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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

द्वितीयः खण्डः

नीलरुद्रोपनिषत् ] [ ४२७ द्वितीयः खण्डः अपश्यं त्वावरोहन्तं नीलग्रीवं विलोहितम्। उत त्वा गोपा अदृशन्नुत त्वोदहार्यः॥ उत त्वा विश्वा भूतानि तस्मै दृष्टाय ते नमः। नमो अस्तु नीलशिखण्डाय सहस्राक्षाय वाजिने ॥ अथो ये अस्य सत्त्वानस्तेभ्योऽहमकरं नमः। नमांसि त आयुधायानातताय धृष्णवे ॥ उभाभ्यामकरं नमो बाहुभ्यां तव धन्वने। प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्रियोर्ज्याम् ॥ या श्च ते हस्त इषवः परा ता भगवो वप। अवतत्य धनुस्त्वँ सहस्राक्ष शतेषुधे ॥ निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः शंभुराभर। विजय धनुः शिखण्डिनो विशल्यो बाणबाँ उत ॥ अनेशन्नस्येषव आभुरस्य निषङ्गथिः। परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः॥ अथो य इषुधिस्तवारे अस्मिन्निधेहि तम्। या ते हेतिर्मीढुष्टम् हस्ते बभूव ते धनुः॥ तया त्वं विश्वतो अस्मानयक्ष्मया परिब्भुज। नमो अस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु ॥ ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः। ये वाभिरोचने दिवि ये च सूर्यस्य रश्मिषु ॥ येषामप्सु सदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः। या इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पतीनाम्। ये वाऽवटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥२

४२८ ] [ नीलरुद्रोपनिषद् हे अधिक लाल वर्ण वाले नीलकण्ठेश्वर ! हमने आपको पृथिवी पर अवतीर्ण होते हुए देखा है। आपकी उस अवतार रूप अवस्था के देखने वाले गोप और गोपियां हैं। आपका स्वरूप गोपियों के लिए भी दिखाई देना कठिन है, परन्तु उसके अवतीर्ण होने पर विश्व के सभी प्राणियों ने दर्शन किये। आपके उस कृष्णस्वरूप को हमारा नमस्कार। हे मोरमुकुट धारी प्रभो ! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप ही महान् शक्ति वाले इन्द्र हैं। अपने भक्तों के समक्ष आप सहस्राक्ष विराट् रूप में भी दर्शन देते हैं। आपके इस रूप के जो सहचर, बाल-गोपाल गोपिकाएं आदि हैं, वे भी हमारे नमस्कार के पात्र हैं। हे प्रभो ! आपके अत्यन्त शक्तिशाली उन आयुधों को भी अने- कानेक नमस्कार हैं, जो इस समय शान्त रूप में स्थित हैं। मैं आपके धनुष को करबद्ध प्रणाम करता हूँ। अब आप अपने धनुष की प्रत्यंचा को शत्रु के लिए भी प्रयुक्त मत कीजिये। आप अपने बाण को हाथ से उतार कर तूणीरस्थ करके अपने परम कल्याणमय एवं सौम्य शिव रूप का मुझे दर्शन करावें। हे सहस्राक्ष ! आप सौ-सौ बाणों का एक साथ संधान करने वाले हैं। आप अपने बाणों के मुखों को तीक्ष्ण कर हमारे कल्याणार्थ उन्हें धनुष पर चढ़ावें। शत्रु-नाश के पश्चात् आपके धनुष से प्रत्यंचार उतर जाय और आपके बाण संताप देना त्याग कर शान्तिपूर्वक तूणीर में निवास करें। वे पर्वतों को चूर्ण कर देने वाले बाण कल्याणकारी हो जांय। आपका शर-संधान हमारी चारों ओर से रक्षा करें। रक्षा करने के पश्चात् उस बाण को आप तूणीर में स्थित कर दें। हे कृपा-वर्षक प्रभो ! आप अपने अमोघ बाण और धनुष के द्वारा चारों ओर से हमारे रक्षक हों। जो सर्प पृथिवी पर वास करते हैं, उन्हें हमारा नमस्कार। आकाश और स्वर्ग में रहने वाले सर्पों को भी नमस्कार सूर्य की रश्मियों, प्रकाश-

