भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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२२० ] [ अद्वयतारकोपनिषत् यत्तारकं द्विविधः मूर्तितारकं अमूर्तितारकं चेति । यत् इन्द्रियान्तं तत् मूर्तिमत् । यत् भ्रूयुगातीतं तत् अमूर्तिमत् । सर्वत्र अन्तःपदार्थविवेचने मनोयुक्ताभ्यास इष्यते । तारकाभ्यां तदूर्ध्वस्थसत्त्वदर्शनात् मनोयुक्तेन अन्तरीक्षणेन सच्चिदानन्द- स्वरूपं ब्रह्म॑व । तस्मात् शुक्लतेजोमयं ब्रह्मेति सिद्धम् । तद्ब्रह्म मनःसस्कारिचक्षुषा अन्तर्दृष्ट्या वेद्यं भवति । एवं अमूर्तितारक- मपि । मनोयुक्तेन चक्षुषैव दहरादिकं वेद्यं भवति, रूपग्रहण प्रयोजनस्य मनश्चक्षुरधीनत्वात् बाह्यवदान्तरेऽपि आत्तमरश्चक्षुः संयोगेनैव रूपग्रहणकार्योदयात् । तस्मात् मनोयुक्ता अन्तर्दृष्टिः तारकप्रकाशाय भवति ॥१०॥ हम आंख के तारक (पुतलियों) से सूर्य और चन्द्र को देखते हैं। जिस प्रकार हम नेत्र के तारकों से बाह्य ब्रह्माण्ड के सूर्य और चन्द्र के दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने सिर रूप ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित सूर्य और चन्द्र का निश्चय करके उनका दर्शन करना चाहिए और दोनों को एक ही समझकर मन से उनका ध्यान करना चाहिए क्योंकि मन को इस भाव में युक्त न किया जायगा तो इन्द्रियाँ विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी । इसलिये साधक को अन्तर दृष्टि से तारक का ही अनुसंधान करना चाहिए ॥ ६ ॥ तारक दो प्रकार का होता है—मूर्त और अमूर्त । जो इन्द्रियों के अन्त में है, वह मूर्ति तारक है और जो दोनों भ्रुकुटियों से बाहर है, वह अमूर्ति है। अन्तः पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन द्वारा अभ्यास करना चाहिए । सत्व-दर्शन युक्त मन से अन्तर में निरीक्षण करने से दोनों तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का दर्शन होता है। इससे विदित होता है कि ब्रह्म शुक्ल तेजोमय है। उस ब्रह्म को मन सहित चक्षुओं की अन्तःदृष्टि से देखकर जानना । अमूर्ति तारक भी इसी विधि से मन संयुक्त नेत्रों से विदित होता है । रूप