबको 'नीति-नेति' कहते हुए जो कुछ शेष बचता है, वही अद्वय ब्रह्म है ॥ ३ ॥ उसकी सिद्धि के लिये तीन लक्ष्यों का अनुसंधान करना उचित है ॥ ४ ॥ देह के मध्य में सुषुम्ना नाम की ब्रह्मनाड़ी पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाश वाली उपस्थित है, वह मूलाधार से आरम्भ होकर ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। इस नाड़ी के मध्य में करोड़ों बिजलियों के समान तेजवाली, मृणाल के सूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रसिद्ध है। इसका मन के द्वारा दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से छूट कर मुक्त हो जाता है। ललाट के ऊपर विशेष मण्डल में स्फुरित होने वाले तेज को तारक ब्रह्म के योग से सदैव देखता रहता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छेदों को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर फुत्कार का शब्द सुनाई देता है। उसमें मन को स्थित करके चक्षुओं के मध्य नीली ज्योति के स्थल को अन्तःदृष्टि से देखने पर अत्यन्त सुख की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार का दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्षणों का मोक्षाभिलाषी पुरुष को अभ्यास करना चाहिये ॥५॥
२१८ ] [ अद्वयतारकोपनिषत् अथ बहिर्लक्ष्यलक्षणम्। नासिकाग्रे चतुर्भिः षड्भिरष्टभिः दशभिः द्वादशभिः क्रमात् अंगुलान्ते नीलद्युतिश्यामत्वसहस्ररक्तभ- ङ्गीस्फुरत्पीतवर्णद्वयोपेतं व्योम यदि पश्यति स तु योगी भवति । चलदृष्ट्या व्योमभागवीक्षितुः पुरुषस्य दृष्ट्यग्रे ज्योतिर्मयूखा वर्तन्ते । तद्दर्शनेन योगी भवति । तप्तकाञ्चनसंकाशज्योतिर्मयूखा अपाङ्गान्ते भूमौ वा पश्यति तद्दृष्टिः स्थिरा भवति । शीर्षोपरि द्वादशांगुलसमीक्षितुः अमृतत्वं भवति । यत्र कुव स्थितस्य शिरसि व्योमज्योतिर्दृष्टं चेत स तु योगी भवति ॥६॥ अथ मध्यलक्ष्यलक्षणं प्रातश्चित्रादिवर्णखण्डसूर्यचक्रवत् वह्निज्वालावलीवत् । तद्विहीनान्तरिक्षवत् पश्यति । तदाकारा- कारितया अवतिष्ठति । तद्भूयोदर्शनेन गुणरहिताकाशं भवति । विस्फुरत्तारकाकारदीप्यमानगाढतमोपमं परमाकाशं भवति । कालानलसमद्योतमानं महाकाशं भवति । सर्वोत्कृष्टपरमद्युति- प्रद्योतमानं तत्त्वाकाशं भवति । कोटि सूर्यप्रकाशवैभवसंकाश सूर्याकाशं भवति । एवं बाह्याभ्यान्तरस्थव्योमपञ्चकं तारक- लक्ष्यम् । तद्दर्शी विमुक्तफलस्तोऽहग्व्योमसमानो भवति । तस्मात् तारक एव लक्ष्यं अमनस्कफलप्रदं भवति ॥७॥ तत्तारकं द्विविधं पूर्वार्धं तारकं उत्तरार्धं अमनस्कं चेति । तदेष श्लोको भवति— तद्योगं च द्विधा विद्धि पूर्वोत्तरविधानतः । पूर्वं तु तारकं विद्यात् अमनस्कं तदुत्तरमिति ॥८ अब बाह्य लक्ष्य के लक्षणों पर विचार करते—नासिकाग्र से क्रमशः चार, छः, आठ, दस या बारह अंगुल की दूरी पर नील और श्याम रङ्ग का सा रक्त भृङ्ग के वर्ण का प्रकाश, जो पीत शुक्ल वर्ण से भी युक्त होता है, उसे जो आकाश में देखता है, वह योगी
अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २१६ होता है । चलती हुई दृष्टि से आकाश में देखने से ज्योति किरणें दिखलाई देती हैं, उनको देखने वाला योगी होता है। जब नेत्रों के कोने में तृप्त सुवर्ण के समान ज्योति मयूख का दर्शन होता है तो दृष्टि स्थिर हो जाती है। मस्तक के ऊपर बाहर अंगुल की दूरी पर ज्योति को देखने वाला अमृतत्व को प्राप्त होता है । चाहे जिस स्थान पर स्थित शिर के ऊपर जो व्योम ज्योति को देखता है, वह योगी होता है ॥ ६ ॥ इससे आगे मध्य लक्ष के लक्षण कहते हैं-प्रातः समय चित्रादि वर्ण युक्त अखण्ड सूर्य चक्रवत्, अग्नि की ज्वाला के सदृश्य और उनसे रहित अन्तरिक्ष के तुल्य देखता है, उनके आकार का होकर स्थिर रहता है, उसके दर्शन से फिर निर्गुण 'आकाश' हो जाता है। चमकने वाले तारे से प्रकाशित और प्रातःकाल के अँधेरे के समान 'परमाकाश' होता है । 'महाकाश' कालानल के समान प्रकाशयुक्त होता है । 'तत्त्वाकाश' सबसे उत्कृष्ट प्रकाश और प्रखर ज्योति वाला होता है। 'सूर्याकाश' करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान होता है। इस प्रकार बाहर और भीतर स्थित ये पांच आकाश तारक का लक्ष्य है। इस विधि से आकाश को देखने वाला उसी के समान बन्धनमुक्त हो जाता है । तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल प्रदान करने वाला होता है ॥ ७ ॥ इस प्रकार यह तारक-योग दो प्रकार का होता है-पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध । इस विषय में यह श्लोक कहा है-"यह योग दो प्रकार का है-पूर्व और उत्तर । पूर्व को तारक कहा जाता है और उत्तर को अमनस्क ।" ॥८॥ अक्ष्यन्तस्तरयोः चन्द्रसूर्य प्रतिफलनं भवति । तारकाभ्यां सूर्यचन्द्र मण्डलदर्शनं ब्रह्माण्डमिव पिण्डाण्डशिरोमध्यस्थाकाशे रवीन्दुमण्डलद्वितयमस्तीति निश्चित्य तारकाभ्यां तद्दर्शनम् । अत्राप्युभयैक्यदृष्ट्या मनोयुक्तं ध्यायेत् तद्योगाभावे इन्द्रियप्रवृत्ते- रनवकाशात् । तस्मात् अन्तर्दृष्ट्या तारक एवाऽनुसंधेयः ॥६॥
२२० ] [ अद्वयतारकोपनिषत् यत्तारकं द्विविधः मूर्तितारकं अमूर्तितारकं चेति । यत् इन्द्रियान्तं तत् मूर्तिमत् । यत् भ्रूयुगातीतं तत् अमूर्तिमत् । सर्वत्र अन्तःपदार्थविवेचने मनोयुक्ताभ्यास इष्यते । तारकाभ्यां तदूर्ध्वस्थसत्त्वदर्शनात् मनोयुक्तेन अन्तरीक्षणेन सच्चिदानन्द- स्वरूपं ब्रह्म॑व । तस्मात् शुक्लतेजोमयं ब्रह्मेति सिद्धम् । तद्ब्रह्म मनःसस्कारिचक्षुषा अन्तर्दृष्ट्या वेद्यं भवति । एवं अमूर्तितारक- मपि । मनोयुक्तेन चक्षुषैव दहरादिकं वेद्यं भवति, रूपग्रहण प्रयोजनस्य मनश्चक्षुरधीनत्वात् बाह्यवदान्तरेऽपि आत्तमरश्चक्षुः संयोगेनैव रूपग्रहणकार्योदयात् । तस्मात् मनोयुक्ता अन्तर्दृष्टिः तारकप्रकाशाय भवति ॥१०॥ हम आंख के तारक (पुतलियों) से सूर्य और चन्द्र को देखते हैं। जिस प्रकार हम नेत्र के तारकों से बाह्य ब्रह्माण्ड के सूर्य और चन्द्र के दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने सिर रूप ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित सूर्य और चन्द्र का निश्चय करके उनका दर्शन करना चाहिए और दोनों को एक ही समझकर मन से उनका ध्यान करना चाहिए क्योंकि मन को इस भाव में युक्त न किया जायगा तो इन्द्रियाँ विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी । इसलिये साधक को अन्तर दृष्टि से तारक का ही अनुसंधान करना चाहिए ॥ ६ ॥ तारक दो प्रकार का होता है—मूर्त और अमूर्त । जो इन्द्रियों के अन्त में है, वह मूर्ति तारक है और जो दोनों भ्रुकुटियों से बाहर है, वह अमूर्ति है। अन्तः पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन द्वारा अभ्यास करना चाहिए । सत्व-दर्शन युक्त मन से अन्तर में निरीक्षण करने से दोनों तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का दर्शन होता है। इससे विदित होता है कि ब्रह्म शुक्ल तेजोमय है। उस ब्रह्म को मन सहित चक्षुओं की अन्तःदृष्टि से देखकर जानना । अमूर्ति तारक भी इसी विधि से मन संयुक्त नेत्रों से विदित होता है । रूप