तृतीयः खण्डः

नीलरुद्रोपनिषत् [ ४२६ ] मय लोकों और जलों में निवास करने वाले सब सर्पों को नमस्कार । जो सर्प राक्षसों के बाण रूप हैं, गड्ढों में रहते हैं तथा वनस्पतियों में निवास करते हैं, उन सर्पों को नमस्कार ॥ २ ॥ तृतीयः खण्डः यः स्वजनाञ्छीलग्रीवो वः स्वजनान्हरिः । कल्माषपुच्छमोषधे जम्भयोताश्वरुन्धति ॥ वभ्रुश्च बभ्रु कर्णश्च नीलग्रीवश्च यः शिवः । शर्वेण नीलकण्ठेन भवेन मरुतां पिता ॥ विरूपाक्षेण बभ्रु णा वाचं वदिष्यतो हतः । शर्वं नीलशिखण्ड वीर कर्मणि कर्मणि ॥ इमामस्य प्राशं जहि येनेदं विभजामहे । नमो भवाय । नमश्शर्वाय । नमः कुमाराय शत्रवे । नमः सभाप्रपादिने । यस्याश्वतरौ द्विसरौ गर्दभावभितस्सरौ । तस्मै नीलशिखण्डाय नमः । नीलशिखण्डाय नमः ॥ ३ ॥ हे औषधियो ! जो भगवान् शिव विश्व के कल्याण के लिए विष- पान कर नीलकण्ठ हो जाते हैं, तथा जो अपने भक्तों का मङ्गल करने के लिए हरि रूप धारण करते हैं, उन कली पूँछ वाले केदारेश्वर प्रभु के लिए अमोघ शक्ति वाली होकर उन्हें सन्तुष्ट करो । भगवान् शिव पिंगलवर्ण देह और कानों वाले हैं, वही नीलकण्ठ वाले सर्व स्वरूप और सर्व व्यापक हैं । उन्हीं विरूपाक्ष भव के द्वारा वाणी के जनक और देवताओं का ही नहीं सम्पूर्ण प्राणियों के पिता ब्रह्माजी का संहार हुआ । प्रत्येक कर्म में उन्हें ही व्यापक रूप से देखो और उनके सम्बन्ध में शङ्का का परित्याग करो । इस विश्व को जिस शङ्का द्वारा हम उनसे पृथक मान लेते हैं, वह शंका सर्वथा त्याज्य है ।

४३० ] [ नीलरुद्रोपनिषत् संसार के कारण भव को नमस्कार, संहार करने वाले रुद्र को नमस्कार, संसार के संहारक भगवान् शंकर को नमस्कार, नीलमुकुट धारी और काले सींग वाले केदारेश्वर को नमस्कार । दक्ष के यहां मण्डप को सुशोभित करने वाले कुमार रूप शिव को नमस्कार । जिन नीलशिखण्डधारी से अश्व, खच्चर, गर्दभ आदि-आदि की उत्पत्ति हुई, उनको नमस्कार । सभा मण्डप को सुशोभित करने वाले शिव रूप ईश्वर को बारम्बार नमस्कार ॥ ३ ॥ ॥ नीलरुद्रोपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

रुद्रहृदयोपनिषत्

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, हम दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति । हरि ॐ हृदयं कुण्डली भस्म रुद्राक्ष गण दर्शनम् । तारसारं महावाक्यं पञ्च ब्रह्माग्निहोत्रकम् ॥ प्रणम्य शिरसा पादौ शुको व्यासमुवाच ह । को देवः सर्वदेवेषु कस्मिन् देवाश्च सर्वशः ॥१ कस्य शुश्रूषणान्नित्यं प्रीता देवा भवन्ति मे । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच पिता शुकम् ॥२ सर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वे देवाः शिवात्मकाः । रुद्रस्य दक्षिणे पार्श्वे रविर्ब्रह्मा त्रयोऽग्नयः ॥३ वामपार्श्वे उमादेवी विष्णुः सोमोऽपि ते त्रयः । या उमा सा स्वयं विष्णुर्यो विष्णुः स हि चन्द्रमाः ॥४ ये नमस्यन्ति गोविन्दं ते नमस्यन्ति शंकरम् । येऽर्चयन्ति हरिं भक्त्या तेऽर्चयन्ति वृषध्वजम् ॥५ प्रणव के मूल तत्व को कहने वाले रुद्रहृदय, योग-कुण्डली, भस्म जाबाल, रुद्राक्ष जाबाल और गणपति यह पाँच उपनिषद् हैं। इन्हें ब्रह्म-

