भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २१६ होता है । चलती हुई दृष्टि से आकाश में देखने से ज्योति किरणें दिखलाई देती हैं, उनको देखने वाला योगी होता है। जब नेत्रों के कोने में तृप्त सुवर्ण के समान ज्योति मयूख का दर्शन होता है तो दृष्टि स्थिर हो जाती है। मस्तक के ऊपर बाहर अंगुल की दूरी पर ज्योति को देखने वाला अमृतत्व को प्राप्त होता है । चाहे जिस स्थान पर स्थित शिर के ऊपर जो व्योम ज्योति को देखता है, वह योगी होता है ॥ ६ ॥ इससे आगे मध्य लक्ष के लक्षण कहते हैं-प्रातः समय चित्रादि वर्ण युक्त अखण्ड सूर्य चक्रवत्, अग्नि की ज्वाला के सदृश्य और उनसे रहित अन्तरिक्ष के तुल्य देखता है, उनके आकार का होकर स्थिर रहता है, उसके दर्शन से फिर निर्गुण 'आकाश' हो जाता है। चमकने वाले तारे से प्रकाशित और प्रातःकाल के अँधेरे के समान 'परमाकाश' होता है । 'महाकाश' कालानल के समान प्रकाशयुक्त होता है । 'तत्त्वाकाश' सबसे उत्कृष्ट प्रकाश और प्रखर ज्योति वाला होता है। 'सूर्याकाश' करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान होता है। इस प्रकार बाहर और भीतर स्थित ये पांच आकाश तारक का लक्ष्य है। इस विधि से आकाश को देखने वाला उसी के समान बन्धनमुक्त हो जाता है । तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल प्रदान करने वाला होता है ॥ ७ ॥ इस प्रकार यह तारक-योग दो प्रकार का होता है-पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध । इस विषय में यह श्लोक कहा है-"यह योग दो प्रकार का है-पूर्व और उत्तर । पूर्व को तारक कहा जाता है और उत्तर को अमनस्क ।" ॥८॥ अक्ष्यन्तस्तरयोः चन्द्रसूर्य प्रतिफलनं भवति । तारकाभ्यां सूर्यचन्द्र मण्डलदर्शनं ब्रह्माण्डमिव पिण्डाण्डशिरोमध्यस्थाकाशे रवीन्दुमण्डलद्वितयमस्तीति निश्चित्य तारकाभ्यां तद्दर्शनम् । अत्राप्युभयैक्यदृष्ट्या मनोयुक्तं ध्यायेत् तद्योगाभावे इन्द्रियप्रवृत्ते- रनवकाशात् । तस्मात् अन्तर्दृष्ट्या तारक एवाऽनुसंधेयः ॥६॥