दर्शन के विषय में मन चक्षुओं के अधीन रहता है और बाहर के समान भीतर भी रूप ग्रहण का कार्य इन दोनों के द्वारा ही होता है । इसलिए मन सहित चक्षुओं से ही तारक का प्रकाश जाना जाता है ॥ १० ॥ भ्रूयुगमध्यबिले दृष्टिं तद्द्वारा ऊर्ध्वस्थिततेज आविर्भूतं तारकयोगो भवति । तेन सह मनोयुक्तं तारकं सुसंयोज्य प्रयत्नेन भ्रूयुग्मं सावधानतया किंचिदूर्ध्वमुत्क्षेपयेत् । इति पूर्वंतारकयोगः । उत्तरं तु अमूर्तिमत् अमनस्कमित्युच्यते । तालुमूलोर्ध्वभागे महान् ज्योतिर्मयूखो वर्तते । तत् योगिभिर्ध्येयम् । तस्मात् अणिमादिसिद्धिर्भवति ॥ ११ ॥ अन्तर्बाह्यलक्ष्ये दृष्टौ निमेषोन्मेषवर्जितायां सत्यां शांभवी मुद्रा भवति । तन्मुद्रारूढज्ञानिनिवासात् भूमिः पवित्रा भवति । तद्दृष्ट्या सर्वे लोकाः पवित्रा भवन्ति । तादृशपरमयोगिपूजा यस्य लभ्यते सोऽपि मुक्तो भवति ॥ १२ ॥ अन्तर्लक्ष्यज्ज्वलज्ज्योतिःस्वरूपं भवति । परमगुरूपदेशेन सहस्रारज्वलज्ज्योतिर्वा बुद्धिगुहानिहितचिज्ज्योतिर्वा षोडशान्त- स्थतुरीयचैतन्यं वा अन्तर्लक्ष्यं भवति । तद्दर्शनं सदाचार्यमूलम्॥१३॥ तारक योग का लक्ष्य दोनों भ्रुकुटियों के मध्य स्थान के ऊर्ध्व भाग में स्थित तेज का दर्शन करना है । उसके सहित मन से तारक की सुयोजना करके प्रयत्नपूर्वक दोनों भौहों को किंचित उच्च रखे । यह तारक-योग का पूर्व भाग है । दूसरे उत्तर भाग—अमूर्त्तिमान को अमनस्क कहते हैं । तालूमूल के ऊर्ध्वभाग में महाज्योति किरणमण्डल होता है । वही योगियों का लक्ष्य है । उसी से अणिमादिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥ ११ ॥ जब साधक की अन्तर और बाह्य लक्ष्य को
२२२ ] [ अद्वयतारकोपनिषत् देखने वाली दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब शांभवी मुद्रा होती है । इस मुद्रा से युक्त ज्ञानी के निवास करने की भूमि पवित्र मानी जाती है और सब लोग उसके दर्शन से पवित्र हो जाते हैं। जो कोई ऐसे परमयोगी की पूजा करता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है ॥ १२ ॥ अन्त:लक्ष्य तरल ज्योति के रूप में हो जाता है। परम गुरु का उपदेश प्राप्त होने से सहस्रदल-कमल में तरल जल-ज्योति अथवा बुद्धि गुहा में रहने वाली ज्योति अथवा सोलह कला के अन्त में स्थित तुरीय चैतन्य अन्तर्लक्ष्य होता है। यह सदाचार मूलक दर्शन है ॥ १३ ॥ आचार्यों वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः । योगज्ञो योगनिष्ठश्च सदा योगात्मकः शुचिः ॥१४ गुरुभक्तिसमायुक्तः पुरुषज्ञो विशेषतः । एवंलक्षणसंपन्नो गुरुरित्यभिधीयते ॥१५ गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः । अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥१६ गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः । गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परायणम् ॥१७ गुरुरेव परा काष्ठा गुरुरेव परं धनम् । यस्मात्तदुपदेष्टाऽसौ तस्माद्गुरुतरो गुरुरिति ॥१८ यः सकृदुच्चारयति तस्य संसारमोचनं भवति । सर्वजन्म- कृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति । सर्वान् कामानवाप्नोति । सर्व- पुरुषार्थसिद्धिर्भवति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥ १६ ॥ वह सम्पन्न आचार्य, विष्णु भक्त, मत्सरता रहित, योगज्ञाता, योगनिष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष रूप से लीन, इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है। 'गु' शब्द का
अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २२३ अर्थ है अन्धकार और ‘रु’ का अर्थ है इसको रोकने वाला । अन्ध- कार को दूर करने से गुरु होता है। गुरु ही परमब्रह्म है, गुरु ही परम- गति है, गुरु ही पराविद्या है, गुरु ही परायण योग्य है, गुरु ही पराकाष्टा है, गुरु ही परम धन है ॥ १४-१८ ॥ वह गुरु उपदेश करने वाला होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है। इसका उच्चारण करने से संसार से छुटकारा हो जाता है, सब जन्मों के पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं, सब कामनायें पूरी हो जाती हैं, सब पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते हैं। जो इस प्रकार जानता है, वही उपनिषद् का ज्ञाता है ॥१६॥ ॥ अद्वयतारक उपनिषद् समाप्त ॥
पाशुपतब्रह्मोपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ पूर्वकाण्डः अथ ह वै स्वयंभूर्ब्रह्मा प्रजाः सृजानोति कामकामो जायते कामेश्वरो वैश्रवणः ॥ १ ॥ वैश्रवणो ब्रह्मपुत्रो वालखिल्यः स्वयंभुवं परिपृच्छति—जगतां का विद्या का देवता जाग्रत्तूरीय योरस्य को देवो यानि कस्य वशानि कालाः कियत्प्रमाणाः कस्याज्ञया रविचन्द्रग्रहादयो भासन्ते कस्य महिमा गगनस्वरूप एतदहं श्रोतुमिच्छामि नान्यो जानाति त्वंब्रूहि ब्रह्मन् ॥ २ ॥ स्वयंभूरुवाच—कृत्स्नजगतां मातृका विद्या ॥ ३ ॥ द्विक्लि- वर्णसहिता द्विवर्णमाता त्रिवर्णसहिता चतुर्मात्रात्मकोङ्कारो
पूर्वकाण्ड ] [ २२५
पूर्वकाण्ड ] [ २२५ मम प्राणात्मिका देवता ॥४॥ अहमेव जगतत्रयस्यैकः पतिः ॥ ५ ॥ यम वशानि सर्वाणि युगान्यपि च ॥ ६ ॥ अहोरात्रादि- मतिसंवर्धिताः कालाः ॥७॥ मम रूपा रवेस्तेजश्चन्द्रनक्षत्र ग्रहतेजांसि ॥ ८ ॥ गगनो मम त्रिशक्तिमायास्वरूपः नान्यो मदस्ति ॥ ६ ॥ तमोमायात्मको रुद्रः सात्विकमायात्मको विष्णु राजसमायात्मको ब्रह्मा । इन्द्रादयस्तामसराजसात्मिका न सात्विकः कोऽपि अघोरः साधारणस्वरूपः ॥ १० ॥ हरि ॐ। एक समय स्वयंब्रह्मा के मन में इच्छा हुई कि “मैं प्रजा उत्पन्न करूं” तो कामनाओं के पूर्ण करने वाले रुद्र और कुबेर की उत्पत्ति हुई ॥ १॥ तब कुबेर और बालखिल्य ऋषि ने स्वयंभू से पूछा—जगत में विद्या क्या है ? जागृत और तुरीय अवस्था के देवता कौन हैं ? जगत किसके वश में है, काल का क्या प्रमाण है ? सूर्य चन्द्रादि किस की आज्ञा से प्रकाशित होते हैं ? आकाश के समान विशाल किस की महिमा है ? हम इन बातों को जानना चाहते हैं, आपके सिवाय कोई इनका जानने वाला नहीं हैं, अतएव इन बातों को बतलाइये ॥ २ ॥ स्वयंभू ने कहा—जगत की मातृका वर्णमाला रूप माता विद्या है ॥ ३॥ वह दो वर्ण (हंस) और तीन वर्ण (प्रणव) वाली है। दो वर्ण वाली भी तीन वर्ण की (प्रणव) ही है। चार मात्रा वाला ॐकार मेरा प्राण रूप देव है ॥ ४॥ तीनों लोकों का मैं ही एक मात्र पति हूँ ॥ ५ ॥ समस्त युग मेरे वश में रहते हैं ॥ ६ ॥ मुझसे ही दिन-रात्रि आदि काल उत्पन्न हुये हैं ॥ ७ ॥ सूर्य का तेज और चन्द्रमा, तारागण, ग्रह आदि में जो ज्योति है, वह मेरी ही है ॥ ८ ॥ यह आकाश मेरी तीन शक्तिशाली माया रूप है और मेरे सिवाय कहीं कुछ नहीं है ॥ ९ ॥ रुद्र-तमोगुण