४३२ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् ज्ञान से सम्बन्धित अग्निहोत्र के पञ्च महामन्त्र कहा गया है तथा यही श्रुति के पंच महावाक्य माने गए हैं । एक बार श्री शुकदेवजी ने अपने पिता महाज्ञानी व्यासजी महा- राज के चरणों में शीश झुकाकर निवेदन किया—'प्रभो ! सब वेदों ने किस देव का प्रतिपादन किया है और समस्त देवताओं का वास किस देव में है, यह कृपा कर मेरे प्रति कहिये और यह भी बताइये किस देवता की उपासना करने से सभी देवता मुझ पर प्रसन्न होंगे ?' ऐसा प्रश्न सुनकर तत्वज्ञानी व्यासजी ने कहा—हे पुत्र ! भगवान् रुद्र में सब देवता निवास करते हैं । रुद्र भगवान् के दक्षिण पार्श्व में सूर्य, ब्रह्मा एवं गार्ह- पत्य, दक्षिणादि तीनों अग्नियों की स्थिति है । वाम पार्श्व में उमा, विष्णु और सोम स्थित हैं । इन तीनों में भी कोई भेद नहीं है । क्योंकि उमा ही विष्णु भगवान् हैं और विष्णु ही सोम हैं । जो गोविन्द को नमस्कार करते हैं, उनका नमस्कार भगवान् शंकर को स्वयं ही पहुँच जाता है । जो भक्त भगवान् विष्णु की पूजा करते हैं वे मानों वृषभध्वज की ही पूजा करते हैं ॥ १—५ ॥ ये द्विषन्ति विरूपाक्षं ते द्विषन्ति जनार्दनम् । ये रुद्रं नाभिजानन्ति ते न जानन्ति केशवम् ॥६ रुद्रात् प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः । यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्म यो ब्रह्मा स हुताशनः ॥७ ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत् । पुंलिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं भगवत्युमा ॥८ उमारुद्रात्मिकाः सर्वाः प्रजाः स्थावरजङ्गमाः । व्यक्तं सर्वमुमारूपमव्यक्तं तु महेश्वरम् ॥९ उमाशंकरयोर्योगः य योगो विष्णुरुच्यते । यस्तु तस्मै नमस्कारं कुर्याद्भक्तिसमन्वितः ॥१०

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri रुद्रहृदयोपनिषत् [ ४३३ जो भगवान् आशुतोष से द्वेष करने वाले हैं, वे जनार्दन प्रभु के प्रिय कभी नहीं हो सकते। जो रुद्र के ज्ञाता नहीं हैं, वे केशव के भी ज्ञाता नहीं हो सकते। क्योंकि रुद्र ही जीव के उत्पन्नकर्त्ता हैं और बीज की योनि रूप भगवान् विष्णु है। रुद्र ही ब्रह्मा है, ब्रह्मा ही अग्नि हैं। रुद्र ही ब्रह्मा और विष्णु रूप हैं। यह अग्नि और सोम से सम्बन्धित विश्व भी रुद्र ही है। सृष्टि में जितने प्राणी पुंल्लिंग रूप से हैं, वे सभी रुद्र हैं तथा स्त्रीलिंगात्मक समस्त देहधारी हैं वे उमा हैं। इस प्रकार जङ्गम रूप यह सम्पूर्ण सृष्टि रुद्र और उमा रूप है। अव्यक्त ससार रुद्र का रूप और व्यक्त ससार भगवती का उमा रूप है। उमा और शङ्कर दोनों के मिलने से विष्णु कहे जाते हैं। जो विष्णु को नमस्कार करते हैं वे त्रिविधात्मा के ज्ञाता होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं ॥६-१०॥ आत्मानं परमात्मानमन्तरात्मानमेव च । ज्ञाता त्रिविधमात्मानं परमात्मानमाश्रयेत् ॥११ अन्तरात्मा भवेद्ब्रह्मा परमात्मा महेश्वरः । सर्वेषामेव भूतानां विष्णुरात्मा सनातनः ॥१२ अस्य त्रैलोक्यवृक्षस्य भूमौ विटपशाखिनः । अग्रं मध्यं तथा मूलं विष्णुब्रह्ममहेश्वराः ॥१३ कार्यं विष्णुः क्रिया ब्रह्मा कारणं तु महेश्वरः । प्रयोजनार्थं रुद्रेण मूर्तिरेका त्रिधा कृता ॥१४ धर्मो रुद्रो जगद्विष्णुः सर्वज्ञानं पितामहः ॥१५ श्रीरुद्र रुद्र रुद्रेति यस्तं ब्रूयाद्विचक्षणः । कीर्तनात् सर्वदेवस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१६ सब प्राणियों के आत्मा विष्णु हैं, अन्तरात्मा ब्रह्मा और परमात्मा रुद्र हैं। इस लोकत्रय रूप वृक्ष की शाखायें पृथ्वी पर फैली हुई हैं, इसके अग्र भाग विष्णु, क्रिया रूप ब्रह्मा और मूल भाग रुद्र हैं।

४३४ ] [रुद्रहृदयोपनिषत् कार्यं रूप विष्णु, क्रिया रूप ब्रह्मा और कारण रूप रुद्र हैं। इस प्रकार भगवान् रुद्र ने ही प्रयोजन के अनुसार अपने तीन रूप धारण किए हैं। संसार विष्णुरूप, ज्ञान ब्रह्मारूप और धर्मं रुद्ररूप है। जो ज्ञानी पुरुष रुद्र के नाम का जप करता है, वह इससे सभी देवताओं के नाम- जप का फल पाकर सब पापों से छूट जाता है ॥११-१६॥ रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः ॥१७ रुद्रो ब्रह्मा उपा वाणी तस्मै नमो नमः। रुद्रो विष्णुरुमा लक्ष्मीस्तस्मै तस्यै नमो नमः ॥१८ रुद्रः सूर्य उमा छाया तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रः सोम उमा तारा तस्मै तस्यै नमो नमः ॥१९ रुद्रो दिवा उमा रात्रि तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो यज्ञ उमा वेदिस्तस्यै तस्मै नमो नमः ॥२० रुद्रो वह्निरुमा स्वाहा तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो वेद उमा शास्त्रं तस्यै नमो नमः ॥२१ रुद्रो वृक्ष उमा वल्ली तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो गन्ध उमा पुष्पं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥२२ रुद्रोऽथं अक्षरः सोमा तस्मै तस्यै नमो नमः । रुद्रो लिङ्गमुमा पीठं तस्मै तस्यै नमो नमः ॥२३ सर्वदेवात्मकं रुद्रं नमस्कुर्यात् पृथक्पृथक् । एभिर्मन्त्रपदैरेव नमस्यामीशपार्वती ॥२४ यत्र यत्र भवेत् सार्धमिमं मन्त्रमुदीरयेत् । ब्रह्महा जलमध्ये तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२५ रुद्र रूप पुरुष और उमा रूप स्त्री, इस प्रकार के रूप द्वय में भगवान् शङ्कर और भगवती उमा को नमस्कार है । रुद्र ब्रह्मा स्वरूप

रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३५ और उमा वाणी स्वरूप हैं। इन दोनों रूप में उमा महेश्वर को नमस्कार है। रुद्र रूप विष्णु और उमा रूप लक्ष्मी को नमस्कार है। सूर्य रुद्र हैं छाया उमा है, उनके इन दोनों रूपों को नमस्कार है। चन्द्रमा और तारा रूप रुद्र-उमा को नमस्कार है। दिवस-रात्रि रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। यज्ञ और वेदी रूप शिव और उमा को नमस्कार है। वेद-शास्त्र रूप शकर और उमा को नमस्कार है। वृक्ष और लता रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। अर्थ और अक्षर रूप शिव-उमा को नमस्कार है। लिंग और पीठ रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। इस प्रकार इन वेदात्मक रुद्र और उमा को पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिए। मैं भी इन मन्त्रों द्वारा शिव-उमा को नमस्कार किया करता हूँ। जहाँ भी, जिस स्थिति में रहना हो, वहीं इस अर्घालीयुक्त मन्त्र का जप करता रहे। जिसने ब्रह्म-हत्या की हो वह भी यदि जल में प्रविष्ट होकर इस मन्त्र को जपे तो सभी पापों से छूट जाता है ॥१७-२५॥ सर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम् । सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम् ॥२६ तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यादिदं शुक । तदात्मकत्वात् सर्वस्य तस्माद्भिन्नं न हि क्वचित् ॥२७ द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा च ते। तत्रापरा तु विद्यैषा ऋग्वेदो यजुरेव च ॥२८ सामवेदस्तथाऽथर्ववेद शिक्षा मुनीश्वर । कल्पो व्याकरणं चैव निरुक्तं छन्द एव च ॥२९ ज्योतिषं च तथाऽनात्मविषया अपि बुद्धयः । अथैषा परमा विद्या ययाऽऽत्मा परमाक्षरम् ॥३० यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् । अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा ॥३१

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४३६ ] ( रुद्रहृदयोपनिषत् नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् । तद्भूतयोनिं पश्यन्ति धीरा नात्मानमात्मनि ॥३२ हे शुक ! जो सनातन परम ब्रह्म सबका अधिष्ठान, मन और वाणी से अगोचर और सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, उसे जो भले प्रकार जान लेता है वह इस सम्पूर्ण रहस्य का ज्ञाता हो जाता है। क्योंकि उस ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं है। यह सब उसी का स्वरूप हैं। परा और अपरा नाम की दो विद्यायें हैं वे साधक के लिये ज्ञातव्य हैं। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, यह चारों वेद, शिक्षा, कल्प, छन्द, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष यह अपरा है। इसमें आत्म-विषय के अतिरिक्त अन्य सब प्रकार का बौद्धिक ज्ञान भरा हुआ है। परन्तु जिसके द्वारा आत्म-ज्ञान होता है वह परा विद्या है। वही परम अविनाशी आत्मतत्त्व है। वह दिखाई नहीं पड़ता, न ग्रहण किया जा सकता है। उसका नाम, रूप, व गोत्रादि कुछ नहीं है। उसके न नेत्र हैं, न कान हैं, हाथ-पाँव भी नहीं हैं। वह विषयों ने परे, नित्य, विभु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने से सर्वगत और निर्विकार है। वह सब भूतों का आश्रय स्थान है। ज्ञानी पुरुष उस परमात्मा का अपने ही आत्मा में दर्शन करते हैं ॥२६-३२॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद्यो यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादतन्नह्मरूपेण जायते जगदावलि ॥३३ सत्यवद्भाति तत् सर्वं रज्जुसर्पवदास्थितम् । तदेतदक्षरं सत्यं तद्विज्ञाय विमुच्यते ॥३४ ज्ञानादेव हि संसारविनाशो नैव कर्मणा । श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं स्वगुरुं गच्छेद्व्यथाविधि ॥३५ गुरुस्तस्मै परां विद्यां दद्याद्ब्रह्मात्मबोधिनीम् । गुहायां निहितं साक्षादक्षरं वेद चेन्नरः ॥३६ छित्त्वाऽविद्यामहाग्रन्थि शिवं गच्छेत् सनातनम् । तदेतदमृतं सत्यं तद्वेद्धव्यं मुमुक्षुभिः ॥३७

रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ब्रह्म से ही भोक्ता एवं अन्य-रूप युक्त यह विश्व प्रकट होता है । वह ब्रह्म सर्वज्ञ एवं सब विद्याओं का आश्रयस्थान है। उसका तप ज्ञान ही है। सत्य के समान दिखाई पड़ने वाला यह विश्व रस्सी में सर्प के आभास के समान ही ब्रह्म में स्थित है। यह विश्व असत्य है, परन्तु ब्रह्म अविनाशी एवं सत्य है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। कर्म से संसार की पाश नहीं कटती, वह तो ज्ञान से ही छिन्न-भिन्न होती है। इसलिए मुक्ति-काम्य पुरुष को अपने ब्रह्मनिष्ठ एवं श्रोत्रिय गुरु की शरण लेनी चाहिए। वह गुरु उसे आत्मा और ब्रह्म के एक होने का ज्ञान कराने वाली परविद्या सिखावे। गुहा में अलक्षित उस अविनाशी ब्रह्म से जो पुरुष साक्षात् कर लेता है, उसके अविद्या रूपी बन्धन तो कट जाते हैं और फिर वह पुराण पुरुष शिव के समीप जाता है। अमृतरूप सत्य मोक्ष की कामना वाले साधकों के लिए ज्ञातव्य है। धनुस्तारं शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्य मुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥३८ लक्ष्यं सर्वगतं चैव शरः सर्वगतो मुखः । वेद्धा सर्वगतश्चैव शिवलक्ष्यं न संशयः ॥३९ न तत्र चन्द्रार्कवपुः प्रकाशते न वान्ति तावाः सकला देवताश्च । स एष देवः कृतभावभूतः रूपं विशुद्धो विरजाः प्रकाशते ॥४० द्वौ सुपर्णौ शरीरेऽस्मिन् जीवेशाख्यौ सह स्थितौ । तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न महेश्वरः ॥४१ केवलं साक्षिरूपेण विना भोगं महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया तयोः ॥४२ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

४३६ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् घटाकाशमठाकाशौ यथाऽऽकाशप्रभेदतः । कल्पितौ परमो जीव शिव रूपेण कल्पितौ ॥४३ तत्त्वतश्च शिवः साक्षाच्चिज्जीवश्च स्वतः सदा । चिच्चिदाकारतो भिन्ना न भिन्ना चित्त्वहानितः ॥४४ चितश्चिन्न चिदाकाराद्भिद्यते जडरूपतः । भिद्यते केज्जडो भेदश्चिदेका सर्वदा खलु ॥४५ तर्कतश्च प्रमाणाच्च चिदेजत्वव्यवस्थितेः । चिदेकत्वपरिज्ञाने न शोचति न मुह्यति । अद्वैतं परमानन्दं शिवं याति तु केवलम् ॥४६ अधिष्ठानं समस्तस्य जगतः सत्यचिद्धनम् । अहमस्मीति निश्चित्य वीतशोको भवेन्मुनि ॥४७ स्वशरीरे स्वयं ज्योतिस्स्वरूपं सर्वसाक्षिणम् । क्षीणादोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥४८ एवंरूपपरिज्ञान यस्यास्ति परयोगिनः । कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य पूर्णस्वरूपिणः ॥४६ आकाशमेकं सम्पूर्णं कुत्र चिन्नैव गच्छति । तद्वत्स्वात्म परिज्ञानी कुत्र चिन्नैव गच्छति ॥५० स तो॒ ह वै॒ तत्पर॑मंब्रह्म॒यो वेदं॒ वै मुनिः॑ । ब्रह्म॑ वै भवति स्वस्थः सच्चिदानन्दमातृकः ॥५१ : ब्रह्म रूप लक्ष्य के लिए प्रणव धनुष रूप और आत्मा बाण के समान है । उसे बींधने के लिए आलस्य का त्याग आवश्यकीय कार्य है । उस ब्रह्म में उसी प्रकार तन्मय हो जाना चाहिए जैसे लक्ष्य की बींधने के लिए बाण क्रियारत होता है । ब्रह्म रूप लक्ष्य सर्वगत है, आत्मा सर्वतोमुख है, परन्तु यदि साधक भी सर्वगत हो तो शिवःरूप लक्ष्य की प्राप्ति निःसन्देह होती है । जिन परमात्मा के परमधाम में चन्द्र-सूर्य नहीं होते, जहाँ वायु तथा अन्य देवगण भी पहुंच नहीं पातें, वहीं पर-

रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३६ मात्मा साधक द्वारा चिंतन किये जाने पर अपने निर्मल और निर्गुण रूप से प्रकाशमान होते हैं। यह शरीर रूपी वृक्ष जीव और ईश्वर रूप दो पक्षियों को निवास देने वाला है। इनमें जीवरूप पक्षी स्वीकृत कर्मों का फल भोगता है। परन्तु ईश्वर उसके कर्म-फल भोग के साक्षी स्वरूप प्रकाशित रहता है, वह कर्म का फल नहीं भोगता। माया के द्वारा ही जीव और ईश्वर के भेद की कल्पना हुई है। यथार्थ में तो चिन्मय जीव स्वयं ही साक्षात् ईश्वर है। जीव और ईश्वर में चित् रूप उपाधि सम्बन्धी आकार भेद के कारण यह विभक्ति परिलक्षित होती है। वास्तव में उनमें कोई भिन्नता नहीं है। यदि यथार्थ में ही भेद हो तो दोनों का चित् स्वरूप ही नष्ट हो जायगा। चित् से चित् का भेद कल्पित किया जाना जड़ रूप उपाधि से ही हुआ है। चिदाकारता से कोई भेद नहीं हो सकता। भेद-दृष्टि ही जड़ता से उत्पन्न होती है। चित्त की एकता युक्ति और प्रमाण दोनों के द्वारा ही परिपुष्ट है। अतः चित् की एकता का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य मोह और शोक से मुक्त हो जाता है और अद्वैत परमानन्द रूप शिवत्व की उसे प्राप्ति होती है। वह चिद्धन स्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का परम आश्रय है। ऋषि- गण परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा मानकर शोक से छूट जाते हैं। जिन मनुष्यों के दोष नष्ट हो गये हैं, वे ही उस सर्वसाक्षी और स्वयंज्योति रूप परब्रह्म के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। माया के जाल में फँसे हुए जीव उसे नहीं देख सकते । जो सिद्ध पुरुष आत्मा के स्वरूप का ऐसा ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे पूर्णता को प्राप्त पुरुष कहीं आते-जाते नहीं। जैसे परिपूर्ण आकाश कहीं जाता नहीं, वैसे ही आत्म-तत्त्व का ज्ञाता महात्मा भी कहीं नहीं जाता। जो उस परमब्रह्म का ज्ञाता है, वह सच्चिदानन्द रूप में स्थित होकर स्वयं ब्रह्म हो जाता है ॥ ३८-५१ ॥ ॥ रुद्रहृदयोपनिषत् समाप्त ॥

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गरुडोपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुः वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्ता- र्क्ष्यो अरिष्टनेमिः॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें। सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

हरिः ॐ गारुडब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि यां ब्रह्मा विद्यां नारदाय प्रोवाच नारदो बृहत्सेनाय बृहत्सेन इन्द्राय इन्द्रो भर- द्वाजाय भरद्वाजो जीवत्कामेभ्यः शिष्येभ्यः प्रायच्छत् । अस्याः श्रीमहागरुडब्रह्मविद्याया ब्रह्मा ऋषिः। गायत्री छन्दः। श्रीभग- वान्महागरुडो देवता । श्रीमद्भागुरुडप्रीत्यर्थं मम सकलविषवि- नाशनाथें जपे विनियोगः। ॐ नमो भगवते अंगुष्ठाभ्यां नमः। श्रीमंहागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट् । श्रीविष्णुवल्लभाय अनामिकाभ्यां हुम् । त्रैलोक्यपरि- पूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । उग्रभयंकरकालनलरूपाय

Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

[page-header] गरूड़ोपनिषत् ] [ ४४१ [/page-header]

करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः सुव- रोमिति दिग्बन्धः । हरि ॐ। गरुड़ सम्बन्धी ब्रह्मविद्या का उपदेश किया जाता है, जिस विद्या को ब्रह्मा ने नारद को, नारद ने वृहत्सेन को, वृहत्सेन ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज को, भरद्वाज ने जीवत्काम शिष्यों को कहा (उन्हें प्रदान किया) नीचे लिखे विनियोग से जल छोड़ना चाहिये—'अस्या श्री महागरुड़ ब्रह्मविद्याया' --- --- •••विषविनाशार्थे विनियोगः । अब नीचे लिखे मन्त्रों से अङ्गन्यास करना चाहियेः— ॐ नमो--- --- •••अंगुष्ठाभ्यां नमः । श्री महागरुडाय--- •••तर्जनीभ्यां स्वाहा । पक्षीन्द्राय••• ••• ---मध्यमाभ्यां वषट् । श्री विष्णुवल्लभाय••• •••अनामिकाभ्याँहुम् । त्रैलोक्य परिपूजिताय••• •••कनिष्ठिकाभ्यां वोषट् । उग्रभयङ्कर••• --- •••करतल पृष्ठाभ्यां फट् । इसी प्रकार हृदय शिरशिखा कवच नेत्रादि न्यास करके वोषट् करना चाहिये । "भूर्भुवः स्वरोम्" इससे दिग्बन्धन करना चाहिये । ध्यानम् । स्वस्तिको दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्चितम् । प्राञ्जलीकृतदोर्युग्मं गरुड हरिवल्लभम् ॥ १ ॥ अनन्तो वामकटको यज्ञसूत्रं तु वासुकिः । तक्षकः कटिसूत्रं तु हारः कार्कोट उच्यते ॥ २ ॥ पद्मो दक्षिणकर्णे तु महापद्मस्तु पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां चामराभ्यां सुबीजितम् । एलपुत्रक- नागाद्यैः सेव्यमानं मुदान्वितम् ॥ ४ ॥ कपिलाक्षं गरुमन्तं सुवर्णसदृशप्रभम् । दीर्घबाहुं बृहत्स्कन्धं नादाभरणभूषितम् ॥५॥

४४२ ] [ गरुडोपनिषत् आजानुतः सुवर्णाभमाकट्योस्तुहिनप्रभम् । कुंकुमारुणमाकण्ठं शतचन्द्रनिभाननम् ॥ ६ ॥ नीलाग्रनासिकावक्रं सुमहच्चारुकुण्ड- लम् । दंष्ट्राकरालवदनं किरीटमुकुटोज्ज्वलम् ॥ ७ ॥ कुंकुमारुण- सर्वाङ्गं कुन्देन्दुधवलाननम् । विष्णुवाह नमस्तुभ्यं क्षेमं कुरु सदा मम ॥ ८ ॥ निम्न श्लोकों से ध्यान कराना चाहियेः- स्वस्तिको दक्षिणं पादं .. ...हरिवल्लभम् । १ । अनन्तो वामकटको... ...कार्कोट उच्यते । २ । पद्मो दक्षिणकर्णे... ...भुजान्तरे । ३ । पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां... ...मुदान्वितम् । ४ । कपिलाक्षं... - ...नागाभरणभूषितम् । ५ । आजानुतः... ... ...शतचन्द्रनिभाननम् । ६ । नीलाग्रनासिकावक्रं... ...किरीट मुकुटोज्ज्वलम् । ७ । कुङ्कुमारुणसर्वाङ्गं... ...कुरु सदा मम् । ८ । इन सब श्लोकों को गरुड़ का ध्यान करते हुए भली- भाँति श्रद्धापूर्वक पढ़ाना चाहिये । एवं ध्यायेत्त्रिसंध्यासु गरुडं नागभूषणम् । विषं नाशयते शीघ्रं तूलराशिमिवानलः ॥ ६ ॥ ओमीमों नमो भगवते श्रीमहागरुडाय पक्षीन्द्राय विष्णुवल्लभाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय उग्रभयंकरकालानलरूपाय वज्रनखाय वज्रतुण्डाय वज्रदन्ताय वज्रदंष्ट्राय वज्रपुच्छाय वज्रपक्षालक्षिनशरीराय ओमीकेह्य हि श्रोमहागरुडाप्रतिशासनास्मिन्नाविश विश दुष्टानां विषं दूषयदूषय स्पृष्टानां नाशयनाशय दन्दशूकानां विषं दारय दारय प्रलीनं विषं प्रणाशयप्रणाशय सर्वविषं नाशय नाशय हनहन दहदह पचपच भस्मीकुरुभस्मीकुरु हुं

गरुडोपनिषत् ] [ ४४३ फट् स्वाहा ॥ चन्द्रमण्डलसंकाश सूर्यमण्डलमुष्टिक । पृथ्वो- मण्डलमुद्राङ्ग श्रीमद्भागुरुडायविषं हरहंर हुं फट् स्वाहा ॥ ॐ क्षिप स्वाहा ॥ ओमीं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषाणां च विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषणी विषनाशिनी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषमन्त प्रलीन विषं प्रनष्टं विषं हतं ते ब्रह्मणा विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते महागुरडाय विष्णुवाहनाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय वज्रन- खवज्रतुण्डाय वज्रपक्षालकृतशरीराय एह्येहि महागुरड विषं छिन्धिच्छिन्धि आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा ॥ सुपर्णोऽसि गरुत्मान्त्रिवृत्ते शिरो गायत्र चक्षुः स्तोम आत्मा साम ते तनूर्वाम- देव्यं बृहद्रथन्तरे पक्षौ यज्ञायज्ञियं पुच्छ छन्दांस्यङ्गानि धिष्ण्या शफा यजूंषि नाम ॥ सुपर्णोसि गरुत्मान्दिव गच्छ सुवः पत ओमीं ब्रह्मविद्याममावास्यायां पौर्णमास्यां पुरोवाच सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनांशिगी विषदूहिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं नष्टं विषं प्रनष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ तस्यम् '? ) । इस प्रकार तीनों सन्ध्याओं के समय नागभूषण गरुड़ का ध्यान करना चाहिये । इनके ध्यान से विष ऐसे समाप्त हो जाता है जैसे आग द्वारा रुई का ढेर । ६ । अब अधोलिखित मन्त्रों का उच्चारण विषनाश करने के लिये करना चाहिये और उस स्थान को झाड़ना चाहिये । इन्हीं मन्त्रों से होम भी सिद्धि प्राप्ति के निमित्त करना चाहियेः— ॐ मी मों नमोः भगवते ॰॰ .... ...भस्मां कुरु भस्मी कुरु हुं फट् स्वाहा । १.। चन्द्रमण्डलसंकाश... ... ...विषं हर हर हुँ फट् स्वाहा ॐ क्षिप स्वाहा । २ ।

४४४ ] [ गरुडोपनिषत्

ओमीं संचरति... ... ...वज्रेण स्वाहा । ३ । ॐ नमो भगवते... ...आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा । ४ । सुपर्णोऽसि गरुत्मांन्... ...विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । ५ । यद्यनन्तदूतोऽसि यदि वानन्तकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । यदि वासुकिदूतोऽसि वा वासुकिः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मकातरी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा यदि वा तक्षकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमि- न्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि कर्कोटकदूतोऽसि यदि वा कर्कोटकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि पद्मकदूतोऽसि यदि वा पद्मकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि महापद्मकदूतोऽसि यदि वा महापद्मकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी त्रिषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि शङ्खकदूतोऽसि यदि वा शङ्खकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥

गरुडोपनिषत् ] [ ४४५ यदि गुलिकदूतोऽसि यदि वा गुलिकः स्वयं सचरति सचरित तत्कारी मतकारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमि- न्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि पौण्ड्रकालिकदूतोऽसि यदि वा पौण्ड्रकालिकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मतकारी विषना- शिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि नागकदूतोऽसि यदि वा नागकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मतकारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ तदि लूतानां प्रलूतानां यदि वृश्चिकानां यदि घोटकानां यदि स्थावरजङ्गमानां सचरति सचरति तत्कारी मतकारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । अनन्तवासुकितक्षककर्कोटकपद्मक महापद्मक- शङ्खगुलिकपौण्ड्रकालिकनाग इत्येषां दिव्यानां महानागानां महानागादिरूपाणां विषतुण्डानां विषदन्तानां विषदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विश्वचाराणां वृश्चिकानां लूतानां प्रलूतानां मूषिकाणां गृहगौलिकानां गृहगोधिकानां ध्रणासानां गृहगिरिगह्वरकालानलवल्मोकोद्भूतानां तार्णानां पार्णानां काष्ठ- दारुवृक्षकोटरस्थानां मूलत्वग्दारुनिर्यासपत्रपुष्पफलोद्भूतानां दुष्ट- कीटकपिश्वानमार्जारजम्बुकव्याघ्रवराहाणां जरायुजाण्डजोद्भि- ज्जस्वेदजानां शस्त्रबाणक्षतस्फोटव्रणमहाव्रणकृतानां कृत्रिमाणा- मन्येषां भूतवेतालकूष्माण्डपिशाचप्रेतराक्षसयक्षभयप्रदानां विष- तुण्डदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विषाणां विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषिणी विषनाशिनी विषहारिणी हतं विषं

४४६ ] [ गरुडोपनिषत् नष्टं विषमन्तःप्रलीतं विषं प्रनष्टं विषं हतं ते ब्रह्मणा विष- मिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । यद्यनन्तक दूतोऽसि... ... ...ब्रह्मणा... ... वज्रेण स्वाहा । ६ । यदि वासुकिदूतोऽसि... ... ...इन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ।७। यदि वा तक्षक स्वयं... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि कर्कोटक दूतोऽसि .. ...वज्रेण स्वाहा । यदि पद्मक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि महापद्मक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि शंखक दूतोऽसि... ... - वज्रेण स्वाहा । यदि गुलिक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि पौण्ड्रकालिक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि नागक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि लूतानां प्रलूतानां... ... ...वज्रेण स्वाहा । अनन्त वासुकितक्षक... ... ...विषं हतं ते ब्रह्मणा विष- मिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । इ इमां ब्रह्मविद्याममावास्यायां पठेच्छृणुयाद्वा यावज्जीवं न हिंसन्ति सर्पाः । अष्टौ ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा तृणेन मोचयेत् । शतं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा चक्षुषा मोचयेत् । सहस्रं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा मनसा मोचयेत् । सर्पञ्जले न मुञ्चन्ति । तृणे न मुञ्चन्ति । काष्ठेन मुञ्चन्ती त्याह भगवान्ब्रह्मेत्युपनिषत् ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